एक आदिवासी स्त्री का प्रेम
उसका प्रेम
जंगल की तरह होता है
बिना नक़्शे का,
और अपने नियमों से भरा हुआ।
वो जब प्यार करती है,
तो साल के पेड़ों की तरह अडिग रहती है,
और महुए की तरह
मीठी-सी ख़ुशबू छोड़ जाती है हवा में।
उसकी हँसी
झरने की छलकन है,
उसकी चुप्पी
घने बाँसों का सन्नाटा।
वो कंगन नहीं खनकाती,
उसकी चूड़ियाँ
लकड़ी की होती हैं
मगर दिल की धड़कन
ढोल की थाप-सी गूंजती है।
वो इज़हार नहीं करती शब्दों में,
बस किसी दिन
तेरे कंधे पर
अपना सिर रख देगी
और वही उसका वचन होगा।
उसके प्रेम में
ज़मीन की सोंधी गंध है,
आग की तपिश,
नदी की अडिग रवानी।
वो शहर की तरह
बदलती नहीं हर मौसम में,
उसका प्रेम
पर्वत-सा धैर्य रखता है
चुप, मगर अटल।
और अगर तुमने
उसके विश्वास को तोड़ा,
तो याद रखना
जंगल माफ़ कर देता है,
भूलता नहीं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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