परित्यक्ता का गुप्त प्रेम —
" जो न स्वीकार सकी, न मना कर सकी…"
वो स्त्री थी
टूटी नहीं थी,
बस समेट ली थी खुद को
एक पुराने संदूक़ में,
जिसमें कुछ चिट्ठियाँ थीं,
कुछ अधूरी नींदें,
और एक नाम
जो कभी पुकारा नहीं गया।
वो प्रेम था…
छूटा नहीं था,
बस छिपा लिया गया था
पलकों के पीछे,
जहाँ आँसू नहीं जाते,
सिर्फ़ स्मृतियाँ ठहरती हैं
बेआवाज़…
उसने न "हाँ" कहा,
न "ना"
क्योंकि वो आवाज़
किसे सुनाई देती है
जिसे दुनिया ने
"परित्यक्ता" कहकर
पहचान से परे रख दिया?
उसका प्रेम
कोई कविता नहीं बना,
कोई मांग का सिंदूर नहीं,
बस एक सिसकी थी
हर बार साँझ के धुँधलके में
जो खुद को छूकर
खुद में लौट जाती थी।
उसने उसे
हर रोज़ सोचा,
हर रोज़ छोड़ा भी
क्योंकि कोई भी स्त्री
हर बार नहीं कह सकती
कि वो अब भी किसी को
चुपचाप चाहती है।
वो प्रेम
उसके कमरे की दीवारों पर
छाया बनकर रहता था,
जो दिन में ओझल था
पर रात में उसे
सपनों की तरह छू लेता।
हाँ,
वो प्रेम था
जो न ज़ुबां पर आया,
न दुनिया की आँखों में ठहरा
पर उसके भीतर
एक नदी की तरह
चुपचाप बहता रहा…
और शायद
इसीलिए
वो न स्वीकार सकी,
न मना कर सकी
क्योंकि कुछ प्रेम
किसी उत्तर के लिए नहीं होते।
वो बस होते हैं।
चुप।
गहरे।
सच।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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