कम्पास, साम्राज्य और मसालों की गंध
एक छोटी-सी सुई
काँच के भीतर काँपती थी—
उसे दिशा कहते थे।
उस सुई के पीछे
कितने स्वप्न बँधे थे—
सोना,
नए बाज़ार,
दूर देशों की कथाएँ।
कम्पास ने उत्तर दिखाया,
पर आँखों ने लाभ देखा।
समुद्र के उस पार
काली मिर्च की तीखी गंध थी,
दालचीनी की गरमाहट,
इलायची की मीठी साँस।
मसाले सिर्फ़ स्वाद नहीं थे—
वे साम्राज्यों की भूख थे।
पाल खुली,
नक्शे फैले,
और एक सुई
धीरे-धीरे
व्यापार से अधिकार तक पहुँच गई।
कम्पास निष्पक्ष था—
उसे न मसालों से प्रेम,
न भूमि से।
पर मनुष्य की आकांक्षा
उसकी दिशा में अर्थ भरती रही।
जहाज़ों की लकड़ी में
नमक जमा था,
और महत्वाकांक्षा भी।
हर बंदरगाह
एक अवसर था—
या एक अधिग्रहण।
मसालों की गंध
रसोई से निकलकर
दरबारों तक पहुँची।
स्वाद ने राजनीति को छुआ,
और राजनीति ने भूगोल को।
एक सुई काँपी—
और नक्शे बदल गए।
कम्पास ने कभी नहीं कहा—
“विजय करो।”
उसने बस दिशा दी।
पर दिशा जब लालच से मिलती है,
तो वह मार्ग नहीं,
मार्गक्रमण बन जाती है।
आज भी
किसी बाज़ार में
जब काली मिर्च की खुशबू आती है,
तो उसमें हल्की-सी
समुद्री हवा घुली होती है।
याद दिलाती है—
कि इतिहास
सिर्फ़ युद्धों से नहीं,
स्वादों से भी बदलता है।
कम्पास अब भी उत्तर दिखाता है,
पर साम्राज्य टूट चुके हैं।
मसालों की गंध
अब भी वही है—
तीखी, जीवित, स्वतंत्र।
और शायद
सुई ने अंततः यही सीखा—
दिशा देना सरल है,
पर दिशा का नैतिक अर्थ
मनुष्य तय करता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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