लघु उपन्यास : भाग – 3-अध्याय 3-अस्तित्व और साक्षी -: दर्पण का रहस्य
सभागार से बाहर निकलते ही शाम पूरी तरह उतर चुकी थी।
पुस्तक मेले की रोशनियाँ अब अधिक चमकीली लग रही थीं।
किताबों के स्टॉल के ऊपर लगी पीली और सफ़ेद लाइटें हवा में हल्का-सा कंपन पैदा कर रही थीं।
लोग अब भीड़ में धीरे-धीरे चल रहे थे
किसी के हाथ में नई खरीदी किताबें थीं,
कोई कॉफ़ी का कप लिए बातचीत में डूबा था।
पर अस्तित्व के भीतर एक अलग ही हलचल थी।
साक्षी का प्रश्न उसके मन में बार-बार लौट रहा था—
“क्या यह संभव है कि हम किसी दूसरे से नहीं,
बल्कि अपनी ही चेतना से प्रेम करने लगें?”
वह कुछ कदम आगे बढ़ा, फिर रुक गया।
साक्षी थोड़ी दूर खड़ी थी।
उसके हाथ में एक किताब थी, पर वह पढ़ नहीं रही थी।
बस पन्नों को ऐसे ही धीरे-धीरे पलट रही थी।
अस्तित्व उसके पास पहुँचा।
“तुम्हारे प्रश्न आज भी पहले जैसे ही हैं,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
साक्षी ने किताब बंद कर दी।
“और तुम्हारे उत्तर भी…
आज भी पूरे नहीं होते।”
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
भीड़ उनके आसपास बह रही थी—
जैसे कोई नदी किनारे खड़े दो लोगों के पास से निकलती चली जाए।
अस्तित्व ने धीरे से पूछा—
“तुमने वह प्रश्न क्यों पूछा?”
साक्षी ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में कोई रहस्य नहीं था,
पर फिर भी उनमें एक गहराई थी जिसे तुरंत समझ पाना आसान नहीं था।
“क्योंकि मुझे हमेशा लगता है,” उसने धीरे से कहा,
“कि हम दोनों का संवाद किसी सामान्य परिचय से थोड़ा अलग है।”
अस्तित्व ने हल्के से सिर झुकाया।
“अलग कैसे?”
साक्षी ने कुछ क्षण सोचा।
“क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है,” वह बोली,
“कि हम दोनों जब बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे दो लोग नहीं…
बल्कि एक ही विचार खुद से बातचीत कर रहा हो?”
अस्तित्व ने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि सच यह था कि यह अनुभूति उसे कई बार हुई थी।
कभी-कभी साक्षी वह प्रश्न पूछ देती थी
जो उसके मन में कुछ क्षण पहले ही उठा होता था।
कभी-कभी वह वही बात कह देती थी
जिसे वह शब्द देने की कोशिश कर रहा होता था।
साक्षी ने आगे कहा—
“मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है
कि मैं तुम्हें बाहर नहीं,
कहीं भीतर से जानती हूँ।”
अस्तित्व ने धीरे से कहा
“और मुझे कभी-कभी लगता है
कि तुम वही प्रश्न पूछती हो
जिनसे मैं खुद भी बच नहीं सकता।”
दोनों हल्के से मुस्करा दिए।
पर उस मुस्कान के पीछे अब एक नई जिज्ञासा भी थी।
तभी पीछे से नील की आवाज़ आई
“अरे आप दोनों यहाँ खड़े हैं!
मैं तो समझा था कि अब तक दर्शन की कोई नई किताब लिखने बैठ गए होंगे।”
नील हाथ में कॉफ़ी के दो कप लिए खड़ा था।
“लीजिए, थोड़ी कॉफ़ी पी लीजिए।
इतने गंभीर संवाद बिना कॉफ़ी के पूरे नहीं होते।”
तीनों पास के एक छोटे से खुले कैफ़े की ओर चल पड़े।
टेबल पर बैठते ही नील ने साक्षी से पूछा—
“आप लोग कब से एक-दूसरे को जानते हैं?”
साक्षी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा
“यह सवाल थोड़ा कठिन है।”
नील हँस पड़ा
“क्यों? क्या साल याद नहीं?”
अस्तित्व ने धीरे से कहा—
“शायद इसलिए कि यह परिचय समय से नहीं शुरू हुआ था।”
नील ने भौंहें उठाईं—
“यह तो और भी रहस्यमय बात हो गई।”
साक्षी ने कॉफ़ी का कप हाथ में लिया।
“कभी-कभी कुछ लोग हमारे जीवन में ऐसे आते हैं
जिनसे मिलकर लगता है कि यह पहली मुलाक़ात नहीं है।”
नील ने मज़ाक में कहा—
“ओह, तो यह बात उस श्रेणी की है जिसे लोग ‘पिछले जन्म’ कहकर समझाते हैं?”
अस्तित्व ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“शायद नहीं।
मुझे लगता है कि यह उससे भी सरल है।”
नील ने उत्सुकता से पूछा
“कैसे?”
अस्तित्व ने धीरे-धीरे कहा—
“कभी-कभी हम किसी व्यक्ति में अपने ही किसी भूले हुए हिस्से को पहचान लेते हैं।
और जब वह हिस्सा हमारे सामने खड़ा होता है
तो हमें लगता है कि यह व्यक्ति नया नहीं है—
यह तो हमेशा से हमारे भीतर था।”
नील कुछ क्षण चुप रहा।
फिर मुस्कराकर बोला
“अगर आप दोनों इसी तरह बातें करते रहे
तो मुझे सच में लगने लगेगा कि मैं किसी दार्शनिक उपन्यास के बीच बैठा हूँ।”
तीनों हँस पड़े।
पर उसी क्षण साक्षी ने एक ऐसा वाक्य कहा
जिससे अस्तित्व के भीतर फिर एक हल्की-सी लहर उठी।
उसने शांत स्वर में कहा—
“अस्तित्व, क्या तुम्हें याद है…
हमारी पहली बातचीत में भी तुमने यही बात कही थी।”
अस्तित्व ने तुरंत उसकी ओर देखा।
“तुम्हें याद है?”
साक्षी ने सिर हिलाया।
“मुझे लगभग हर बात याद है।”
फिर उसने धीरे से जोड़ा—
“क्योंकि मुझे हमेशा लगता रहा है
कि हमारी बातचीत केवल शब्द नहीं है…
यह किसी गहरी यात्रा का हिस्सा है।”
अस्तित्व ने उस क्षण पहली बार स्पष्ट रूप से महसूस किया—
शायद साक्षी सचमुच केवल एक व्यक्ति नहीं है।
शायद वह एक दर्पण है
जिसमें वह अपने ही मन की उन परतों को देख रहा है
जिन्हें उसने वर्षों से छूने की कोशिश नहीं की थी।
मेले की रोशनियाँ अब और गहरी हो गई थीं।
दूर कहीं किसी मंच पर कविता पाठ शुरू हो गया था।
और उसी शोर और रोशनी के बीच
अस्तित्व को पहली बार यह लगा
इस कहानी का रहस्य
शायद साक्षी में नहीं है।
रहस्य तो उस चेतना में है
जो दोनों के बीच चुपचाप काम कर रही है।
और शायद…
यह रहस्य अभी पूरी तरह खुलने वाला नहीं था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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