स्पर्श का अंतिम दस्तावेज़
कहा गया
कि
अब इस दुनिया में
स्पर्श सुरक्षित नहीं है,
इसलिए
उसे दर्ज कर लिया गया है
एक “अंतिम दस्तावेज़” में।
किसी पुरानी अलमारी में
रखी है वह फाइल
जिसके पन्नों पर
स्याही नहीं,
त्वचा की यादें चिपकी हैं।
पहले पन्ने पर
लिखा है
“जब माँ ने
पहली बार
बच्चे को छुआ था,
तो उसने
रोना छोड़ दिया था।”
दूसरे पन्ने पर
एक अधूरी-सी गर्माहट है,
जहाँ
दो हाथ
मिलते-मिलते
रुक गए
समय के डर से,
समाज के डर से,
या
खुद अपने डर से।
एक कोने में
सूखा हुआ है
वह स्पर्श
जो विदा के वक़्त
किसी ने
थामे रखा था देर तक,
जैसे
छोड़ देने से
रिश्ता टूट जाएगा।
लोग
इस दस्तावेज़ को पढ़ने आते हैं
दस्ताने पहनकर,
सावधानी से,
ताकि
कोई असली एहसास
उन तक न पहुँच जाए।
एक पन्ने पर
लिखा है
“यह वह स्पर्श है
जो बिना छुए
महसूस हुआ था
आँखों से,
खामोशी से,
और दूरी से।”
किसी ने
धीरे से पूछा
“क्या
अब भी
कोई छूता है
किसी को…
बिना मतलब के?”
कोई जवाब नहीं आया
बस
हवा ने
हल्का-सा
पन्ना पलट दिया।
आख़िरी पन्ना
अब तक खाली है
शायद
किसी के इंतज़ार में,
जो
फिर से
स्पर्श को
शब्दों से नहीं,
दिल से लिख सके।
रात को
जब सब चले जाते हैं
वह दस्तावेज़
धीरे से काँपता है,
और फुसफुसाता है
“मैं इतिहास नहीं बनना चाहता…
मैं फिर से
वर्तमान होना चाहता हूँ।”
पर
अब लोग
छूते नहीं
वे
स्क्रीन को स्वाइप करते हैं,
और समझते हैं
कि उन्होंने
किसी को महसूस कर लिया।
और इस तरह
स्पर्श
एक फाइल में कैद होकर
इंतज़ार करता है
उस आख़िरी इंसान का,
जो
किसी का हाथ थामकर
यह कह सके
“यह दस्तावेज़
अब ज़रूरी नहीं…”
मुकेश ,,,,,,,
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