मंज़र हम ये हर सिम्त देखते हैं
मंज़र हम ये हर सिम्त देखते हैं लोगों के चेहरे पे शिकन देखते हैं कोशिश कर के देखूं भी तो दूर,,, बहुत दूर उम्मीदे किरन देखते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------
“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”