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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 6 : मकान-मालिक का दर्शन

 लघु उपन्यास

भाग – 6 : मकान-मालिक का दर्शन


मकान-मालिक पहले ऐसा आदमी नहीं था।


वह उन लोगों में से था

जो पैसे को

सिर्फ़ गिनते नहीं,

उसे सँभालकर भी रखते हैं

जैसे कोई किसान

अगले मौसम के लिए

बीज बचाकर रखता है।


कहते हैं

उसने अपनी पूरी ज़िंदगी

पाई-पाई जोड़ने में लगा दी थी।


किराया

उसके लिए सिर्फ़ किराया नहीं था

वह उसके बच्चों का भविष्य था।


वह हर महीने

खुद हिसाब लिखता था।


किसने दिया,

किसने नहीं दिया,

किसका कितना बाकी है

सब कुछ।


उसकी कॉपी में

कोई गलती नहीं होती थी।


पर पिछले साल

कुछ बदल गया।


उसकी बीबी

चुपचाप चली गई।


बहुत साधारण-सी बीमारी थी

पर मौत कभी

साधारण नहीं होती।


लोग कहते हैं

उस दिन

वह देर तक

आँगन में बैठा रहा था।


जैसे किसी ने

उसके जीवन की

सबसे बड़ी आवाज़

अचानक बंद कर दी हो।


उसके बच्चे

विदेश में रहते हैं।


वे फोन पर

बहुत दुखी हुए थे

ऐसा लोगों ने बताया।


पर

वे आए नहीं।


यहाँ तक कि

माँ के मरने पर भी नहीं।


उस दिन के बाद

मकान-मालिक

धीरे-धीरे बदलने लगा।


उसने हिसाब की कॉपी

कम खोलनी शुरू कर दी।


किरायेदारों से

कम बहस करने लगा।


और पैसों के बारे में

थोड़ा उदासीन हो गया।


अब जब वह

मेरे कमरे में आता है

तो किराये की बात

बहुत कम करता है।


सिगरेट माँगता है।


मैं दे देता हूँ।


वह

धीरे-धीरे कश लेता है

और खिड़की के बाहर

देखता रहता है।


एक दिन

मैंने उससे पूछ ही लिया


“आप पहले

किराये को लेकर

बहुत सख्त रहते थे।”


वह हल्का-सा मुस्कुराया।


फिर बोला


“जब बच्चे छोटे होते हैं

तो आदमी पैसे जोड़ता है।

उन्हें पढ़ाने के लिए,

बड़ा बनाने के लिए।”


वह थोड़ा रुका।


फिर बोला


“जब वे बड़े हो जाते हैं

तो पता चलता है

कि आदमी ने

असल में किसके लिए

इतनी मेहनत की थी।”


उसने सिगरेट का लंबा कश लिया।


धुआँ

धीरे-धीरे कमरे में फैल गया।


फिर वह बोला


“अब समझ में आया है

कि पैसे

घर नहीं बनाते।


बस

दीवारें बनाते हैं।”


मैं चुप रहा।


वह भी चुप रहा।


कुछ देर बाद

वह उठकर

दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।


जाते-जाते

उसने मेरी तरफ़ देखा

और कहा


“तुम्हारा कमरा

अजीब है।”


मैंने पूछा


“क्यों?”


वह बोला


“यहाँ चीज़ें

जैसे जिंदा लगती हैं।”


मैंने मुस्कुराकर कहा


“शायद

वे सच में जिंदा हैं।”


वह कुछ देर

मुझे देखता रहा।


फिर

सीढ़ियाँ उतर गया।


दरवाज़ा बंद करके

मैं कमरे में लौट आया।


ऐश-ट्रे

फिर भरने लगी थी।


मकड़ी

अब अपने जाल में

और गहरे उतर चुकी थी।


और मुझे लगा


कि इस कमरे में

अब दो लोग

धीरे-धीरे

फिलॉस्फ़र बनते जा रहे हैं।


एक

मैं।


और दूसरा

मेरा मकान-मालिक।


मुकेश ,,,,,,,,,

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