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Showing posts from September, 2016

वो आती है, मुँह चिढ़ाती है, भाग जाती है

वो आती है, मुँह चिढ़ाती है, भाग जाती है   उत्ती मासूम है नहीं, जित्ती दिखाई देती है कभी कैथा, कभी ईमली,  कभी अमियाँ टिकिया गोलगप्पे मज़े ले ले के खाती है   कभी स्कर्ट, कभी जीन्स तो कभी कुर्ता कभी बॉब्ड कट कभी, दो चोटी रखती है वैसे तो वो मेरी हर बात माना करती है जो मांगू उससे बोसा, अंगूठा दिखाती है अपने पापा अपने भाई सभी से लड़ती है सिर्फ अपनी मम्मी की डांट, से डरती है है खेल में पढ़ाई में, लिखाई में, अव्वल संजीदा हो तो तो बड़ी मासूम दिखती है ये और बात जुबां से वो न कहती है पर  मगर मालूम है मुझसे ; प्यार करती है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

रात के आँचल में मुँह छुपा के रोई

रात के आँचल में मुँह छुपा के रोई ज़िन्दगी हादसों से घबरा  के रोई फूल सा खिला करती थी सच्चाई झूठ के हाथों आबरू लुटा के रोई पहले ईश्क़ का नाम लिखा उसने फिर नाम आँसुओं से मिटा के रोई ज़ीस्त पहले तमाम दर्द सहती रही फिर सारे ज़ख्म दिखा दिखा के रोई मुकेश की ग़ज़लों में बहुत दर्द है ,, ईश्क़ अपना दर्द सुना सुना के रोई मुकेश इलाहाबादी ----------------

तू मेरा अपना है

तू मेरा अपना है ये मेरा सपना है तेरा हँसना जैसे पहाड़ी झरना है     चाँद से मुखड़े पे सादगी गहना है जाने कब तक ? हिज़्र में रहना है इक दिन तुझसे लव यू कहना है मुक्कू से कह दो ग़ज़लें सुनना है मुकेश इलाहाबादी -

रात के पाले में चाँदनी आयी

रात के पाले में चाँदनी आयी मैं, दिन सा ऊगा मेरे हिस्से सूरज की गर्मी आयी तुम, फूल सा  खिलीं  तुम निकले लपेटे खुशबू का हिज़ाब हम खार थे हमारे हिस्से फ़क़त  उरियानी आयी तुम, घर से निकले क़दमों तले दिल बिछ गए मेरा साथ देने सिर्फ, तन्हाई आयी मुकेश इलाहाबादी -------

न नीचे ज़मी न ऊपर आसमान है

न नीचे ज़मी न ऊपर आसमान है खामोश दरिया अपने दरम्यान है है निभा ले जाना उम्रभर मुश्किल कहदेना लफ़्ज़े मुहब्बत आसान है मुकेश ऊंचाई पे पंहुच  के देखना, फिसल न जाओ चिकनी ढलान है मुकेश इलाहाबादी -----------

मुझसे इस क़दर ख़फ़ा न हो

मुझसे इस क़दर ख़फ़ा न हो फिर मिलें तो, शर्मिंदा न हों  आना है तो, जल्दी लौट आ ऐसा न हो, हम ज़िंदा न  हों मेरी आदतें न बिगाड़ तू, कि   बिन तेरे मेरा गुज़ारा न  हो काँच सा दिल है टूट न जाए   फिर देखने को आईना  न हो महताब ख़फ़ा, सूरज ख़फ़ा ऐसा तो नही, उजाला न हो  मुकेश एहतियात  से रह तू कहीं वही गल्ती दुबारा न हो मुकेश इलाहाबादी ----------

तू इक और रात सर्द दे दे

तू इक और रात सर्द दे दे न सही खुशी तो दर्द दे दे ले कर जिस्म का हरा पन मुझे तो अब रंग ज़र्द दे दे मुकेश, कुछ और नही तो क़दमो की अपने गर्द दे दे मुकेश इलाहाबादी -------

‘प्रेम’ के सम्बंध के सम्बंध मे

दोस्त, पत्र मे तुमने ‘प्रेम’ के सम्बंध के सम्बंध मे मेरी राय जाननी चाही है, तो  इस सम्बंध मे सिर्फ इतना ही कहूंगा कि ‘प्रेम’ तत्व को कौन जान सका है ? जिसने प्रेम को जान लिया उसने खुदा को जान लिया। वैसे भी जानने वालों ने कहा है ‘मुहब्बत’ खुदा का दूसरा नाम है, और खुदा को कौन जान सका है? दोस्त, फिर मेरे जैसा अदना इंसान क्या कुछ जान पायेगा। इतना तो तुम भी जानती होगी, कि आज तक ‘प्रेम’ को ले कर जितना कहा और लिखा जा चुका है उतना कोई और दूसरा विषय संसार मे कोई नही है। फिर भी यह ‘प्रेम’ तत्व आज तक अपरिभाषेय ही रहा आया है। मेरे देखे भी तो प्रेम सिर्फ जिया जा सकता है। प्रेम मे सिर्फ हुआ जा सकता है। प्रेम के संदर्भ मे कुछ इशारे जरुर किये जा सकते हैं पर इसे पूरा का पूरा बयां नही किया जा सकता। क्योेकि एक बात और जान लो जब षब्द मौन हो जाते हैं तब प्रेम मुखरित होता है। लिहाजा तुम भी इसे सिर्फ गूंगे के गुड सा स्वाद तो लो पर बखान मत करो, वैसे तो कर भी नही पाओगी। और, अगर कोशिश किया भी तो कोई खाश नतीजा नही आने वाला। चुकि तुमने इस संदर्भ मे मुझसे कुछ कहने को कहा है तो मैने आज तक जो कुछ भी ‘प्र...

अच्छी लगती हो,

बस ! कहे देता हूँ , तुम मुझे अच्छी लगती हो, तो लगती हो  मुकेश इलाहाबादी --

ख्वाबों को नए पर मिल जाते हैं

ख्वाबों को नए पर मिल जाते हैं मैं उड़ने लगता हूँ नील गगन में ऊपर - ऊपर और ऊपर डगमगाती, नाव को के पाल संभल जाते हैं और मैं डूबने से बच जाता हूँ पीले निश्तेज चेहरे पे सुबह के सूरज की रौशनी आ जाती है बदन चंदन सा महक उठता है और ,,,,,, ये सब होता है मेरे साथ तुमसे मिल के और सिर्फ तुमसे मिल के सुमी - सुन रही हो न ?? मुकेश इलाहाबादी ---

टूटे हुए परों को जोड़ कर

टूटे हुए परों को जोड़ कर उडा रहा हूँ कुछ सोच कर अपनी सूरत देखता हूँ मै टुकड़े आईने के जोड़ कर वो मिल गया था रस्ते में की बातें उसको रोक कर आओ प्यार की बातें करें शिकवे शिकायत छोड़कर रात फिर सो गया तनहा मुकेश यादें तेरी ओढ़ कर मुकेश इलाहाबादी ------

नदी, बहना चाहती है

नदी, बहना चाहती है अपने साहिल की बाँहों में कभी निष्पन्द कभी हौले - हौले तो, कभी तेज़ धार से कभी तो, लाड में आकर उछल कर  देर तक,  अपनी फेनिल ज़ुल्फ़ों को साहिल के सीने पे गिरा कर फिर से बहना चाहती है शांत और निष्पंद बहुत दूर तक  और देर तक देखते हुए दिन के नीले रात के सांवले आकाश को चाँद और सितारों के साथ  मुकेश इलाहाबादी ------------

सच की राह में रोडे बहुत हैं

सच की राह में रोडे बहुत हैं अच्छे  इन्सान  थोडे बहुत हैं रेस का मैदान बन गया शहर यहां आदमी कम घोडे बहुत हैं फूल मुहब्बत के खिलाये कम राकेट मिसाइल छोडे बहुत हैं मुकेश इलाहाबादी ..............

किसी के दिल को मैं रास आया नहीं

किसी के दिल को मैं रास आया नहीं ज़िदंगी में मेरी मधुमास आया नहीं दरिया तक मैं जा कर करता भी क्या किसी ने मेरी प्यास को जगाया नहीं सज संवर तो लेता मगर जाता कहाँ कभी किसी ने मुझको बुलाया नहीं जाने वो कैसी हिचक थी या डर था हाले दिल मैंने, उसको बताया नहीं मुकेश इलाहाबादी -------------------

अंधेरी , रातों में

अंधेरी , रातों में तुम्हरे नाक की लौंग चमकती है किसी ध्रुव तारे सा और मैं काट देता हूँ तमाम सर्द रातें मुकेश इलाहाबादी -----

किसी दोराहे या चौराहे पे

कभी तो, किसी दोराहे या चौराहे पे मुलाकात होगी भले ही तुम्हारे और मेरे रास्ते कितना ही अलग - अलग हों तब तुम मुझसे कतरा के निकल जाना चाहोगे और मैं तुम्हे ठिठक कर देखता रहूँगा देर तक - दूर तक जब तक की तुम मेरी नज़रों से ओझल नहीं हो जाओगे मुकेश इलाहाबादी ---------

बह जाना चाहता हूँ

तुम, कलकल करती नदी हो जिसके साथ- साथ मैं भी बह जाना चाहता हूँ हिमालय से ले के गंगा सागर तक और समां जाना चाहता हूँ हरहरा कर समंदर की  अथाह जल राशि में तुम्हारी लहरों के साथ मुकेश इलाहाबादी ----------

अब तो, तुम्ही से रौशन हैं मेरे रातो दिन

अब तो, तुम्ही से रौशन हैं मेरे रातो दिन ये चाँद और सितारे मेरे किसी काम के नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------------------

तुम्हारे वायदों की तरह

तयशुदा, वक़्त पे, तुम नहीं आये आये भी तो, देर से आये कभी तो, नहीं भी आये मग़र, मैंने किया इंतज़ार, तुम्हारा हमेशा, पार्क की  कोने वाली बेंच पे, सूरज के डूबने और चाँद के डूबने के बहुत देर बाद तक भी इस ख़याल से शायद तुम कभी भी दबे पाँव पीछे से आकर अपनी हथेली से मेरी पलकों को बंद कर मुझे चौंका दोगी और मैं भी सारे गीले - शिकवे भूल तुम्हारी कलाई पकड़ तुम्हे अपनी गोद में गिरा लूँगा और तब तुम अपनी दूधिया हँसी बिखेर दोगी मेरी हथेलियों पे मगर, मेरे ये ख्वाब भी हकीकत में बदलने से पहले दगा दे गए तुम्हारे वायदों की तरह फिर भी मैं, करूँगा इंतज़ार तुम्हरा, तुम्हारे आने तक सुमी , सुन रही हो न ?? मुकेश इलाहाबादी ---------  

कोई छुट्टी नहीं होती

कोई छुट्टी नहीं होती कोई इतवार नहीं होता तुम्हरी यादों का कोई नागा नहीं होता और, मैं भी तो बिना थके बिना रुके बिना झुंझलाए रहता हूँ तुम्हरी यादों के संग सुमी,, मुकेश इलाहाबादी ----

आ इक गुनाह हम भी कर लें

आ इक गुनाह हम भी कर लें थोड़ा सा प्यार हम भी कर लें ईश्क़ इक खूबसूरत दरिया है ये, दरिया पार हम भी कर लें दीवानो  की फेहरिश्त में नाम अपना शुमार हम भी कर लें मुकेश इलाहाबादी ------------