तुम ख़्वाब नहीं — एक अधूरी ताबीर हो
तुम ख़्वाब नहीं
एक अधूरी ताबीर हो,
जिसे नींद ने तो देखा
मगर सुबह ने समझा नहीं।
तुम वो लम्हा हो
जो पलकों पर ठहरता तो है,
मगर अल्फ़ाज़ की सरहद तक आते-आते
ख़ुद में सिमट जाता है।
मैंने तुम्हें
हर रात की तह में खोजा है—
जहाँ ख़ामोशी
अपनी सबसे गहरी आवाज़ में बोलती है,
और दिल
बिना किसी वजह के धड़कता है।
तुम वहीं थीं—
एक धुँधली सी रौशनी बनकर,
जो दिखाई तो देती थी,
मगर पकड़ में नहीं आती थी।
तुम ख़्वाब नहीं
क्योंकि ख़्वाब तो टूट जाते हैं,
और तुम…
हर टूटन के बाद भी
किसी और शक्ल में लौट आती हो।
कभी एक आह बनकर,
कभी एक मुस्कान के कोने में,
कभी किसी पुराने गीत की
भूली हुई धुन में…
तुम हर जगह हो,
मगर कहीं भी मुकम्मल नहीं।
मैंने तुम्हें
वक़्त की सिलवटों में भी देखा है
जहाँ बीते हुए कल
आज के कंधे पर सिर रखकर सो जाते हैं,
और आने वाला कल
एक मासूम सवाल बनकर खड़ा रहता है।
तुम वहाँ भी थीं
जैसे जवाब,
जिसे किसी ने पूछा ही नहीं।
तुम ताबीर हो
मगर अधूरी,
जैसे किसी किताब का आख़िरी सफ़ा
हवा ने उड़ा दिया हो,
या जैसे किसी दुआ का “आमीन”
लबों तक आकर रुक गया हो।
मैंने चाहा
कि तुम्हें पूरा कर दूँ
अपने लफ़्ज़ों से,
अपने एहसास से,
अपने वजूद की हर दरार से…
मगर हर बार
तुम मेरी पकड़ से
ठीक उसी तरह फिसल गईं
जैसे रेत
हथेलियों के बीच से निकल जाती है।
शायद तुम पूरी होने के लिए नहीं बनीं,
शायद तुम्हारा अधूरापन ही
तुम्हारी असलियत है।
क्योंकि
जो मुकम्मल हो जाए
वो कहानी नहीं रहता,
और जो अधूरा रह जाए
वही रूह में बसता है।
तुम ख़्वाब नहीं
एक अधूरी ताबीर हो,
जिसे समझने के लिए
नींद नहीं,
जागना पड़ता है।
और मैं…
अब भी जाग रहा हूँ,
उसी ताबीर की तलाश में
जो शायद कभी पूरी न हो
मगर फिर भी
मेरी हर रात को
एक वजह दे जाती है।
मुकेश ,,,,,,,

No comments:
Post a Comment