“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Saturday, 18 October 2014
तमाम धूप और छाँव से बचाते रहे
तमाम धूप और छाँव से बचाते रहे उम्रभर तमन्नाए गुल खिलाते रहे इक तेरी बेरुखी की धूप सह न सके रह-रह के गुले तमन्ना मुरझाते रहे ----------------------------------------- मुकेश इलाहाबादी -
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