“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Monday, 22 September 2014
लगा के मलमल का परदा सोचतें हैं वो
लगा के मलमल का परदा सोचतें हैं वो रोक लेंगे चाँदनी को ज़माने की नज़र से ख़ुद को चिलमन में छुपा के सोचते हैं वो खुशबू ऐबदन छुपा लेंगे ज़माने की नज़र से मुकेश इलाहाबादी -------------------------
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