“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Thursday, 13 March 2014
ऐ दोस्त, लब से न सही आखों से
ऐ दोस्त, लब से न सही आखों से ही इशारा कर दिया होता एहसासे दिल बयाँ करने का ये तरीका भी तो हो सकता था मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------------
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