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Saturday, 28 February 2026

तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं

 तुम्हारी यादें ओस पर ठहरी धूप हैं


तुम्हारी यादें

ओस पर ठहरी धूप हैं

नर्म, क्षणभंगुर,

पर भीतर तक उतर जाने वाली।


सुबह जब

घास की पत्तियों पर

पारदर्शी बूँदें काँपती हैं,

उसी हल्की-सी चमक में

तुम्हारा नाम जगमगाता है।


धूप उन्हें छूती है

तो वे सोना नहीं बनतीं,

बस थोड़ी-सी रोशनी

आसपास बाँट देती हैं।


तुम्हारी यादें भी

ऐसी ही हैं—

पल भर की,

पर उतनी ही पर्याप्त

कि दिन की शुरुआत

मुस्कान से हो सके।


मैं झुककर देखता हूँ

तो अपना चेहरा

उन बूँदों में धुँधला-सा दिखता है

जैसे तुम्हारी स्मृति

मुझे ही साफ़ कर रही हो।


कुछ देर बाद

ओस सूख जाती है,

धूप आगे बढ़ जाती है

पर जो चमक

क्षण भर को पत्तियों पर थी,

वह भीतर रह जाती है।


तुम्हारी यादें

ओस पर ठहरी धूप हैं—

न ठहरने का दावा,

न खो जाने का डर।

बस एक हल्की उजास,

जो हर सुबह

मुझे फिर से जीवित कर देती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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