लघु उपन्यास : भाग – 3 अध्याय 4 : अस्तित्व और साक्षी -स्मृति जो साझा थी
कैफ़े की मेज़ पर रखे कॉफ़ी के कप अब लगभग खाली हो चुके थे।
भीड़ थोड़ी कम हो गई थी।
रात गहरा रही थी और पुस्तक मेले की रोशनियाँ अब एक हल्की थकान के साथ चमक रही थीं।
नील किसी परिचित से मिलने के लिए कुछ देर के लिए उठ गया।
अब मेज़ पर केवल अस्तित्व और साक्षी रह गए थे।
कुछ क्षण तक दोनों चुप बैठे रहे।
ऐसी चुप्पी जो असहज नहीं होती
बल्कि जैसे दो लोग किसी एक ही विचार के भीतर बैठे हों।
साक्षी ने अचानक पूछा
“तुम्हें एक बात पूछनी है।”
अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।
“पूछो।”
साक्षी ने थोड़ी देर सोचा, जैसे शब्दों को सावधानी से चुन रही हो।
“क्या तुम्हें कभी ऐसा लगा है कि कोई स्मृति…
जो तुम्हारी है ही नहीं…
फिर भी तुम्हारे भीतर मौजूद है?”
अस्तित्व ने हल्की भौंहें सिकोड़ लीं।
“तुम्हारा मतलब?”
साक्षी ने धीरे-धीरे कहा
“जैसे कोई दृश्य…
कोई जगह…
कोई अनुभव…
जिसे तुमने कभी देखा नहीं,
पर वह तुम्हारे भीतर किसी याद की तरह मौजूद हो।”
अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—
“हाँ… ऐसा कई बार हुआ है।”
साक्षी ने तुरंत उसकी ओर देखा।
“सच?”
अस्तित्व ने सिर हिलाया।
“कभी-कभी मुझे एक अजीब-सा दृश्य याद आता है—
एक पुरानी-सी लाइब्रेरी…
लकड़ी की ऊँची अलमारियाँ…
खिड़की से आती हल्की धूप…
और वहाँ कोई बैठा है…
किताब पढ़ रहा है।”
साक्षी की आँखों में अचानक एक चमक-सी आई।
उसने धीरे से पूछा—
“और वह कौन है?”
अस्तित्व ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“यह तो मुझे कभी साफ़ दिखाई नहीं देता।
बस इतना लगता है कि वह व्यक्ति…
मुझे देख रहा है।”
कुछ क्षण के लिए दोनों के बीच गहरी खामोशी छा गई।
साक्षी ने बहुत धीरे से कहा
“अजीब बात है…”
अस्तित्व ने पूछा
“क्या?”
साक्षी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्योंकि मुझे भी कई बार एक दृश्य याद आता है।”
अस्तित्व का ध्यान अब पूरी तरह उस पर था।
“कैसा दृश्य?”
साक्षी ने धीमे-धीमे कहा—
“एक पुरानी लाइब्रेरी…
लकड़ी की अलमारियाँ…
खिड़की से आती धूप…
और वहाँ एक आदमी बैठा है—
किताब पढ़ते हुए।”
अस्तित्व का चेहरा कुछ क्षण के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया।
“और…?” उसने धीरे से पूछा।
साक्षी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“और मुझे हमेशा लगता है कि वह आदमी
तुम हो।”
दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे।
यह केवल संयोग भी हो सकता था।
या शायद केवल कल्पना।
पर उस क्षण दोनों को लगा
कि इस बात को तुरंत किसी तर्क से समझा देना शायद जल्दीबाज़ी होगी।
अस्तित्व ने धीरे से कहा
“तुम्हें यह स्मृति कब से आती है?”
साक्षी ने सोचा।
“शायद कई सालों से।
पर उस समय मुझे यह समझ नहीं आता था कि वह कौन है।”
“और अब?” अस्तित्व ने पूछा।
साक्षी ने शांत स्वर में कहा—
“अब जब भी वह दृश्य आता है…
तो चेहरा साफ़ दिखाई देने लगता है।”
अस्तित्व ने गहरी साँस ली।
उसे अचानक लगा जैसे उसके भीतर कोई पुराना दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा है।
क्या यह केवल मन का खेल है?
या सचमुच मनुष्य की चेतना कभी-कभी ऐसे रहस्य भी रच देती है
जिन्हें साधारण तर्क से समझना कठिन होता है?
तभी नील वापस आ गया।
“ओह! आप दोनों फिर उसी गंभीर मुद्रा में आ गए।”
वह हँसते हुए कुर्सी पर बैठ गया।
“कहीं ऐसा तो नहीं कि आपने मिलकर कोई नया दार्शनिक सिद्धांत बना लिया?”
अस्तित्व ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“नहीं… अभी हम सिर्फ़ एक स्मृति के बारे में बात कर रहे थे।”
नील ने मज़ाक में कहा—
“अच्छा! साझा स्मृतियाँ?”
साक्षी ने उसकी ओर देखकर शांत स्वर में कहा—
“शायद।”
नील ने हँसते हुए कहा—
“तो फिर यह कहानी सचमुच रोचक होती जा रही है।”
पर अस्तित्व उस समय हँस नहीं रहा था।
क्योंकि उसके मन में एक नया विचार जन्म ले रहा था—
क्या यह संभव है
कि मनुष्य की चेतना किसी अदृश्य स्तर पर
एक-दूसरे से जुड़ी हुई हो?
और अगर ऐसा है…
तो शायद साक्षी केवल एक व्यक्ति नहीं है।
वह उस अदृश्य संवाद की आवाज़ हो सकती है
जो उसकी चेतना बहुत पहले से सुन रही थी।
रात अब गहरी हो चुकी थी।
मेले की कुछ लाइटें बुझने लगी थीं।
लोग धीरे-धीरे बाहर की ओर जा रहे थे।
अस्तित्व ने आसमान की ओर देखा।
कभी-कभी जीवन के सबसे बड़े रहस्य
किसी बड़े चमत्कार की तरह नहीं आते—
वे बस
दो लोगों की एक साधारण-सी बातचीत में
धीरे-धीरे खुलने लगते हैं।
और शायद…
अभी इस कहानी का सबसे गहरा अध्याय
आना बाकी था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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