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Tuesday, 10 March 2026

भाग – 7 : एक खामोश रसोई और एक कमरा

 लघु उपन्यास

भाग – 7 : एक खामोश रसोई और एक कमरा


मकान-मालिक के जाने के बाद

कमरे में फिर वही खामोशी उतर आती है।


मैं कुछ देर

दरवाज़े की तरफ़ देखता रहता हूँ

जैसे वह अभी लौटकर

कुछ और कह देगा।


पर सीढ़ियों से

अब सिर्फ़ सन्नाटा उतर रहा है।


कहते हैं

उसके घर की रसोई

अब बहुत कम खुलती है।


पहले

सुबह-सुबह वहाँ से

तड़के की आवाज़ आती थी।


रोटी फूलने की खुशबू

सीढ़ियों तक चली आती थी।


उसकी बीबी

धीरे-धीरे गुनगुनाती थी

कोई पुराना भजन

या शायद

किसी फिल्म का गीत।


मकान-मालिक

नीचे आँगन में

पौधों को पानी देता था।


फिर

रसोई की खिड़की से

दोनों की हल्की-हल्की बातचीत

सुनाई देती थी।


अब

रसोई का दरवाज़ा

ज्यादातर बंद रहता है।


कभी-कभी

मकान-मालिक

चुपचाप चाय बना लेता है।


कप लेकर

बरामदे में बैठ जाता है।


पर चाय

ज्यादातर ठंडी हो जाती है।


जैसे उसे पीने वाला

कहीं और खो गया हो।


मैं तख़्त पर बैठा

यह सब सोच रहा हूँ।


सिगरेट जलाता हूँ।


पहला कश

धीरे-धीरे अंदर जाता है।


धुआँ

मेरे सामने हवा में

एक छोटी-सी नदी की तरह

बहने लगता है।


ऐश-ट्रे

फिर मेरी तरफ़ देखती है।


जैसे कहती हो

“तुम भी उसी रास्ते पर हो।”


मैं मुस्कुरा देता हूँ।


कमरे में

हर चीज़

धीरे-धीरे अपनी जगह पर है


झाड़ू

अब भी इंतज़ार में।


जूते

अब भी अलग-अलग।


सिंक में पड़ा चम्मच

अब भी हलवे की

सूखी हुई याद में।


और कोने में

मकड़ी

अपने जाल को

और थोड़ा बड़ा कर रही है।


मैं एक और कश लेता हूँ।


फिर

थोड़ा पीछे टिककर

बैठ जाता हूँ।


जैसे कोई आदमी

अपने ही भीतर

किसी गहरी जगह उतर रहा हो।


मुझे अचानक लगता है


इस कमरे में

सिर्फ़ मैं नहीं रहता।


यहाँ

समय भी रहता है।


यादें भी रहती हैं।


और कुछ अधूरे लोग भी

जो चले गए

पर पूरी तरह गए नहीं।


धुआँ

धीरे-धीरे ऊपर उठता है।


छत की तरफ़।


मैं उसे देखता हूँ।


और अनायास

सोचने लगता हूँ


क्या सचमुच

हर कमरा

अपने भीतर

इतनी कहानियाँ रखता है?


या फिर


कहानी

असल में

कमरे में नहीं


आदमी के भीतर

होती है।


मैं सिगरेट का आख़िरी कश लेता हूँ।


और

धीरे-धीरे

सोचने की मुद्रा में

बैठा रह जाता हूँ।


कमरा

चुप है।


पर मुझे लगता है


अभी

कोई चीज़

मुझसे

कुछ कहने वाली है।


मुकेश ,,,,,,,,

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