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Tuesday, 24 February 2026

अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती…

 अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती…


अगर क्रिस्टोफर कोलंबस 

ने दिशा न बदली होती,

अगर उसकी आँखों में

सोने का स्वप्न न चमका होता,

तो क्या महाद्वीप

अपने नाम बदलते?


समुद्र तब भी उतना ही नीला था,

आकाश उतना ही अनंत।

लहरें किसी ध्वज की भाषा नहीं जानतीं,

वे सिर्फ़ तट पहचानती हैं।


अगर वह पश्चिम की ओर न मुड़ा होता,

तो क्या पूर्व स्थिर रहता?

या हवाएँ किसी और पाल को

उसी रहस्य तक ले जातीं?


इतिहास कहता है—

“उसने खोज लिया।”

पर जंगलों, नदियों, जनजातियों ने

कभी खुद को खोया हुआ नहीं माना।


खोज

अक्सर आने वाले की घोषणा होती है,

न कि वहाँ पहले से मौजूद जीवन की।


अगर दिशा न बदली जाती,

तो शायद

मानचित्रों की रेखाएँ देर से खिंचतीं,

पर धरती की धड़कन

वैसी ही रहती।


नदियाँ अपनी धारा में,

जनजातियाँ अपनी आग के चारों ओर,

आकाश अपने तारों सहित।


किसी नाव का न पहुँचना

किसी भूमि का न होना नहीं होता।


और अगर वह न मुड़ता,

तो क्या हम कम जटिल होते?

कम विभाजित?

कम विजित?


या इतिहास

बस किसी और नाम से

वही कहानी दोहराता?


दिशा बदलना

सिर्फ़ समुद्री निर्णय नहीं था

वह समय की धुरी पर

एक मोड़ था।


पर कभी-कभी सोचता हूँ

धरती गोल थी,

वह खुद ही सबको

एक-दूसरे तक ले आती।


शायद देर से,

शायद कम शोर में,

शायद बिना “खोज” के शोरगुल के।


अगर कोलंबस ने दिशा न बदली होती,

तो भी महाद्वीप होते,

समुद्र होते,

मनुष्य होते


बस इतिहास

थोड़ा कम अहंकारी होता।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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