हम मिलते हैं
जैसे दो चुप्पियाँ
एक-दूसरे को सुनने आई हों।
न कोई तय समय
न कोई औपचारिक कारण
फिर भी
किसी अदृश्य लय में
हम मिल ही जाते हैं।
तुम सामने बैठी होती हो
मैं तुम्हारे सामने
बीच में
एक मेज़
और उससे भी अधिक
एक गहरा मौन।
“कुछ लोग चुप क्यों रहते हैं?”
तुम कभी-कभी पूछती हो
मैं मुस्कुरा देता हूँ
“शायद इसलिए कि
वे बहुत कुछ कहना चाहते हैं…”
तुम भी मुस्कुरा देती हो
और फिर
हम दोनों चुप।
यह चुप्पी
कभी भारी नहीं होती
न ही असहज
यह वैसी चुप्पी है
जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती
क्योंकि जो कहना है
वह पहले से ही समझा जा चुका होता है।
तुम अपनी उँगलियों से
कप के किनारे को छूती रहती हो
मैं तुम्हें देखता रहता हूँ
कोई जल्दी नहीं होती
कोई लक्ष्य नहीं होता
बस एक साथ होना होता है
बिना किसी शर्त के।
तुम कुछ कहती हो
बीच में रुक जाती हो
मैं पूछता नहीं
क्योंकि जानता हूँ
हर बात पूरी होना ज़रूरी नहीं होती।
हमारे बीच
न वादे हैं
न अधिकार
न भविष्य की कोई रूपरेखा
फिर भी
एक अजीब-सी निकटता है
जो बिना नाम के
धीरे-धीरे गहराती रहती है।
कभी-कभी
मैं सोचता हूँ
क्या यह भी प्रेम है?
पर फिर
इस प्रश्न को छोड़ देता हूँ
क्योंकि
हर चीज़ को नाम देना
उसे सीमित कर देता है।
हम उठते हैं
चलने के लिए
तुम कहती हो
“चलो…”
मैं कहता हूँ
“हाँ…”
और इस “हाँ” में
थोड़ा-सा रुकना होता है
जो दोनों महसूस करते हैं
पर कहते नहीं।
तुम अपनी दिशा में
मैं अपनी दिशा में
पर वह मौन
जो हमारे बीच था
वह वहीं नहीं रहता
वह साथ चला आता है
हमारे भीतर।
हम मिलते हैं
कम ही सही
पर हर बार ऐसा लगता है
जैसे दो चुप्पियाँ
फिर से
एक-दूसरे को सुनने आई हों।
कुछ रिश्ते बोले नहीं जाते,
वे बस सुने जाते हैं
मौन में,
धीरे-धीरे,
गहराई से।
मुकेश ,,,,,,,,
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