जब तक हर गली में
कोई साठ बरस का आदमी
धीरे-धीरे चलते हुए
अपनी चप्पलों की थकी हुई आवाज़ के साथ
ज़िंदा है
तब तक
इस दुनिया को पूरी तरह सूखा नहीं कहा जा सकता दोस्तों!
वह आदमी
जिसकी कमीज़ के बटन
ऊपर से एक कम और नीचे से एक ज़्यादा लगे होते हैं,
जिसकी जेब में हमेशा
पुरानी दवाइयों की पर्चियाँ मुड़ी-तुड़ी पड़ी रहती हैं,
और आँखों के नीचे
रातों की नींद के काले धब्बे
जब वह हल्का-सा मुस्कुरा देता है,
तो लगता है
जैसे टूटी हुई चारपाई पर
अचानक कोई सपना बैठ गया हो।
वह कहता है
"भाई साहब! आज फिर
उनकी तबीयत ठीक नहीं है…"
या फिर
"अब तो आदत हो गई अकेले खाने की…"
और मैं
उसकी पीठ पर हाथ रखता हूँ
जैसे कोई पेड़
दूसरे पेड़ को सहारा देता हो आँधी में।
उसकी पत्नी
कभी बिस्तर पर पड़ी रहती है महीनों,
या फिर
अचानक चली गई
बिना अलविदा कहे,
जैसे रसोई में उबलती चाय
एकदम से ठंडी हो जाए।
या फिर
घर में है तो सही,
पर शब्दों में काँटे उग आए हैं,
हर बात में झगड़ा, हर साँस में चिड़चिड़ापन
और वह आदमी
चुपचाप
अपनी चाय में चीनी कम करता रहता है।
छुट्टियाँ भी लेता है वह
कभी दवा लेने के लिए,
कभी अस्पताल की लाइन में लगने के लिए,
कभी बस यूँ ही
खाली दीवारों को देखने के लिए।
लेकिन
नीयत उसकी अब भी साफ़ है
दूध में पानी नहीं मिलाता,
बातों में ज़हर नहीं मिलाता,
और किसी के हिस्से की रोटी
कभी नहीं छीनता।
गलतियाँ करता है
चश्मा कहीं रखकर भूल जाता है,
नाम याद नहीं रहते लोगों के,
कभी नमक ज़्यादा डाल देता है दाल में,
कभी चाय उबालकर कड़वी कर देता है
लेकिन
एक बात नहीं भूलता
किसी के दुख में
कंधा देना।
नींद अब कम आती है उसे
आधी रात को उठकर
खाली बिस्तर की सिलवटें ठीक करता है,
या खाँसती हुई आवाज़ सुनकर
दवा की शीशी ढूँढता है अँधेरे में
उसके भीतर
एक औरत है अब भी
जो साज-सिंगार नहीं करती,
बस चुपचाप
देखभाल में घुल जाती है।
कभी-कभी
पुरानी तस्वीरें निकालता है
जिसमें उसकी पत्नी
हँस रही होती है खुलकर,
और वह
तब भी उतना ही संकोची था
तस्वीर को देखता है
और कहता है
"अच्छा था वो समय…"
फिर
चुपचाप
तस्वीर वापस रख देता है।
मैंने एक दिन कहा
"बहुत अकेले हो गए हो यार…"
तो वह हँसकर बोला
"अकेला कहाँ?
यादें तो हैं साथ…"
और उस हँसी में
इतनी नमी थी
कि मेरी आँखें भीग गईं।
मैं जानता हूँ
मेरी यह कविता
उस तक पहुँच जाएगी
वह मुस्कुराएगा हल्का-सा
और कहेगा
"मुझे ही मिला क्या लिखने के लिए?"
और मैं
उसे गले लगाकर कहूँगा
"तुम्हारे जैसे लोग ही
कविता को ज़िंदा रखते हैं…"
जाने क्यों मेरा जी करता है
कि दुनिया के हर कठोर आदमी के सामने
इस साठ साल के आदमी को खड़ा कर दूँ
और कहूँ
देखो!
यह आदमी
टूटी हुई नींदों से बना है,
यह आदमी
अधूरी मोहब्बतों से बना है,
यह आदमी
गीता, बाइबिल, क़ुरान से नहीं
सीधे जीवन से उतरा है
इसके सर पर हाथ रखकर कसम खाओ
कि किसी के दिल को
यूँ अकेला नहीं छोड़ोगे!
अरे ओ साठ साल के आदमी!
तुम्हारी कहानी भी
ख़त्म नहीं हो रही
आओ,
आज फिर
एक कप हल्की-सी मीठी चाय पिलाओ…
और थोड़ी-सी ज़िन्दगी
मुझमें भी घोल दो यार!
मुकेश ,,,,,
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