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Thursday, 23 April 2026

काल और देश : स्वामी हरिहरानन्द अरण्य के पतंजलि भाष्य के आलोक में

  काल और देश : स्वामी हरिहरानन्द अरण्य के पतंजलि भाष्य के आलोक में

भारतीय योग-दर्शन में “काल” और “देश” को सामान्यतः भौतिक जगत के आधारभूत तत्त्व माना जाता है, परंतु Swami Hariharananda Aranya के अनुसार ये स्वतंत्र सत्ता नहीं रखते, बल्कि “परिवर्तन” और “स्थिति” के बोध से उत्पन्न अवधारणाएँ हैं। योगसूत्रों के संदर्भ में इनका अध्ययन साधक को “नित्य” और “अनित्य” के भेद को समझने में सहायता देता है।


1. काल (Time) का स्वरूप

अरण्य जी के अनुसार “काल” वस्तुतः “क्षणों की श्रृंखला” (sequence of moments) है। यह कोई स्वतंत्र द्रव्य नहीं, बल्कि परिवर्तन (परिणाम) का बोध है।


जब हम किसी वस्तु में परिवर्तन देखते हैं, तो “काल” का अनुभव होता है

बिना परिवर्तन के काल का अस्तित्व अनुभव नहीं किया जा सकता

यह विचार Kshana की धारणा से जुड़ा है, जहाँ हर वस्तु क्षण-क्षण बदलती रहती है।


मुख्य बिंदु:


काल = परिवर्तन का माप

काल का अनुभव = चित्त की प्रक्रिया

2. देश (Space) का स्वरूप

“देश” को अरण्य जी “वस्तुओं के बीच दूरी और स्थिति का बोध” मानते हैं।


देश कोई ठोस वस्तु नहीं, बल्कि “सापेक्ष संबंध” (relative relation) है

वस्तुओं के बीच अंतर न हो, तो देश की अनुभूति भी समाप्त हो जाती है

इस प्रकार देश भी एक मानसिक-व्यावहारिक अवधारणा है, जो चित्त के माध्यम से अनुभव की जाती है।


3. चित्त, काल और देश का संबंध

अरण्य जी का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि—


काल और देश, दोनों “चित्त-वृत्तियों” से संबंधित हैं

चित्त के बिना न काल का अनुभव संभव है, न देश का

Chitta Vritti के माध्यम से ही हम अतीत, वर्तमान, भविष्य (काल) और यहाँ-वहाँ (देश) का अनुभव करते हैं।


समाधि की अवस्था में:


चित्त स्थिर हो जाता है

काल और देश का बोध लुप्त हो जाता है

यही कारण है कि गहन ध्यान में साधक “कालातीत” और “देशातीत” अनुभव करता है।


4. काल-देश और परिवर्तन (परिणाम)

योगसूत्रों में “परिणाम” (transformation) का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरण्य जी बताते हैं—


हर वस्तु निरंतर बदल रही है

इस परिवर्तन के कारण ही काल का बोध होता है

और वस्तुओं की स्थिति के कारण देश का बोध होता है

इस प्रकार काल और देश, दोनों “प्रकृति के गुणों” के खेल से उत्पन्न हैं।


5. आध्यात्मिक दृष्टि से काल-देश का अतिक्रमण

ज्ञानयोग और ध्यान के माध्यम से साधक—


काल (जन्म-मरण, अतीत-भविष्य) से ऊपर उठता है

देश (यहाँ-वहाँ, सीमाएँ) से परे जाता है

अरण्य जी के अनुसार, जब साधक “द्रष्टा” (पुरुष) में स्थित हो जाता है, तब—


वह न काल से बंधा रहता है

न देश से सीमित

यह अवस्था “कैवल्य” की ओर संकेत करती है।


6. आधुनिक विज्ञान से सामंजस्य

अरण्य जी के विचार आधुनिक भौतिकी के कुछ सिद्धांतों से भी मेल खाते हैं—


जैसे Relativity में समय और स्थान (space-time) सापेक्ष माने गए हैं

वैसे ही योग-दर्शन में भी काल और देश को स्वतंत्र और स्थायी नहीं माना गया

इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन योग-दर्शन और आधुनिक विज्ञान दोनों, वास्तविकता को “सापेक्ष” और “परिवर्तनशील” मानते हैं।

Swami Hariharananda Aranya के अनुसार “काल” और “देश” कोई परम सत्य नहीं, बल्कि

चित्त के अनुभव

प्रकृति के परिवर्तन

और सापेक्ष संबंधों की अभिव्यक्ति

हैं। ज्ञानयोग का साधक इन सीमाओं को पहचानकर उनसे परे जाता है और उस “नित्य, अचल, निरपेक्ष” सत्य का अनुभव करता है, जहाँ न समय का बंधन है, न स्थान की सीमा।


Mukesh ,,,,,,,,,,

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