“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Wednesday, 14 June 2017
मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा
मौन समर्पण के कागज़ पे लिखूँगा इक ख़त तुम्हारे नाम से लिखूंगा सुना! नदी सा कल -कल बहती हो तुम्हारे जिस्म पे लहरों से लिखूंगा मुकेश इलाहाबादी ----------------
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