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Showing posts from January, 2015

ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं।

सुमी, ख्वाहिशें इन्सान के लिये खाद पानी होती हैं। इन्सान के अंदर ख्वाहिश न हो कुछ पाने की कुछ जानने की कुछ करने की तो समझ लो वह इन्सान इन्सान नही जड है पत्थर है, एक बेजान मूरत है। यही ख्वाहिशे ही तो हैं जो इन्सान को आगे आगे और आगे बढाती है। यही ख्वाहिशे तो है जो इन्सान को तरक्की के रास्ते पे ले जाती हैं। ख्वाहिशे न होती तो इन्सान इन्सान नही जानवर होता।  एक बात जान लो ख्वाहिशों मे और अमरबेल मे कोई फर्क नही है। अमर बेल की सिफ़त होती है कि उसकी कोई जड नही होती वह किसी न किसी पेड का सहारा ले के बढती है, और वह जिस पेड का सहारा और खाद पानी लेकर बढती है उसी को सुखा देती है। बस उसी तरह इन ख्वाहिशों का समझो। ये ख्वाहिशें वो अमर बेल हैं जो हर इंसान के अंदर जन्म लेती हैं और फिर इन्सान इस बेल को पुष्पित और पल्लवित करने मे लगा रहता है, और नतीजा यह होता है कि उसकी ख्वाहिशों की अमर बेल तो फलती फूलती रहती है दिन दूनी बढती रहती है पर वह इन्सान दिन प्रतिदिन सूखता जाता है, सूखता जाता है, और एक दिन सूख कर खुद को ही खत्म कर लेता है। और जिसने इस ख्वाहिशों रुपी जहरीली अमरबेल को शुरुआत मे ही बढने से रोक द...

सोचता हूं सुबह के अलसाये सूरज को उतार कर

सोचता हूं सुबह के अलसाये सूरज को उतार कर सजा दूं तुम्हारे माथे पे गोल बिन्दी सा और दे दूं एक प्यारा सा चुम्बन मगर तुम मेरी फैली हुयी आतुर बाहों को जो तुम्हे एक बार फिर से अपने मे समेट लेना चाहती हैं छुडा कर, यह कहते हुये चल दोगी कि ‘अब छोडो भी देर हो रही है बच्चों को जगा के तैयार कर के स्कूल भेजना है, नास्ता तैयार करना है माताजी को चाय भी तो देना है और घर के ढेरों काम भी हैं तुम्हे तो नही पर मुझे तो ढेरों काम हैं’ यह सुन मै एक बार फिर लिहाफ ओढ़ के सो जाउंगा खयालों मे खो जाउंगा कि थोडी देर बाद जब तुम फिर अखबार और चाय ले के आओगी तब एक बार फिर मै तुम्हे बाहों मे लेकर प्यारा सा चुम्बन ले लूंगा और तब तुम्हारा चेहरा एक बार फिर गुलाबी हो जायेगा सुबह के खिले सूरज सा मुकेश इलाहाबादी ...

लगाये लगती नही, बुझाये बुझती नही

लगाये लगती नही, बुझाये बुझती नही इश्क की आग में, लपटें दिखती नही रुह और जिस्म दोनो ही जल जाते हैं ढूंढने निकलो तो राख भी मिलती नही मुकेश इलाहाबादी ...............

अब आपकी इस नाज़ुक मिजाजी को क्या कहें, हम ?

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अब आपकी इस नाज़ुक मिजाजी को क्या कहें, हम  ? आहिस्ता आहिस्ता खिल रही हो जैसे कली गुलाब की मुकेश  इलाहाबादी -----------------------------------------

फूलों से आशिकी करते रहे

फूलों से आशिकी करते रहे और खार बन के उगते रहे बचपन मे बिछड थे जिससे उम्र भर उसे ही ढूंढते रहे शोले और शरारे न थे पर अलाव की तरह जलते रहे राह मे धूप और किरचें थी पांव बरहरना हम चलते रहे तुम्हे क्या मालूम मुकेश बाबू दर्द सह कर हम हंसते रहे मुकेश इलाहाबादी ...........

दिले दरवाज़ा खोलो तो

दिले दरवाज़ा खोलो तो तुम भी कुछ  बोलो तो मन हल्का हो जाता है ग़म आये औ रो लो तो इतने सादे सादे क्यूँ हो रंग  प्यार के घोलो तो हवा चले है मतवाली संग पुरवाई डोलो तो मुकेश इलाहाबादी ---

खुशियाँ क़ैद हो गयी ग़म के तहखानो में

खुशियाँ क़ैद हो गयी ग़म के तहखानो में वर्ना कौन जागता है रात के वीरानो में ज़िंदगी के रहगुज़र में मुलाकात न हुयी ढूंढता हूँ तुझे मै अब अपने अफ़्सानो में रुसवाई की मुझे कोई परवाह नहीं अब नाम लिखा रक्खा है अपना दीवानो में मुकेश इलाहाबादी ---------------------

साँझ उतरते ही ज़िंदगी ठहर जाती है

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साँझ उतरते ही ज़िंदगी ठहर जाती है रात होते - होते तन्हाई बिखर जाती है हर रोज़ तुझे पाने के ख्वाब देखता हूँ और देखते - देखते रात गुज़र जाती है तुझसे मिलूं कोई उम्मीद नहीं दिखती मुकेश जिधर तक मेरी नज़र जाती है मुकेश इलाहाबादी -------------------

समन्दर की बेताब लहरों को तो एक बार रोका जा सकता है

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    सुमी, जानती हो, समन्दर की बेताब लहरों को तो एक बार रोका जा सकता है। तूफानो को कैद किया जा सकता है। बेलगाम हवाओं को तो बांधा जा सकता है। मगर दिल के आवारा अरमानों को नही रोका जा सकता है। अगर एक बार ये अरमानों के फलक मे कुलांचे भरने लगते हैं तो फिर ये रुकते ही नही न जाने कहां कहां उडने लगते हैं। अपने वीराने को छोड के या फिर अपने कफ़स को तोड के कल्पनाओं के पंख फडफडाते हुये चल देते हैं अपने आशिक से मिलने और पलक झपकते ही अपनी मुहब्बत के साथ होते हैं किसी बाग मे किसी नदी के किनारे किसी पर्वत पे या फिर अपनी मनचाही जगह पे जहां कोई नही होता सिवाय उसके और उसकी मुहब्ब्त के। वहां सिर्फ होता है खाब देखने वाला और उसकी मुहब्बत। और तब इस ख्वाबों खयालों की दुनिया मे वह अपने सारे अरमा पूरे करता रहता है, खुश होता रहता है। यह अलग बात कि ऑख खुलते ही वह फिर हकीकत की कठोर और तन्हा जमी पे फिर से खुद को रोता बिलखता पाता है। मगर ये ख्वाब ही तो हैं जो इन्सान को अपनी मुहब्बत से जोडे रखते हैं। वस्ल की उम्मीद बने रहते हैं। सच, खाब ही तो हैं जो मुहब्बत को इतना हंसी और जवां बनाये रखते हैं...

दिल बहला लेता हूँ तेरी यादों से

दिल बहला लेता हूँ तेरी यादों से वरना ग़मज़दा हूँ इक ज़माने से मुकेश इलाहाबादी ------------- --

दिल के अंदर कुछ तो टूटता है

दिल के अंदर कुछ तो टूटता है जब जब कोई अपना रूठता है हमने तो अक्सरहां ये देखा कि   अपना ही अपने को लूटता है दरिया एहतियात से पार करो  इंसान किनारे आ के डूबता है हमने लाख जतन किये मगर पहली मुहब्बत कौन भूलता है जबतक दिल में वैराग्य न हो                                             मुकेश मोहमाया कहाँ छूटता है                                                                             ...

जुगनू की रोशनी है

जुगनू की रोशनी है बाकी तो तीरगी है तुम्हे आब न मिलेगा यहां रेत् की नदी है कारवाँ में पीछे हो रफ़्तार की कमी है ग़मज़दा आखें हैं ये इन आखों में नमी है मुकेश घबरा मत तू ये इम्तहाँ की घड़ी है मुकेश इलाहाबादी --

तेरी आखों का काजल बन जाऊं

तेरी आखों का काजल बन जाऊं गोरे गोरे पैरों की पायल बन जाऊं तेरे तन मन में झूम झूम के बरसूँ गर तू कह दे तो बादल बन जाऊं मेरी पीर हरे गर आकर के तू तो बिंधके प्रेमबाण से घायल बन जाऊं है आज भी मेरी चाह यही प्रिये कि मै तेरा सतरंगी आँचल बन जाऊं दिखला दे गर तू एक झलक तो मै भी तेरा प्रेमी पागल बन जाऊं मुकेश इलाहाबादी --------------

मिलना चाहो तो रास्ते हैं

मिलना चाहो तो रास्ते हैं वरना तो बहुत बहाने हैं जानता हूँ इक मै ही नहीं तुम्हारे हज़ारों दीवाने हैं तुम रुसवाई से डरते हो ये बात भी हम जानते हैं राहे ज़िदंगी तनहा नहीं मेरे संग चाँद सितारे हैं इस शहर में मै नया नहीं बहुत लोग मुझे जानते हैं मुकेश इलाहाबादी -------

तेरी क़ैदे मुहब्बत की आरज़ू है, मुकेश

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तेरी क़ैदे मुहब्बत की आरज़ू है, मुकेश आवारगी मुझे अब अच्छी नहीं लगती मुकेश इलाहाबादी --------------------

सुमी, दिनों का हिसाब न भी रखूं तो

सुमी, दिनों का हिसाब न भी रखूं तो न जाने कितने महीने न जाने कितने साल बीत चुके हैं तुमसे मिले हुये, तुमसे बतियाये हुये तुम्हे छू के देखे हुये तुम्हारी खनखनाती हंसी सुने हुये। बस अब तो लगता है जैसे ये युगों युगों पुरानी बातें हो शायद सतयुग की या किसी और युग की और अगर इतनी पुरानी नही तो भी कई कई जनमों पुरानी तो लगती ही है। और अगर तुम इसे भी नही मानती हो तो इतना वक्त तो गुजर चुका है कि हम और तुम जिंदगी के राह मे एक लम्बा मीलों लम्बा रास्ता तय कर चुके हैं जहां आते आते सारी यादें मिट जाती हैं अगर मिटती नहीं तो इतनी धुंधली ज़रूर हो जाती हैं की पहचानना मुस्किल हो जाता है, मगर तुम्हारी यादें तो पत्थर पे खींची लकीरें हैं जो शायद ही कभी मिटे और मिटना भी चाहेंगी तो मिटने न दूंगा मै। खैर --- ये तो सच है सुमी कि हर इंसान, ज़िंदगी के सफर में है। अपनी अपनी तरह। कोई तन्हा तो कोई कारवां के साथ तो कोई अपने महबूब के साथ। मग़र है सभी एक बड़े से कारवां के हिस्से किसी न किसी बात की जुस्तजूं में। कारवां के हर राही के पास अपने अपने असबाब हैं, जिसमें ढे़र सारी उम्मीदें, ग़म, ख़ुशी, उल्फ़त, ज़ुल्मत ...

आग पे चल के देखो तो

आग पे चल के देखो तो दुनिया बदल के देखो तो यूँ घर में छुप कर बैठे हो बहार निकल के देखो तो कांटो से क्या डरना प्यारे फूल सा खिल के देखो तो हैं कितने प्यारे चंदा - तारे खिड़की खोल के देखो तो मै भी इक अच्छा इंसां हूँ मुझसे मिल के देखो तो मुकेश इलाहाबादी -------

मै अपनी ज़ुबानी लिख जाऊंगा

मै अपनी ज़ुबानी लिख जाऊंगा सदी की कहानी लिख जाऊंगा आसमान पे उड़ते सूखे बादल आँखें बिन पानी लिख जाऊंगा दिन ज्वालामुखी का लावा सा रातों को तूफानी लिख जाऊंगा राजा मंत्री संत्री सभी भ्रष्ट और जनता धनदीवानी लिख जाऊंगा सच की बात सिर्फ किताबों में ग़ज़ल में बेमानी लिख जाऊँगा मुकेश इलाहाबादी ---------------

हैरत से देखता है ज़माना और देखता ही रह जाता है

हैरत से देखता है ज़माना और देखता ही रह जाता है ये बला की खूबसूरती और ये  क़यामत की सादगी मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------