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Showing posts from January, 2017

रात मैंने अपने ख्वाबों का

रात मैंने अपने ख्वाबों का क़त्ल कर दिया ये बहुत ज़रूरी था मुझे अपने वज़ूद को ज़िंदा रखने के लिए मुकेश इलाहाबादी --------------

दरिया ऍ ईश्क में बहना चहता हूँ

दरिया ऍ ईश्क में बहना चहता हूँ तुम्हारी आँखों ने डूबना चहता हूँ तमाम अनकहे किस्से हैं मेरे पास तुम्हे अपने तजर्बे सुनाना चाहता हूँ चला जाऊँगा फिर ये शहर छोड़ के सिर्फ इक बार तुझसे मिलना चहता हूँ मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अहर्निश, गूंजती है

अहर्निश, गूंजती है मेरे अंतर्मन में शोहम की तरह तुम्हारे नाम की धुन मुकेश इलाहाबादी ------

इक, लंबी दूरी

इक,   लंबी दूरी, साथ - साथ चलने के बाद  एहसास हुआ  हम तो वहीं के  वहीं हैं  जहाँ से चले थे  पहले भी हम तुम अजनबी थे  आज भी अजनबी से हैं  सिर्फ  हवा के झोंके  खेत खलिहान के दृश्य  भीड़ भरे बाजार  साथ साथ चलते  सूरज - चाँद  और हमारे जिस्म के साथ  दो समानांतर पटरियों सा   हम तय कर रहे थे  अपनी - अपनी दूरी  मुकेश इलाहाबादी ----

मेरी, मन की माला में

मेरी,  मन की माला में  सिर्फ, तुम्हारे ही नाम के  दाने हैं, जिन्हें जपता रहता हूँ  साँसों के आरोह-अवरोह के साथ  मुकेश इलाहाबादी ---------==

तुम रहो मै रहूं और हो बारिसों का मौसम

तुम रहो मै रहूं और हो बारिसों का मौसम तुम रहो मै रहूँ तन्हा छत पे लेटी हो जाड़े क़ी नर्म धुप अपने दरमियान तुम रहो मैं रहूँ ऊंघती दोपहर के सूई पटक सन्नाटे में बतिया रही हो सिर्फ कुछ फुसफुसाहटे कि काश ऐसा हो???? मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,

तुम रहो मै रहूं

तुम रहो मै रहूं और हो बारिसों का मौसम तुम रहो मै रहूँ तन्हा छत पे लेटी हो जाड़े क़ी नर्म धुप अपने दरमियान तुम रहो मैं रहूँ ऊंघती दोपहर के सूई पटक सन्नाटे में बतिया रही हो सिर्फ कुछ फुसफुसाहटे कि काश ऐसा हो???? मुकेश इलाहाबादी ,,,,,,,,,,

वक़्त तुम तक आ के ठहर गया हो जैसे

वक़्त तुम तक आ के ठहर गया हो जैसे तुम, पहले भी प्यारी लगती थी तुम, अब भी, प्यारे लगते हो मुकेश इलाहाबादी --------

क्या अच्छा है, क्या बुरा है, बता देता है

क्या अच्छा है, क्या बुरा है, बता देता है वक़्त, इंसान को सब कुछ सिखा देता है राजा हो रंक हो की आलिम - फ़ाज़िल हों वक़्त इक दिन सब को ख़ाक बना देता है तुम किसी भी धातु के कलम से लिख लो मुकेश बाबू वक़्त हर तहरीर मिटा देता है मुकेश इलाहाबादी -------------------------

बला की शोखी है तुम्हारी आँखों में

 बला की शोखी है तुम्हारी आँखों में  गज़ब की मदहोशी है तेरी बातों में तेज़  खंज़र सा चुभ जाता है सीने में अजब सी धार है तुम्हारी अदाओं में मुकेश इलाहाबादी -----------------

चाँद के उगने से, या फिर गुलों के खिलने से

चाँद के उगने से, या फिर गुलों के खिलने से याद रखता हूँ तुझे किसी न किसी बहाने से मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

ख्वाबों ख्यालों में जिसे देखता रहा

ख्वाबों ख्यालों में जिसे देखता रहा है तू वही चेहरा जिसे मैं ढूँढता रहा इक  बार छुआ  था तुमने आँखों से फिर मेरा वज़ूद ताउम्र महकता रहा बादलों से निकला, इकपल को चाँद फिर शबभर बदन मेरा सुलगता रहा मुकेश इलाहाबादी ----------------

मेरी, तमाम कोशिशें

एक ---- मेरी, तमाम कोशिशें नाकामयाब रही उस शून्य को भरने में जो उपजा है तुम्हारे जाने के बाद दो --- शायद मेरे ही हाथ छोटे रह गए हों उस चाँद को छूने में जिसे पाना मेरी चाहत रही मुकेश इलाहाबादी ---------

इक अनकहा सच

इक अनकहा सच ------------------ तुम हवा हो खाद हो पानी हो धूप हो तुम इक, खिला हुआ फूल हो जिसकी महक से सुवासित है मेरा रोम - रोम मुकेश इलाहाबादी---

प्रतीक्षारत

आज भी दरवाज़े से सटे मेरे कान प्रतीक्षारत हैं तुम्हारे आने की पदचाप सुनने को कि, आज भी खुली हैं मेरी आँखे तुम्हे देख लेने को जी भर के बस एक बार कि, बस एक बार तुम्हारे लौट आने की प्रतीक्षा में प्रतीक्षारत है मेरा रोम - रोम सुमी - मेरी प्यारी सुमी मुकेश इलाहाबादी ---

आज भी हर सांझ, चाँद के उगते ही

आज भी हर सांझ, चाँद के उगते ही खिल उठता है, महकता है रजनीगंधा इस उम्मीद के पे शायद आज तो तुम उतरोगे चांदनी बन के तब लिपट के करेंगे केलि मुकेश इलाहाबादी ---

सृष्टि क़े प्रथम दिवस से लेकर

सृष्टि क़े प्रथम दिवस से लेकर अंतिम दिनों तक तुम्हारा था तुम्हारा हूँ तुम्हारा ही रहूंगा सुमि। सुन रही हो न?? मुकेश इलाहाबादी ----

बतियाता हूँ तुमसे

जैसे, दरिया, बतियाता है लहरों से कलकल- कलकल सन्नाटा बतियाता है हवा से, गुपचुप - गुपचुप भौंरा, बतियाता है कली से भुनभुन - भुनभुन बस, ऐसे ही मैं बतियाता हूँ तुमसे हर दिन - हर पल मुकेश इलाहाबादी -----------

कि ज़िगर चाक हुआ जाता है

कि ज़िगर चाक हुआ जाता है जिस्म भी ख़ाक हुआ जाता है दुनिया के लिए जल - जल के आफ़ताब ख़ाक हुआ जाता है गांव हो शहर हो कि बस्ती हो घर - घर बाजार हुआ जाता है मुकेश ज़माने की हवा ऐसी कि बच्चा भी चालक हुआ जाता है मुकेश इलाहाबादी -------------

शुकूं के दो पल नही देती

शुकूं के दो पल नही देती ज़ीस्त फुरसत नहीं देती तुझ संग  बैठूँ  बात  करूं घड़ी इज़ाज़त नहीं देती   मुकेश इलाहाबादी ------