जब समुद्र ने नक्शा लिखा
नक्शे काग़ज़ पर नहीं जन्मे थे,
वे पहले लहरों की पीठ पर बने थे।
जब मनुष्य ने रेखाएँ खींचना सीखा भी नहीं था,
समुद्र पहले ही
तटों को छू-छूकर
अपना भूगोल लिख रहा था।
न कोई स्याही,
न कोई पैमाना—
बस ज्वार का उठना,
भाटे का लौटना,
और लहरों की उँगलियों से
रेत पर खिंचती अस्थायी सीमाएँ।
किसी नाव ने जब पहली बार
क्षितिज को पार किया,
तो उसे लगा
वह खोज रहा है।
पर समुद्र मुस्कुराया
“मैं तो सदियों से
इन राहों को जानता हूँ।”
हवाएँ दिशाओं की दुभाषिया थीं,
तारे रात के कम्पास।
मछुआरों की आँखों में
पहला मानचित्र चमका था
जहाँ डर भी था,
और भरोसा भी।
समुद्र ने नक्शा लिखा
तो उसमें कोई सरहद नहीं थी;
सिर्फ़ प्रवाह था।
रेखाएँ मनुष्य ने जोड़ीं
नाम दिए,
दावे किए,
ध्वज गाड़े।
पर लहरें हर सुबह
उन रेखाओं को धो देतीं।
समुद्र का नक्शा
स्थिर नहीं होता
वह बदलता है,
जैसे स्मृति,
जैसे समय।
कभी एक तट डूब जाता है,
कभी कोई नया द्वीप उभर आता है।
मानचित्रों के अहंकार से परे
समुद्र कहता है—
“धरती किसी की निजी नहीं,
बस क्षणिक ठहराव है।”
जब समुद्र ने नक्शा लिखा,
तो उसने मनुष्य को भी अंकित किया
एक छोटी-सी नाव की तरह,
जो खुद को केंद्र समझ बैठी।
पर असल केंद्र
लहरों का चक्र था
आना, जाना, लौटना।
आज भी
अगर ध्यान से सुनो,
तो ज्वार की आवाज़ में
एक पुराना भूगोल गूँजता है
जहाँ सीमाएँ नहीं,
सिर्फ़ संबंध हैं।
और तब समझ आता है
नक्शा कभी काग़ज़ पर नहीं था;
वह हमेशा
समुद्र की साँस में लिखा गया था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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