सुबह की रोशनी धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी।
रात का वह रहस्यपूर्ण अनुभव—पुरानी डायरी का पन्ना, साक्षी का संदेश, साझा सपना—सब अब भी अस्तित्व के भीतर एक हल्की धुंध की तरह मौजूद था।
वह खिड़की के पास खड़ा था।
नीचे सड़क पर जीवन अपनी सामान्य गति में लौट चुका था—
चाय की दुकानों पर लोग खड़े थे, रिक्शे गुजर रहे थे, अख़बार बाँटने वाले लड़के तेज़ी से साइकिल चलाते हुए निकल रहे थे।
पर उसके भीतर अभी भी रात की वह शांति बनी हुई थी।
टेबल पर वही पुरानी डायरी रखी थी।
अस्तित्व ने उसे फिर खोला।
उसे यह समझने की इच्छा हो रही थी कि क्या उस समय—जब उसने यह डायरी लिखी थी—उसके भीतर सचमुच कोई ऐसी अनुभूति थी जो अब जाकर आकार ले रही है।
तभी फ़ोन बजा।
स्क्रीन पर नाम उभरा
अनिरुद्ध।
अस्तित्व के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
अनिरुद्ध उसका पुराना मित्र था—
पहले भाग के दिनों का साथी।
वही समय जब वे दोनों जीवन, दर्शन और साहित्य पर लंबी-लंबी बहसें किया करते थे।
अस्तित्व ने फ़ोन उठाया।
“हाँ अनिरुद्ध, कैसे हो?”
दूसरी ओर से परिचित हँसी सुनाई दी।
“मैं ठीक हूँ।
पर तुम शायद ठीक नहीं हो।”
अस्तित्व हल्का-सा चौंका।
“ऐसा क्यों?”
अनिरुद्ध ने हँसते हुए कहा—
“क्योंकि जब भी तुम अचानक रात को दो बजे ऑनलाइन दिखते हो,
तो इसका मतलब होता है कि तुम्हारे दिमाग़ में कोई नया दार्शनिक तूफ़ान चल रहा है।”
अस्तित्व भी हँस पड़ा।
“तुम्हारी यह आदत अब भी नहीं गई—हर बात को पकड़ लेने की।”
अनिरुद्ध ने थोड़ा गंभीर होकर पूछा—
“सच बताओ, क्या सोच रहे हो?”
अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा—
“तुम्हें याद है… कई साल पहले मैं तुम्हें एक अजीब-सा सपना बताया करता था?”
अनिरुद्ध तुरंत बोला—
“वही नदी वाला सपना?”
अस्तित्व के हाथ अनायास डायरी पर टिक गए।
“हाँ… वही।”
अनिरुद्ध कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“अजीब बात है, वह सपना मुझे भी याद है।
क्योंकि तुम उसे लेकर बहुत गंभीर हो जाते थे।”
अस्तित्व ने धीमे स्वर में कहा—
“अगर मैं कहूँ कि वह सपना अब भी आता है…
और किसी और को भी आता है…
तो?”
दूसरी तरफ़ कुछ क्षण की खामोशी रही।
फिर अनिरुद्ध ने हल्की जिज्ञासा से पूछा—
“किसे?”
अस्तित्व ने धीरे से कहा—
“साक्षी को।”
कुछ सेकंड तक फ़ोन के उस पार कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर अनिरुद्ध ने बहुत शांत स्वर में कहा—
“अच्छा… तो कहानी अब सचमुच दिलचस्प हो गई है।”
अस्तित्व खिड़की के पास आकर खड़ा हो गया।
“तुम्हें क्या लगता है, यह सब क्या है?”
अनिरुद्ध ने उत्तर देने में जल्दबाज़ी नहीं की।
वह हमेशा ऐसा ही करता था
पहले सोचता, फिर बोलता।
“देखो,” उसने धीरे से कहा,
“मनुष्य की चेतना बहुत जटिल होती है।
कभी-कभी हम अपने भीतर ऐसे प्रतीक रच लेते हैं
जो बाद में किसी व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आ जाते हैं।”
अस्तित्व ने पूछा—
“तुम्हारा मतलब… साक्षी एक प्रतीक हो सकती है?”
अनिरुद्ध ने कहा
“मैं यह नहीं कह रहा कि वह वास्तविक नहीं है।
पर यह संभव है कि वह तुम्हारी चेतना के उस हिस्से को प्रकट कर रही हो
जिसे तुम वर्षों से खोज रहे थे।”
अस्तित्व चुप रहा।
उसी समय फ़ोन पर एक और कॉल आने लगी।
स्क्रीन पर नाम चमका
मीरा।
अस्तित्व कुछ क्षण के लिए ठहर गया।
मीरा…
दूसरे भाग की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति।
वह व्यक्ति जिसने कभी अस्तित्व से कहा था—
“मनुष्य अपने जीवन में जिन लोगों से मिलता है,
वे केवल लोग नहीं होते
वे उसके भीतर के प्रश्नों के उत्तर भी होते हैं।”
अस्तित्व ने अनिरुद्ध से कहा
“मैं तुम्हें बाद में कॉल करता हूँ।”
फ़ोन कट गया।
उसने मीरा की कॉल उठाई।
“हैलो, मीरा।”
दूसरी ओर से शांत आवाज़ आई
“अस्तित्व, कल तुम्हारा व्याख्यान सुना।”
अस्तित्व थोड़ा चौंका।
“तुम वहाँ थीं?”
मीरा हल्का-सा हँसी।
“नहीं।
पर नील ने उसकी रिकॉर्डिंग भेज दी।”
अस्तित्व ने पूछा
“और तुम्हें कैसा लगा?”
मीरा ने धीरे से कहा—
“व्याख्यान अच्छा था।
पर उससे ज़्यादा दिलचस्प एक बात थी।”
“कौन-सी?” अस्तित्व ने पूछा।
मीरा ने उत्तर दिया—
“वह लड़की…
जिसने तुमसे सवाल पूछा था।”
अस्तित्व का दिल हल्का-सा धड़क उठा।
“साक्षी?”
मीरा ने कहा—
“हाँ।
जब वह सवाल पूछ रही थी
तो मुझे अचानक लगा कि वह केवल तुमसे बात नहीं कर रही थी।”
“तो?” अस्तित्व ने पूछा।
मीरा ने बहुत शांत स्वर में कहा
“मुझे लगा…
जैसे तुम दोनों एक ही कहानी के दो पात्र हो।”
अस्तित्व कुछ क्षण बिल्कुल चुप रहा।
कमरे में सुबह की रोशनी अब पूरी तरह फैल चुकी थी।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
जीवन अपनी सामान्य गति में चल रहा था।
पर उसके भीतर अब एक नई अनुभूति जन्म ले रही थी—
शायद यह कहानी केवल वर्तमान की नहीं है।
यह कई वर्षों से चल रही एक यात्रा है
जहाँ कुछ लोग बार-बार लौटते हैं,
कुछ प्रश्न बार-बार उठते हैं,
और अंत में मनुष्य को यह समझ में आने लगता है
कि जीवन में मिलने वाले कुछ चेहरे
सिर्फ़ चेहरे नहीं होते।
वे उस भीतर बैठे साक्षी के संकेत होते हैं
जो हमें धीरे-धीरे
हमारी अपनी ही चेतना तक ले जा रहा होता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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