सुबह का इक टूटा हुआ सितारा हूँ मैं
सुबह की पहली रौशनी में
कुछ यूँ बिखर जाता हूँ मैं
जैसे रात का कोई ख़्वाब
आँखों से फिसल गया हो।
मैं वो सितारा हूँ
जो रात भर चमकता रहा,
और सहर होते ही
ख़ामोशी से टूट गया।
कोई दुआ
शायद मुझसे होकर गुज़री होगी,
तभी तो मैं
आसमान से गिरकर
किसी दिल में बस गया हूँ।
अब न रात मेरी है,
न पूरा आसमान
बस एक अधूरी-सी चमक हूँ,
और सुबह का
इक टूटा हुआ सितारा हूँ मैं
मुकेश ,,,,,,,
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