होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Monday, 23 June 2014

पुरानी हवेली हूँ

पुरानी हवेली हूँ
यंहा सिर्फ
सन्नाटा बोलता है
या फिर,
रोशनदानों और
गुम्बद पे
कबूतर बोलता है
हर वक़्त यहां
खामोशी पसरी रहती है
हाँ , कभी - कभी 
झींगुर भी बोलता है
अगर तुम
सुनना ही चाहते हो  तो
मेरे जिस्म पे
कान रख दो
मेरा हर ज़ख्म
हर घाव बोलता है

मुकेश इलाहाबादी --

No comments:

Post a Comment