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Monday, 30 March 2026

पेड़ों की आत्महत्या का मौसम

 “पेड़ों की आत्महत्या का मौसम”

इस साल

मौसम थोड़ा अलग है


कैलेंडर में लिखा है


“पेड़ों की आत्महत्या का मौसम”


सुबह उठते ही

लोगों ने देखा


पेड़

खड़े तो हैं,

पर जैसे

जीना छोड़ चुके हैं।


उनकी शाखाएँ

अब आसमान को नहीं छूतीं,


वे झुकी हुई हैं

जैसे

किसी अदृश्य बोझ से

टूट गई हों।


पत्ते

धीरे-धीरे गिरते नहीं,


वे

एक साथ

छूट जाते हैं


जैसे

किसी ने

जीवन से इस्तीफ़ा दे दिया हो।


किसी ने कहा


“यह सूखा है…”


किसी ने कहा


“यह जलवायु परिवर्तन है…”


पर एक बूढ़े ने

धीरे से फुसफुसाया


“नहीं,

यह निराशा है…”


पेड़ों ने

बहुत देखा है


अपनी जड़ों के पास

खून बहते हुए,


अपनी छाँव में

सौदे होते हुए,


और अपने ही शरीर से

कुर्सियाँ बनते हुए।


वे थक गए हैं


हर बार

फल देने से,


जबकि

उन्हें बदले में

कुल्हाड़ी मिलती है।


इस बार

उन्होंने तय किया


वे काटे जाने का

इंतज़ार नहीं करेंगे,


वे खुद

सूख जाएँगे


धीरे-धीरे,

खामोशी से,

बिना किसी आवाज़ के।


शहरों में

अब भी

लकड़ी बिक रही है,


पर उसमें

कोई खुशबू नहीं


जैसे

वह भी

मर चुकी हो पहले ही।


एक बच्चा

एक सूखे पेड़ के पास खड़ा है


वह पूछता है


“माँ,

ये पेड़ मर क्यों गया?”


माँ

मोबाइल से नज़र उठाकर

बस इतना कहती है


“पानी नहीं मिला होगा…”


पर पेड़

कुछ और कहना चाहता है


वह कहना चाहता है


“मुझे पानी नहीं,

तुम्हारी ज़रूरत थी…”


रात को

जब हवा चलती है


सूखी शाखाएँ

आपस में टकराती हैं,


और एक अजीब-सी आवाज़ आती है


जैसे

कोई आख़िरी बार

जीने की कोशिश कर रहा हो।


धरती

धीरे-धीरे काँपती है


और पूछती है


“अब कौन

मेरी साँस बनेगा?”


पर जवाब में

बस सन्नाटा है


एक लंबा,

गहरा,

डरावना सन्नाटा।


और इस तरह

हर साल

थोड़ा-थोड़ा बढ़ रहा है


पेड़ों की आत्महत्या का मौसम।


मुकेश ,,,,,

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