अंतर्यामि का आलोक — एक वैदिक दृष्टि
कभी यूँ प्रतीत होता है
यह जो भीतर सूर्योदय है,
वह कोई आकाशीय घटना नहीं,
अपितु आत्मा का
अपने ही प्रकाश में
जागना है।
प्राणों की गति में
एक अग्नि छिपी है—
यज्ञ की लौ-सी,
जो हर श्वास के साथ
अहं की आहुतियाँ माँगती है।
मैं जब “मैं” कहता हूँ,
तो कोई सूक्ष्म स्वर पूछता है
कौन?
देह? मन? बुद्धि?
या वह साक्षी
जो इन सबको आते-जाते देखता है?
वेद कहते हैं
“नेति, नेति”
यह नहीं, यह भी नहीं;
और उसी निषेध में
एक अनकहा स्वीकार उगता है
कि जो शेष है,
वही सत्य है।
रात्रि के नीरव तल में
चंद्र नहीं,
चिदाकाश चमकता है
जहाँ विचार लहर हैं,
और साक्षी
अचल सागर।
कर्म की डोरियाँ
मुझे जगत से बाँधती हैं,
पर हर कर्म के केंद्र में
एक अकर्म का बिंदु है
जहाँ कर्ता विलीन हो जाता है,
और केवल होना शेष रहता है।
मैं देखता हूँ—
राग उठता है, द्वेष ढलता है,
सुख आता है, दुःख जाता है;
पर जो देख रहा है—
वह न आया, न गया।
क्या वही आत्मा है?
या ब्रह्म का प्रतिबिंब?
या दोनों का अभेद
“अहं ब्रह्मास्मि” की
निःशब्द अनुभूति?
जब यह पहचान
क्षण भर को भी जागती है,
तो भीतर का सूर्य-चंद्र
एक ही आलोक में गल जाते हैं
और जगत
न तो त्याज्य लगता है,
न ग्राह्य;
बस देखा हुआ
एक पूर्ण, शांत विस्तार।
तब समझ में आता है
मुक्ति कोई दूर का लोक नहीं,
वह तो दृष्टि का परिवर्तन है;
जहाँ “मैं”
सीमाओं से उतरकर
साक्षी में ठहर जाता है।
और उसी ठहराव में
सब गति थमकर भी
पूर्ण हो जाती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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