“गंध, जो प्रेम से नहीं, संकोच से उपजी थी”
गंध थी वहाँ,
पर वो चंपा की तरह न थी —
वो गंध भय की थी,
भीतर पिघलते निर्णय की,
जिसे कभी किसी ने चूमा नहीं था।
वो स्पर्श नहीं था,
वो एक छाया थी जो शरीर की देहरेखाओं से
कभी टकराई, कभी लौट गई।
वो गंध प्रेम की नहीं,
संकोच की एक भाप थी — जो
कपड़ों में क़ैद रही, आत्मा से नहीं निकली।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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