उसकी दिनचर्या में अब कोई शोर नहीं—बस एक धीमा-सा खालीपन है”
सुबह वह उठती है—जैसे नींद ने नहीं, आदत ने जगाया हो।
चाय का पानी चढ़ता है, अख़बार दरवाज़े पर गिरता है, और घड़ी की टिक-टिक पूरे घर में फैल जाती है।
सब कुछ वैसा ही है—सालों से—बस अब उन ध्वनियों के बीच कोई पुकार नहीं बची।
साठ साल की उम्र में उसकी दिनचर्या एक सुव्यवस्थित वृत्त बन चुकी है—
जहाँ हर काम अपने समय पर होता है,
पर किसी भी काम का इंतज़ार नहीं होता।
वह रसोई में जाती है,
जैसे कोई कर्म निभा रही हो
न कि किसी के लिए कुछ बना रही हो।
पहले चूल्हे की आंच में रिश्तों की गर्मी होती थी,
अब गैस की लौ बस खाना पका देती है—दिल नहीं।
घर सजा हुआ है
साफ़, शांत, व्यवस्थित
पर इस व्यवस्था में एक अजीब-सी जड़ता है।
जैसे हर चीज़ अपनी जगह पर है,
और जीवन कहीं नहीं।
कभी-कभी वह खिड़की के पास बैठती है
बाहर की दुनिया को देखती हुई
पर भीतर कोई लहर नहीं उठती।
न उत्सुकता, न बेचैनी
बस एक गहरा, स्थिर खालीपन।
उसका मौन अब शांति नहीं है—
यह वह सन्नाटा है
जो बहुत कुछ सह लेने के बाद आता है।
दिन बीतते हैं
बिना किसी घटना के, बिना किसी हलचल के
और वह जीती रहती है,
जैसे जीवन अब अनुभव नहीं,
केवल एक नियमित प्रक्रिया हो।
उसकी दिनचर्या सच में शोरहीन है
पर यह शांति नहीं,
बल्कि एक ऐसा ठहराव है
जहाँ भावनाएँ धीरे-धीरे जमकर
पत्थर बन गई हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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