लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 -अध्याय 6 : पुरानी डायरी का पन्ना
रात के बाद शहर धीरे-धीरे अपनी सामान्य गति में लौट आया था।
अस्तित्व अपने कमरे में बैठा था।
कमरे की खिड़की आधी खुली थी और बाहर की सड़क की हल्की रोशनी भीतर आ रही थी।
टेबल पर किताबों का ढेर, कुछ कागज़, और एक पुराना लकड़ी का पेन-स्टैंड रखा था—जैसे हर चीज़ किसी शांत प्रतीक्षा में हो।
पुस्तक मेले से लौटे कई घंटे बीत चुके थे, पर नींद अभी तक नहीं आई थी।
साक्षी के शब्द,
वह साझा सपना,
और वह अजीब-सी लाइब्रेरी वाली स्मृति—
सब उसके भीतर एक अनकहे प्रश्न की तरह घूम रहे थे।
अस्तित्व ने खिड़की से बाहर देखा।
रात का शहर हमेशा उसे एक अलग तरह की शांति देता था।
दिन में जो चीज़ें स्पष्ट और निश्चित लगती हैं, वे रात में थोड़ी रहस्यमय हो जाती हैं—जैसे हर वस्तु अपने भीतर एक दूसरी कहानी छुपाए बैठी हो।
उसने टेबल की दराज़ खोली।
दराज़ में कई पुरानी चीज़ें थीं
कुछ पत्र,
कुछ अधूरी नोटबुक,
और एक मोटी, हल्की पीली पड़ चुकी डायरी।
यह डायरी उसने कई साल पहले लिखी थी।
उस समय वह जीवन के उन प्रश्नों से जूझ रहा था
जो किसी किताब से हल नहीं होते।
अस्तित्व ने डायरी उठाई।
उसके पन्नों से हल्की-सी पुरानी काग़ज़ की गंध उठी
जैसे समय की अपनी कोई स्मृति हो।
वह धीरे-धीरे पन्ने पलटने लगा।
कुछ पन्नों पर छोटे-छोटे विचार लिखे थे,
कुछ पर आधी अधूरी कविताएँ,
कहीं किसी पुस्तक का उद्धरण।
अचानक उसका हाथ एक पन्ने पर रुक गया।
उस पन्ने के ऊपर तारीख़ लिखी थी
“17 अगस्त — कई वर्ष पहले”
अस्तित्व ने ध्यान से पढ़ना शुरू किया।
उसमें लिखा था:
“आज फिर वही अजीब-सा सपना आया।
एक लंबी सड़क…
दोनों तरफ़ पुराने पेड़…
आगे नदी…
और पत्थर का छोटा-सा घाट।
वहाँ कोई खड़ा था।
मैं उसका चेहरा साफ़ नहीं देख पाया।
पर एक अजीब-सी बात है—
मुझे हमेशा लगता है कि वह व्यक्ति मुझे बहुत पहले से जानता है।
और शायद…
वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा है।”
अस्तित्व कुछ क्षण तक उस पन्ने को देखता रहा।
यह वही सपना था।
वही सड़क,
वही पेड़,
वही नदी का घाट।
पर यह पन्ना उसने बहुत पहले लिखा था
उस समय जब साक्षी उसके जीवन में आई भी नहीं थी।
उसने पन्ने को फिर से पढ़ा।
नीचे एक और वाक्य लिखा था—
“कभी-कभी मुझे लगता है कि जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति आएगा
जो मुझे मेरे ही भीतर से परिचित कराएगा।
शायद वही उस घाट पर खड़ा है।”
अस्तित्व की उँगलियाँ डायरी के पन्ने पर ठहर गईं।
क्या यह केवल संयोग था?
या मनुष्य की चेतना कभी-कभी
भविष्य की किसी मुलाक़ात को
बहुत पहले ही महसूस कर लेती है?
कमरे में घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही थी।
अस्तित्व कुर्सी पर पीछे की ओर झुक गया।
उसे अचानक पहले भाग का वह समय याद आया
जब वह जीवन के अर्थ को लेकर बहुत बेचैन था
जब हर प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश उसे और गहरे प्रश्नों में ले जाती थी।
उसी समय उसने यह डायरी लिखी थी।
और अब…
कई वर्षों बाद
उसी डायरी का यह पन्ना
जैसे किसी अधूरी कहानी का संकेत दे रहा था।
अस्तित्व ने धीरे से डायरी बंद की।
उसके मन में एक नया विचार जन्म ले रहा था
क्या साक्षी केवल वर्तमान की एक घटना नहीं है?
क्या वह उस यात्रा का हिस्सा है
जो उसके भीतर बहुत पहले शुरू हो चुकी थी?
उसी समय उसका फ़ोन हल्के से बजा।
स्क्रीन पर एक संदेश था।
साक्षी का।
उसने संदेश खोला।
उसमें केवल एक पंक्ति लिखी थी
“अजीब बात है…
आज मुझे फिर वही सपना आया।”
अस्तित्व कुछ क्षण तक स्क्रीन को देखता रहा।
फिर उसने धीरे-से टाइप किया—
“वही सड़क… वही नदी… वही घाट?”
कुछ ही सेकंड में उत्तर आया
“हाँ।
और इस बार…
मुझे लगा कि तुम पहले से वहाँ खड़े थे।”
अस्तित्व ने फ़ोन धीरे से मेज़ पर रख दिया।
अब यह कहानी केवल दो व्यक्तियों की मुलाक़ात नहीं रह गई थी।
यह जैसे किसी गहरे संवाद की शुरुआत थी
जो समय से भी पहले शुरू हुआ था।
खिड़की के बाहर रात और शांत हो गई थी।
अस्तित्व ने महसूस किया
शायद जीवन कभी-कभी हमें
हमारी अपनी ही लिखी हुई कहानी के पन्नों तक वापस ले आता है।
और तब हमें समझ में आता है
कि जो घटनाएँ हमें अचानक लगती हैं
वे शायद
बहुत पहले से लिखी जा चुकी होती हैं।
यदि आप चाहें तो अगले अध्याय में कहानी और गहरी हो सकती है:
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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