“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 23 May 2017
हंसी इक चिड़िया है
तुम्हारी हंसी इक चिड़िया है जो कभी - कभी फुर्र - फुर्र उड़ती हुई मुंडेर पे बैठ जाती है और फिर मेरी उदास मुंडेर देर तक मुस्कुराती है नरम धूप का दुशाला ओढ़े हुए
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