धूप का रक़्स और छाँव की सरगोशी
धूप आज
सिर्फ़ उतरती नहीं
वो फैलती है
जैसे कोई राज़
धीरे-धीरे खुल रहा हो।
आसमान की पेशानी से
पिघलती हुई रौशनी
धरती के कंधों पर आकर
ठहर-सी जाती है
मानो थककर
किसी अपने से लिपट गई हो।
और धरती...
वो सिर्फ़ नाचती नहीं,
वो सुनती भी है
हर किरण की आहट,
हर ताप की सरगोशी,
हर जलन में छुपी
एक अजीब-सी राहत।
पत्तों के होंठों पर
धूप का स्वाद है,
और हवाएँ—
वो अब भी चलती हैं,
मगर जैसे किसी ख़्वाब में,
धीमी, मदहोश, बेख़बर।
दूर कहीं
एक साया खड़ा है,
जो इस रक़्स को देखता है
ना धूप में शामिल,
ना छाँव में पूरा,
बस एक गवाह
इस अनकही मोहब्बत का।
कभी लगता है
ये गर्मी, ये तपिश, ये चमक
कोई सज़ा नहीं,
बल्कि वो लम्हा है
जहाँ वजूद
अपने ही उजाले में
खुद को पहचानने लगता है।
और तब—
धूप भी मुस्कुरा देती है,
धरती भी ठहर जाती है,
जैसे दोनों ने
एक ही ख़ामोशी में
अपना इकरार कह दिया हो।
मुकेश ,,
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