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Friday, 24 March 2017

तुम, खिलखिलाती हुई आतीं हो

तुम,
खिलखिलाती हुई
आतीं हो
और बिखेर देती हो
टोकरा भर  हँसी
जिसे अपनी हथेलियों में 
तमाम कोशिशों के बावज़ूद
बटोर न नहीं पाता हूँ
और
हताश लेट जाता हूँ औंधे,
तकिया में मुँह लपेट के
इस उम्मीद पे
शायद अगली बार समेट लूँ
तुम्हारी उजली - उजली हँसी

मुकेश इलाहाबादी ---

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