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Showing posts from March, 2014

खड़ी बदनशीबी रास्ता रोक कर

खड़ी बदनशीबी रास्ता रोक कर नजूमी कह गया लकीरें देख कर हम दर्द बना फिरता था अब तक चला गया आज वह भी मुड़ कर चाहता तो ज़वाब दे सकता था मग़र चुप रह गया कुछ सोच कर काली घनेरी रात के आलम में बैठा हूँ देर से खामोशी ओढ़ कर  नहीं लौटेगा इस बेदर्द शहर में मुकेश गया हमसे यह बोल कर मुकेश इलाहाबादी ----------------  

ऐ दोस्त, लब से न सही आखों से

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ऐ दोस्त, लब से न सही आखों से ही इशारा कर दिया होता एहसासे  दिल बयाँ करने का ये तरीका भी तो हो सकता था मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------------------------

रखता हूँ मशरूफ़ ख़ुद को किसी न किसी बहाने से

रखता हूँ मशरूफ़ ख़ुद को किसी न किसी बहाने से कोशिश है अपनी उनको भूल जाऊं इसी बहाने से मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

एक सवाल --

एक सवाल -- मुहब्बत मौत से किसी तर कमतर नहीं फिर क्यूँ लोग इश्क़ में ज़िन्द्गी ढूंढते हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

आग की तासीर देखा

आग की तासीर देखा खुदको जला कर देखा कलंदरी होती है क्या सबकुछ लुटाकर देखा टूट जाने की हद तक खुद को झुककर देखा वह अपनी ज़िद पे था बहुत तो मनाकर देखा मुकेश ने सभी को तो दर्दे दिल सूनाकर देखा मुकेश इलाहाबादी ----

अक्सरहां लोग ख़फ़ा हो जाते हैं

बन के बादल बरसना नहीं आया फूलों सा हमें खिलना नहीं आया अक्सरहां लोग ख़फ़ा हो जाते हैं बात मुंह देखी कहना नहीं आया हमने ता उम्र आग ही आग देखी कि आब सा रंवा होना नहीं आया ठहरी हुई झील की मानिंद रहा दरिया सा हमें बहना नहीं आया टूट जाना ही बेहतर लगा हमको आगे तूफाँ के झुकना नहीं आया मुकेश इलाहाबादी -----------------

जो इक ज़माने से था उदास दिल बहल गया

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जो इक ज़माने से था उदास दिल बहल गया चाँद की अठखेलियाँ ऐसी समंदर मचल गया सारे दरो दीवार दरीचे दिल के मुद्दतों से बंद थे हल्की सी तेरे हाथो की थाप भर से खुल गया ज़िंदा इक ज़रा सी उम्मीद के सहारे ही तो था पाके तेरी मरमरी बाहों का सहारा संभल गया मुट्ठी - मुट्ठी रेत मिली इक प्यारा सा घर बना समंदर घरौंदा नहीं घर बहा कर निकल गया मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

ज़रा सी शरारत और तारीफ में तो शरमा जाते हैं वो

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ज़रा सी शरारत और तारीफ में तो शरमा जाते हैं वो जाने अंजामे अदा क्या होगी जब वस्ल की रात होगी मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

इश्क़ की बेचैनियाँ देखी

इश्क़ की बेचैनियाँ देखी ज़माने की तल्खियां देखी मौसमे खिज़र में शाख से टूटती ज़र्द पत्तियां देखी गुलाब को भी मात कर दे रुखसार की ऐसी सुर्खियाँ देखी वक़्त से पहले बुढ़ाती तमाम जवानियाँ देखी भीड़ के चेहरे पे चस्पा चुप्पियाँ देखी किसी भी साज़ से न टूटे हमने ऐसी खामोशियाँ देखी नज़्म में मुकेश की ढेरों खूबियां देखी मुकेश इलाहाबादी --------

माना कि ये सच है मै उसकी जुबां पे नही

माना कि ये सच है मै उसकी जुबां पे नही मगर ये सच है भी मै उसके तसव्वुर मे हूँ मुकेश इलाहाबादी --------------------------

ज़िंदगी हर रोज़ सरकती जा रही

ज़िंदगी हर रोज़ सरकती जा रही मुट्ठी की रेत से फिसलती जा रही चहचहा के परिंदे नीड़ पे लौट गए धूप  सायबान से उतरती जा रही कुछ उम्र कुछ ज़िंदगी की थकन है चेहरे पे  शिकन बढ़ती जा रही हर तरफ लड़ाई दंगा आतंकवाद इंसानियत हर रोज़ मरती जा रही इश्को मुहब्बत की क्या बात करे उम्र मुकेश की भी ढलती जा रही मुकेश इलाहाबादी -------------------

मुकेश बन के बादल न बरसता तो क्या करता ?

मुकेश बन के बादल न बरसता तो क्या करता ? तमाशाई, बहुत थे कोई आग बुझाने वाला न था मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------

गौर से

गौर से बिना फल बिना पत्तियों के सूखे पेड़ देखता हूँ शायद इनमे अपना प्रतिबिम्ब देखता हूँ मुकेश इलाहाबादी -----------a

अपने रुखसार की

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अपने रुखसार की एक चुटकी सुर्खी मल दो मेरे चेहरे पे ताकि मै भी हो जाऊं लाल गुलाल अपने गीले गेसुओं को झटक दो मेरे चेहरे पे ताकि चांदी सी महमाती हुई इन चांदी सी बूंदों से महमा उट्ठे मेरा भी वज़ूद अपने सूने उपवन के पट खोल दिए हैं मैंने ताकि तुम आकर डाल सको एक फागुनी नज़र और हरिया जाए मेरा भी तन मन मुकेश इलाहाबादी -----