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Wednesday, 18 March 2026

सुबह का इक टूटा हुआ सितारा हूँ मैं

 सुबह का इक टूटा हुआ सितारा हूँ मैं


सुबह की पहली रौशनी में

कुछ यूँ बिखर जाता हूँ मैं

जैसे रात का कोई ख़्वाब

आँखों से फिसल गया हो।


मैं वो सितारा हूँ

जो रात भर चमकता रहा,

और सहर होते ही

ख़ामोशी से टूट गया।


कोई दुआ

शायद मुझसे होकर गुज़री होगी,

तभी तो मैं

आसमान से गिरकर

किसी दिल में बस गया हूँ।


अब न रात मेरी है,

न पूरा आसमान

बस एक अधूरी-सी चमक हूँ,

और सुबह का

इक टूटा हुआ सितारा हूँ मैं


मुकेश ,,,,,,,

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