इंतज़ार करती औरत
शाम के झुटपुटे में
वह दरवाज़े की चौखट के पास
कुछ देर यूँ ही खड़ी रहती है
जैसे हवा से पूछ रही हो
कदमों की आहट का हाल।
चाय दो बार गरम हो चुकी है,
रोटी तवे से उतर कर
ढक दी गई है,
और दीवार पर लगी घड़ी
उसे हर मिनट
थोड़ा और समझदार बना रही है।
वह जानती है
इंतज़ार सिर्फ़ किसी के आने का नहीं होता,
कभी-कभी
अपने हिस्से की क़दर का भी होता है।
मोबाइल मेज़ पर रखा है,
स्क्रीन बार-बार नहीं देखती,
पर हर हल्की-सी आवाज़ पर
दिल ज़रूर चौंक जाता है।
वह बाहर से शांत है,
भीतर से हल्की-सी हलचल।
आँखों में शिकायत कम,
आदत ज़्यादा है।
दरवाज़ा अब भी बंद है।
रात थोड़ी और गहरी।
वह धीरे से कुंडी लगा देती है
जैसे उम्मीद को
आज के लिए
आराम दे रही हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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