सब कुछ ‘कनेक्टेड’ है अब — एक सूफ़ियाना बयान”
सब कुछ “कनेक्टेड” है अब
हर रग में जैसे कोई तार बिछा है
हर साँस में
एक अदृश्य जाल लिपटा है
मगर अजीब बात है
दिल अब भी
बेख़बर बैठा है
लोग कहते हैं—
हम जुड़ गए हैं
मैं देखता हूँ—
हर कोई
अपने ही घेरे में क़ैद है
एक वक़्त था
जब दरवाज़े खटखटाए जाते थे
नाम पुकारे जाते थे
और आवाज़ में
रूह की गर्मी होती थी
अब
उँगलियाँ चलती हैं
स्क्रीन जगमगाती है
और बात
दिल तक पहुँचने से पहले
ही कहीं खो जाती है
ज़िक्र अब भी होता है
मगर
लबों से नहीं
स्टेटस में
दुआएँ अब भी उठती हैं
मगर
हाथों से नहीं
इमोजी से
❤️
🤲
🌙
तीन निशानों में
पूरी इबादत समेट दी गई है
एक सूफ़ी ने कहा था
“जिसे तुम ढूँढते हो
वो तुम्हारे दिल में है”
और हम
उसे
वाई-फाई में तलाश रहे हैं
रात को
जब सब सो जाते हैं
नेटवर्क धीमा पड़ता है
तब
दिल धीरे से पूछता है
“कोई है…?”
और
कोई जवाब नहीं आता
सिर्फ़
एक हल्की-सी
खामोशी
जो
सब कुछ कह जाती है
मैंने देखा है
हज़ारों चेहरों से जुड़े लोग
एक ही पल में
टूट जाते हैं
और
एक फकीर
जो किसी से नहीं जुड़ा
रब से इतना जुड़ा होता है
कि उसे
किसी और की ज़रूरत नहीं पड़ती
ये कैसा वक़्त है
जहाँ
मुलाक़ातें कम
और
मौजूदगी ज़्यादा है
जहाँ
लोग पास हैं
मगर
पास नहीं हैं
मेरे भीतर
कोई दरवेश
धीरे-धीरे जागता है
और कहता है
“तोड़ दे ये सारे कनेक्शन
जो तुझे तुझसे दूर करते हैं
और जुड़ जा
उस एक से
जो कभी ऑफलाइन नहीं होता”
अब
मैं कम बोलता हूँ
कम दिखता हूँ
कम जुड़ता हूँ
और अजीब बात है
पहली बार
थोड़ा-सा
जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ
सब कुछ “कनेक्टेड” है अब
मगर
जो असली रिश्ता है—
वो
अब भी
खामोशी में
इंतज़ार कर रहा है
कविता :
“इसे कविता मत कहिए
ये शायद
एक अधूरी दुआ है…”
मुकेश ,,,,,,,,
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