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Showing posts from September, 2015

दुनिया वाले आज भी इम्तहान लेते हैं

दुनिया वाले आज भी  इम्तहान लेते हैं ये और बात मेरे पर  ऊँची उड़ान लेते हैं  तुम हमें अपनी बातें बताओ न बताओ तुझे देख, हम तेरा दुःख दर्द जान लेते हैं कब धूप खिलेगी या कब तूफ़ाँ आयेगा हवा के रुख से  मौसम  पहचान लेते हैं मौत भी  मेरे  करीब  आने से डरती है, तेरी अदाओं के तीरो कमान जान लेते हैं  मुकेश इलाहाबादी -------------------------

ये और बात आग सा दहकता है

ये और बात आग सा दहकता है दिल  मेरा  भी मगर धड़कता है सूरज की गर्म रोशनी शोख कर रात  चाँद  चांदी सा चमकता है ये किसने बोसा लिया है तेरा ? चेहरा शर्मो हया से दमकता है   जाने किस चाँद की जुस्तजूं में आफताब दिन रात भटकता है दिन भर मेहनत के बाद, साँझ दर्द  मेरी नश -२  से टपकता है मुकेश इलाहाबादी ---------------

आँखे तेरे दीदार को तरसती रहीं

आँखे तेरे दीदार को तरसती रहीं  औ रूह तेरे प्यार में सुलगती रही  ग़म उदासी और तन्हाई की बर्फ   अपनी ही आंच में पिघलती रही  शायद रेत्  की दीवार थी दरम्याँ  वज़ह शक ओ शुबह दरकती रही   कई सावन बीते जब तुम आये थे    मेरी रातें आज तक महकती रही  सूनी मुंडेर पे एक बुलबुल बैठी के  मुकेश के पे देर तक चहकती रही  मुकेश इलाहाबादी -------------------

जिस्म से रूह सीने से दिल निकल जाता है

जिस्म से रूह सीने से दिल निकल जाता है तुझे बेनक़ाब देखूं  तो  दिल मचल जाता है संभल - संभल  के  पाँव तेरे दर पे रखता हूँ फिर भी जाने क्या बात है फिसल जाता हूँ मुकेश इलाहाबादी --------------------------

चलो चराग़ जलाया जाए

चलो चराग़ जलाया जाए अँधेरा  दूर  भगाया जाए लोग बैठे हैं उदास घरों में चलो  उन्हें  हंसाया  जाए कुछ देर बाहर चलते  हैं मेल जोल - बढ़ाया जाए यहां बहुत दहशत गर्दी है दूसरा शहर बसाया जाए कब तक मुकेश को सुने आज उसे सुनाया जाए मुकेश इलाहाबादी --------------------

ख़ुदा ने फलक पे सितारे हज़ारों बनाये

ख़ुदा ने फलक पे सितारे हज़ारों बनाये हम जैसे चाँद सूरज तो दो ही बनाये मुकेश इलाहाबादी --------------------

जब जब खिलते हैं फूल तो हंसती हैं पत्तियां

सड़क छाप शे'र,, जब जब खिलते हैं फूल तो हंसती हैं पत्तियां भौंरे  की  शरारत  पे  मुस्कुराती  हैं कलियाँ यूँ जब भी देखो हर वक्त बंद मिला करती हैं   आशिकों के आते ही खुलजाती हैं खिड़कियाँ मुकेश इलाहाबादी -----------------------

सबसे प्यारा गुड्डा गुम हो जाए,

जैसे  किसी गुड़िया का  सबसे प्यारा गुड्डा  गुम हो जाए,   तमाम खिलौनों के बीच  और, बहुत ढूंढने पर न मिलने पर  रो रो के सिर पे दुनिया उठा लिया हो  बस,,,,, ऐसे ही किसी दिन  तुम मुझे ढूंढो  और, मै   किसी छुपी हुई जगह से  निकल के तुम्हे ' आईस - पाईस ' बोल कर  तुम्हे चौंका दूँ   या कि , अचानक किसी दिन  तुम मुझे न दिखो तो  मै तुम्हे ढूंढता फिरूँ  जैसे  कोई बच्चा ढूंढता फिरे  अपनी खोई हुई गेंद  पार्क की झाड़ियों में  पेड़ों के झुरमुट में  या पार्क में बैठे लोगों के इर्द गिर्द  या फिर  तुम मुझे ऐसे ढूंढो  जैसे  माँ खोजती है अक्सर  बाज़ार जाते वक़्त अपनी चप्पलें  पलंग के नीचे  अलमारी के पीछे या फिर  इधर उधर  या जैसे  पापा ढूंढते हैं - हड़बड़ी में  ऑफिस जाते वक़्त  अपना चश्मा और रुमाल  या की दादी बिस्तर से उतरने  के पहले ढूंढती हैं अपने छड़ी  बस ऐसे ही हम तुम ढूंढें और खोजें  एक ...

सूरज के साथ खड़ा हूँ

सूरज के साथ खड़ा हूँ  खाक  होने पे तुला हूँ  उजाला गवाही दे देगा  संग चराग के जला हूँ    मील के पत्थर सा मै  आज भी वहीं गड़ा हूँ   तेरे दिल ऐ कंगन में  मै  नगीने सा जड़ा हूँ  खुश्बूओं से पूछ लो  फूल  सा  मै खिला हूँ  मुकेश इलाहाबादी ---

हज़ारों ख़्वाब देखती हुई आँखें

हज़ारों  ख़्वाब देखती हुई आँखें  जाने  क्या -२ सोचती हुई आँखें  ज़िदंगी के तमाम रंग समेटे हुए  सितारों के पार देखती हुई आँखें  जाने क्या जादू है इन आँखों में  सब को मोहित करती हुई आँखें  मुकेश इलाहाबादी -------------- 

जब मौत के करीब पहुंची

जब मौत  के करीब पहुंची  ज़ीस्त मुकाम पे तब पहुंची  धूप  ने  सोख लिया दरिया  साँझ  के   बाद  शब  पहुंची  रात तारे  गिन गिन कटी   नींद पलकों पे अब पंहुची ज़रा याद कर के बता, तू   मिलने वक़्त पे कब पंहुची मुकेश इलाहाबादी ---------

जंगल बदल चुके हैं

चूँकि,   जंगल बदल चुके हैं  बस्तियों में या फिर  फॉर्म हाउसेस में  लिहाज़ा अब  जंगल में   हरे भरे फलों से लदे  पेड़ नहीं मिलते  दवाइयों वाली  घनी झाड़ियाँ और  और वनस्पतियां भी नहीं मिलती  यहां तक कि  जानवरों का राजा शेर  भी इधर उधर घूमता  नहीं मिलता  वह अब सर्कस या  चिड़ियाघर के पिंजड़े  में मिलता है  आज कल  जंगल का राजा  कुत्ता है  उसके भी गले में चेन रहती है  जो  गरीबों व मज़बूरों पे खूब भोकता है  और  चोरों को देख कर पूछ हिलाता है  कौवे जंगल के पेड़ों पे नहीं  संसद और विधान सभा के  गुम्बदों पे काँव - काँव करते पाये जाते हैं  गौरैया  तो होती ही शिकार करने की खातिर  अब तो उसकी प्रजाति ही लुप्त होने का  खतरा मंडरा रहा है  बुलबुल - भी कम चहकती है  डर के मारे  लिहाज़ा - गौरैया और बुलबुल को तो  भूल ही जाओ  हाँ , गैंडे जरूर  उसी शान से  जंगल की जगह  राज पथ पे अ...

आंसुओं, से ज़ख्म धोया किये

आंसुओं, से ज़ख्म धोया किये  तुम बिन बहुत हम रोया किये  कहने को तो खाली हाथ थे हम  ग़म ज़माने भर के ढोया किये जिनके  लिए गुल खिलाते रहे वे हमारे लिए कांटे बोया किये     नींद मे  दर्द पता नहीं लगता   शब्भर नींद गहरी सोया किये  जब भी ज़िंदगी फुर्सत देती है  मुकेश तेरे बारे में सोचा किये  मुकेश इलाहाबादी ------------

ज़माना ख़िलाफ़ था

ज़माना ख़िलाफ़ था  ख़ुदा  मेरे  साथ था  न  नीचे ज़मी थी  न  ऊपर  आसमान था  तेरी  यादों बातों  का  मेरे संग असबाब था   रात जब नींद आई  तेरा  ही  ख्वाब था  मुझे नई ज़िंदगी दी  वो तेरा ही प्यार था  मुकेश इलाहाबादी - 

अपने दर्दों ग़म ले कर कहाँ जाऊँ

अपने दर्दों ग़म ले कर कहाँ जाऊँ  जहां भी जाऊँ तेरे ही निशाँ पाऊँ  है मेरे जिस्मो जाँ में तेरी खुशबू  बता तेरी ये खुशबू कहाँ  छुपाऊँ  ख़्वाब  ने  तेरी तस्वीर बनाई है  अब सोचता हूँ इसे कहाँ सजाऊँ अपने उजड़े उजड़े दिले मकाँ में  तुझ नाज़नीं को, किधर बिठाऊँ  आ तू कुछ देर मेरे पहलू में बैठ  तुझे तुझपे लिखी ग़ज़ल सुनाऊँ  मुकेश इलाहाबादी -------

तेरा ज़िक्र आते ही मुस्कुरा देता हूँ

तेरा ज़िक्र आते  ही  मुस्कुरा देता हूँ  दुनिया वाले समझते हैं मै अच्छा हूँ  यूँ तो सिफत मेरी बर्फ की है, मगर  तेरे पास आते ही मै पिघल जाता हूँ  मेरे वज़ूद में पानी  की  रवानी भी है  पर तेरा संग साथ पा सुलग जाता हूँ  अक्सर मै चुप चुप ही रहा करता हूँ  गुफ्तगू तो मै सिर्फ  तुमसे करता हूँ   मै  सिर्फ तेरी बातें कहता सुनता हूँ  लोग समझते हैं, मै ग़ज़लें कहता हूँ  मुकेश इलाहाबादी ---------------------