झाड़ू बुहारती औरत
सुबह की हल्की ठंड में
वो आँगन में झाड़ू लगाती है।
धूल की महीन परत
रात भर चुपचाप जमी थी
जैसे कुछ अनकही बातें
दिल पर उतर आती हैं।
उसके हाथ
आदत से चलते हैं।
झाड़ू की सरसराहट
एक सीधी, थकी हुई लय
जिसमें न शिकायत है
न उतावलापन।
वो कोनों में जमी गंदगी
बड़ी सफ़ाई से खींच लाती है,
दरवाज़े के पास ढेर बना देती है
जैसे हर बिखराव को
काबू में करना
उसकी फितरत हो।
उसे मालूम है
धूल रोज़ लौटेगी।
फिर भी
वो हर सुबह
उसी समर्पण से
उसे बाहर कर आती है।
मगर एक चीज़ है
जो हर रोज़ लौटती है
और ढेर बनाकर
दरवाज़े से बाहर नहीं जाती।
वो है
उसके भीतर की थकान,
अनसुनी आवाज़ें,
अधूरे सपनों की किरचें।
उन्हें वो
झाड़ू से नहीं समेट पाती।
झुकते-झुकते
उसकी कमर में
सिर्फ़ उम्र नहीं,
कुछ चुप रह जाने की आदत भी भर गई है।
कभी वो सोचती है
क्या दुःख भी धूल होते
तो कितना आसान होता—
एक किनारे इकट्ठा करती,
कूड़ेदान में डाल आती,
और आँगन की तरह
दिल भी चमक उठता।
पर दुःख
कोनों में नहीं जमते
वो साँसों में बसते हैं।
आँगन साफ़ हो जाता है।
फर्श पर पानी का छिड़काव,
हल्की-सी ठंडक,
संतोष की एक रेखा।
वो सीधी होकर
चारों ओर देखती है
सब कुछ व्यवस्थित।
बस एक जगह
अब भी धूल बाकी है
उसके भीतर।
और वहाँ
वो हर सुबह
झाड़ू नहीं लगा पाती।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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