नरक-कुंड में डूबते-उतराते लोग
वे लोग
जो डूबते हैं
और फिर अचानक
साँस की आख़िरी गाँठ पकड़कर
ऊपर आ जाते हैं,
जैसे किसी अदृश्य हाथ ने
उन्हें अभी पूरी तरह मरने से रोक लिया हो।
नरक
कोई दूर का लोक नहीं,
वह तो यहीं है
हमारी अधूरी इच्छाओं के बीच,
जहाँ हर चाह
अपने ही वज़न से
हमें नीचे खींचती है।
कुंड
एक जलता हुआ चक्र है,
जिसमें पानी भी आग की तरह
जलता है भीतर,
और आग भी
ठंडी लगती है बाहर।
लोग उसमें उतरते हैं
अपने-अपने कारणों से,
कोई प्रेम के धोखे से,
कोई अहंकार के भार से,
कोई अपने ही बनाए हुए
स्वर्ग के टूटने के बाद।
वे तैरना जानते हैं
पर यहाँ तैरना
डूबने की एक और विधा है।
वे हाथ-पैर मारते हैं
जैसे जीवन को थाम लेना चाहते हों,
पर जीवन
उनके हाथों से
रेत की तरह फिसलता जाता है।
कभी कोई ऊपर आता है,
उसकी आँखों में
एक क्षण के लिए
आकाश की झलक चमकती है
पर फिर
वह झलक भी
उसकी अपनी ही स्मृतियों के बोझ से
नीचे खिंच जाती है।
यहाँ समय नहीं है
केवल पुनरावृत्ति है,
एक ही पीड़ा का
बार-बार
नए नामों से जन्म लेना।
कुंड के किनारे
कोई खड़ा नहीं
कोई देखने वाला नहीं,
कोई बचाने वाला नहीं,
क्योंकि
हर दर्शक
किसी और कुंड में
खुद डूब रहा है।
और जो ऊपर खड़े हैं,
वे भी
किसी और गहराई के
कगार पर हैं
जहाँ से गिरना
बस एक विचार की दूरी पर है।
यह नरक
किसी देवता की सज़ा नहीं
यह हमारी ही चेतना का
अधूरा विस्तार है,
जहाँ हम
अपने ही बनाए हुए
प्रतिबिंबों से
लड़ते रहते हैं।
डूबना
यहाँ मृत्यु नहीं,
बल्कि
अधूरी समझ का परिणाम है।
और ऊपर आना
कोई मुक्ति नहीं,
बस एक विराम है
अगली डुबकी से पहले।
कुछ लोग
थककर
डूबना स्वीकार कर लेते हैं,
वे शांत हो जाते हैं
जैसे पानी ने
उनकी सारी बेचैनी
अपने भीतर समा ली हो।
और तभी
कहीं भीतर
एक नई चेतना जन्म लेती है,
जो पूछती है
“क्या यह कुंड सच में है?
या मैं ही
अपने विचारों के जल में
डूब रहा हूँ?”
वह प्रश्न
एक छोटी सी दरार है,
जिससे
प्रकाश की एक रेखा
अंदर उतरती है।
और वही रेखा
धीरे-धीरे
कुंड को
कुंड नहीं रहने देती
वह उसे
एक दर्पण बना देती है,
जिसमें
डूबते-उतराते लोग
पहली बार
खुद को देखते हैं
नरक में नहीं,
बल्कि
अपनी ही अधूरी पहचान में।
और शायद
यही वह क्षण है
जब डूबना
उतरना नहीं,
बल्कि
भीतर की यात्रा बन जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment