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Wednesday, 25 February 2026

अकेलापन

 अकेलापन

जब अकेलापन

सिर्फ़ ख़ाली बिस्तर नहीं होता,

बल्कि

ख़ाली आत्मा की सिसकी बन जाता है


तो जिस्म

किसी जिस्म को नहीं,

दिल

किसी दिल को तरसता है।


रात

बाहों की तलबगार नहीं होती,

वो तो

किसी की आवाज़ माँगती है

जो कहे

मैं हूँ।


तकिए गवाह हैं

उन ख़ामोश बातों के,

जो होंठों तक आते-आते

रूह में ही दम तोड़ देती हैं।


यह प्यास

लम्स की नहीं,

एहसास की है

कोई पेशानी पर हाथ रख दे

और पूछ ले,

आज बहुत थक गए हो?


दिल चाहता है

कोई पास बैठे

बिना छुए,

और फिर भी

इतना क़रीब हो

कि तन्हाई शर्मिंदा हो जाए।


यह कमी

बदन की नहीं,

हमनफ़स की है—

जिसके साथ

ख़ामोशी भी

सुकून बन जाए।


अजीब बात है

भीड़ में भी

आदमी तन्हा रह जाता है,

अगर कोई

उसकी रूह तक

न पहुँचे।


और तब समझ आता है

कि मोहब्बत

बिस्तर में नहीं,

नज़र में होती है।

छुअन में नहीं,

ठहराव में होती है।


जब कोई

दिल से कहे—

तुम्हें देखा है,

समझा है,

और अब

छोड़ूँगा नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,

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