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Showing posts from April, 2018

सुनो , तुम अगर समंदर की तरफ जा रहे

सुनो , तुम अगर समंदर की तरफ जा रहे हो, तो समन्दर से ले आना थोड़ी गहराई थोड़ी विशालता थोड़ा खारापन और ले आना उसकी लहरों से थोड़ा मचलना , उछलना, बहना थोड़ी सी शीपी , थोड़ी से रेत् यदि तुम जा रहे हो, पहाड़ों से मिलना, तो लेते पाना पहाड़ों से माँग के थोड़ी से स्थिरता , थोड़ा सा ठोसपन जो जाना तुम जंगल ले आना मांग के जंगल से थोड़ा हरियाली , थोड़ा बीहड़पन थोड़ा सी  फूलों की महक थोड़ी थोड़ी खुशबू जैसे चंदन और महुआ की जो तुम मिलना बादलों से ले आना थोड़ा सा जल थोड़ी सी गड़गड़ाहट यदि कंही न जाना तो भी आ जाना पर आना तुम - ज़रूर मुकेश इलाहाबादी -------------------

अपने नैनो के तीर हमपे न चलाओ

अपने नैनो के तीर हमपे न चलाओ बहुत सीधा- सादा हूँ हमें ने सताओ तुम्हारी ज़ुल्फ़ों मे,कितने पेचोख़म हमको मालूम है सब हमें न बताओ रोई का फाहा हूँ मै ख़ाक हो जाऊँगा यूँ अदाओं की बिजलियाँ न गिराओ हमने तो अपना हाले दिल कह दिया तुम भीतो अपने बारे में कुछ बताओ गुमसुम - गुमसुम न बैठो इस तरह थोड़ा तो हँसो थोड़ा तो मुकसकुराओ मुकेश इलाहाबादी ------------------

हम कब सीखेंगे,

 हवाएं  चुपचाप बहती हैं  दे जाती हैं - ताज़गी फूल खिलते हैं चुपचाप दे जाते हैं - झऊआ भर खुशबू धरती उठाती है हमारा बोझ चुपचाप हम कब सीखेंगे, करना बहुत कुछ और रहना चुपचाप ? मुकेश इलाहाबादी -----------

सर्द मौसम में यही दिलासा है

सर्द मौसम में यही दिलासा है मेरे बदन पे धूप का दुशाला है अभी तो रोशनी थी अब नहीं  किसने काला पर्दा गिराया है  तुझसे मिल के रईस हो गया तेरी हँसी चाँदी का सिक्का है अभी कपडे बदलूंगा चल दूंगा किसीने मिलने को बुलाया है सभी भौंरें तितलियाँ उदास हैं फिर कोई फूल रौंदा गया  है मुकेश इलाहाबादी ------------

अत्र कुसलस्तु, तत्रास्तु

अत्र कुसलस्तु, तत्रास्तु कह कर ख़त लिखने की कोई ज़ररत नहीं रह गयी है आज - इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के समय में जब कि मिनट मिनट की खबर एक दूजे तक पहुंच जाती हो एस  एम् एस और नेट के ज़रिये ऐसे वक़्त में तुम्हे खत लिखना इतिहास के पन्नो में लुप्त होती पत्र लेखन कला को ज़िंदा रखने की मरी मरी कोशिश है। अत्र कुसलस्तु - तत्र कुसलास्तु की ज़रूरत इस लिए भी नहीं है कि मित्र तुम्हे भी पता है जैसे मेरे शहर में बलात्कार हो रहे हैं वैसे ही तुम्हारे यहाँ भी रोज़ रोज़ बलात्कार हो रहे हैं वहां भी डीजल और पेट्रोल के दाम महंगे हो रहे हैं रोज़ - रोज़ रोज़ रोज़ वंहा भी चोरी - छिनैती बढ़ रही है हमारे यंहा भी जिसकी सूचना चीख चीख कर न्यूज़ चैनल तुम तक हमारे यहाँ की हमारे यहाँ की खबर तुम तक पंहुचा ही रहे हैं और हमें भी मालूम है तुम्हारे यहाँ की सड़कें टूटी हैं पुल बनने के पहले ढह रहे हैं तुम्हारे यंहा भी हर साल बाढ़ और सूखा बदस्तूर आता है और सरकार के कान में जूँ नहीं रेंगती है मित्र तुम्हे भी मालूम है राजा और मन्त्री बहरे हो चुके हैं जनता के लिए - अंधे भी हो चुके हैं और क्या लिखूँ मित्र तुम्हे भी...

जो भी सच बोलेगा

जो भी सच  बोलेगा वही जान से जाएगा गुनाह किसी का हो गरीब मारा जायेगा चुनाव आने वाले हैं फिर से दंगा होयेगा जो जो बबूल बोयेगा वो बबूल ही काटेगा  मुकेश फलक बन जा चाँद तेरा हो जायेगा मुकेश इलाहाबादी ---

कदम -कदम पे खुशबू कदम-क़दम पे रोशनी है

कदम -कदम पे खुशबू कदम-क़दम पे रोशनी है मेरा महबूब एक साथ चाँद और गुले रातरानी है होगा वो तुम्हारे ज़ालिम या  फिर होगा क़ातिल  मेरे लिए तो साँस दर साँस है मेरी ज़िंदगानी है कब का खो गया होता उदासियों की खलाओं में हँस रहा हूँ मै महफिलों में ये उसी  मेहरबानी है कुछ लोग कहते हैं वो मोम है कुछ कहे हैं पत्थर  जो छूता हूँ बदन उसका,लगे दरिया की रवानी है  मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

कदम -कदम पे खुशबू कदम-क़दम पे रोशनी है

कदम -कदम पे खुशबू कदम-क़दम पे रोशनी है मेरा महबूब एक साथ चाँद और गुले रातरानी है होगा वो तुम्हारे लिए होता या होगा वो क़ातिल  मेरे लिए तो साँस दर साँस है मेरी ज़िंदगानी है मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

मै चींखना चाहता हूँ

मै चींखना चाहता हूँ चींख नहीं पाता सिर्फ गों - गों कर के रह जाता हूँ रोना चाहता हूँ - रो नहीं पाता हँसना चाहता हूँ तो हँसी की नदी न जाने किस रेगिस्तान में जा के सूख जाती है ? लेकिन टी वी के रिमोट का बटन दबाते ही मुझे हँसी आने लगती है रोना भी आने लगता है किसी गलत बात पे गुस्सा भी आने लगता है यंहा तक कि मुट्ठियां भी भींच जाती हैं और छोटी छोटी दुःख भरी घटनाओं पर घंटो के लिए उदास हो जाता हूँ (कंही टी वी के रोमोट का एक बटन मेरे दिमाग़ में तो नहीं फिट हो गया है ? मुकेश इलाहाबादी --------------------------
ज़रूरी जानकारी ------------------------------------------------------------- मेरी वाल से बहुत सारे मित्रों के इन बॉक्स में कुछ विडिओ के लिंक जा रहे हैं। शायद ये कोई वायरस है जो फ्लोट हो रहा है।  ऐसा कोई लिंक मेरी तरफ से नहीं भेजा जा रहा है।  अगर किसी मित्र के इन बॉक्स में आता है कोई अन्नों मेसेज तो उसे इग्नोर करें।  और पूछ ताछ न करें। धायनवाद। मुकेश इलाहाबादी ------------------

रोज़-रोज़ गरल पी रहे हो तुम

रोज़-रोज़ गरल पी रहे हो तुम मर-मर के क्यूँ जी रहे हो तुम बहुत कुछ बोलना तो चाहते हैं फिर होठं क्यूँ सी रहे हो तुम ? मुकेश इलाहाबादी ------------

वह पत्थर की मुर्ती थी।

वह पत्थर की मुर्ती थी। सुना तो यह गया है, वह पत्थर की देवी थी। पत्थर की मूर्ति। संगमरमर का तराशा हुआ बदन। एक - एक नैन नक्श, बेहद खूबसूरती से तराशे हुए। मीन जैसी ऑखें ,सुराहीदार गर्दन, सेब से गाल। गुलाब से भी गुलाबी होठ। पतली कमर। बेहद खूबसूरत देह यष्टि। जो भी देखता उस पत्थर की मूरत को देखता ही रह जाता। लोग उस मूरत की तारीफ करते नही अघाते थे। सभी उसकी खूबसूरती के कद्रदान थे। कोई ग़ज़ल लिखता कोई कविता लिखता। मगर इससे क्या। . .. ? वह तो एक मूर्ति भर थी। पत्थर की मूर्ति। सुना तो यह भी गया था, कि वह हमेसा से पत्थर की मुर्ति नही थी। बहुत दिनो पहले तक वह भी एक हाड मॉस की स्त्री थी। बिलकुल आम औरतों जैसी। यह अलग बात वह जब हंसती तो फूल झरते। बोलती तो लगता जलतरंग बज उठे हों। चलती तो लगता धरती अपनी लय मे थिरक रही हों। उसके अंदर भी हाड मासॅ का दिल धडकता था। वह भी अपनी सहेलियों संग सावन मे झूला झूला करती थी। उसके अंदर भी जज्बात हुआ करते थे। वह भी तमाम स्त्रियों सा ख्वाब देखा करती थी। वह भी सपने मे घोडा और राजकुमार देखा करती । और ------ एक दिन उसका यह सपना सच भी हुआ । उसके गांव मे एक मुसाफिर आया। बडे...

तुम बोलना नहीं जानती '

तुम बोलना नहीं जानती ' मै - कहना नहीं चाहता तो , चलो तुम मेरे सीने पे अपना सिर रख दो मै तुम्हारी खामोशी सुनूँ तुम मेरी धड़कने मुकेश इलाहाबादी --------

तुम्हे वायलिन बजाना आता है ?

लड़की, ने कहा 'सुनो ! तुम्हे वायलिन बजाना आता है ? लड़के  ने कहा  "हाँ " "क्यूँ ?" "मुझे सीखना है "  लड़की इठलाई लड़के ने कहा "ओ के , पास आओ , थोड़ा और ,,,, "हूँ ! अब ये लो वायलिन अपनी गोद में रखो, उँगलियाँ तारों पे " "नहीं - नहीं , ऐसे नहीं " लड़के ने उसको पीछे से पकड़ के काँधे पे अपनी ठुड्डी टिकाते हुए  "ऐसे नहीं ऐसे ,,, लड़की के दोनों हाथो पे अपने हाथ रखते हुए उँगलियों को पकड़ के  "देखो , ऐसे ,,,,, अब ! दोनों की उँगलियाँ वायलिन पे तेज़ी से दौड़ने लगी लड़की की दोनों आँखे पहले चमकी फिर बंद हो गयीं और इधर दोनों की उँगलियाँ वायलिन के  तारों पे दौड़ रही थीं  उधर एक नए सुर की सृष्टि हो रही थी वायलिन पे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

जादू

उसने,  कहा - "आओ ! तुम्हे जादू दिखाऊँ " "दिखाओ" ! हुलस के दुसरे ने कहा  "अपनी आँखे बंद करो" - पहले ने कहा  मासूमियत से सामने वाले ने आँखे बंद कर लीं  पहले वाले ने , सामने वाले के दोनों कंधो पे अपने दोनों हाथ रक्खे  फिर अपने होठों को गोल - गोल किया  और ,,,,, रख दिए - बड़ी आहिस्ता से  पलकों पे  और, फुसफुसा के कहा "जादू दिखा ?" "हाँ दिखा "  और वो जादू देखने में मशगूल हो गयी  (शायद एक जादू ऐसे भी देखा और दिखाया जाता है ) मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

जाने क्या क्या सपने बुनने लगता है मन

जाने क्या क्या सपने बुनने लगता है मन तुमसे बतियाऊं तो महकने लगता है मन बुझा हुआ अलाव था मेरा मन तुमसे मिल जाने क्यूँ हौले- हौले दहकने लगता है मन मुकेश इलाहाबादी --------------------------

छोटे कलेवर का बृहद काव्यसंग्रह - तुम्हारे जाने के बाद - कवियित्री - मधु सक्सेना ----------------------------------------------------------------------------------------

छोटे कलेवर का बृहद काव्यसंग्रह - तुम्हारे जाने के बाद - कवियित्री - मधु सक्सेना ---------------------------------------------------------------------------------------- सोचो, जीवन की पगडंडी पे चले जा रहे हो, आप ख़रामा - ख़रामा खुश - खुश सब कुछ गुड़ी - गुड़ी और,,,,, अचानक आप का जीवन साथी सीने में दर्द की  बात कहता है और आप कुछ समझो - समझो वो आप का हाथ छुड़ा के हवा में विलीन हो जाता है हमेशा - हमेशा के लिए और छोड़ जाता है एक न भरने वाला शून्य इसी शून्य को अपनी कविताओं से भरने का  सार्थक और प्यारा प्रयास है आभासी दुनिया की मेरी एक बहुत प्यारी मित्र और एक बहुत अच्छी कवियित्री "मधु सक्सेना" जी का ताज़ा काव्य संग्रह, 'तुम्हारे जाने के बाद' तुम्हारे जाने के बाद मधु जी का काव्य संग्रह न केवल अपने जीवन साथी के प्रति सच्ची निष्ठा और भावांजलि है, बल्कि अपने प्रेमी और पति के लिए लिखा जाने वाला अनूठा काव्य संग्रह है।  जो शायद आज तक किसी और कवियित्री ने अपने प्रेमी या पति की याद में रचा हो। मधु जी से पिछले दिनों उनके दिल्ली प्रवास के दौरान मुलाकात हुई. सौम्य व्यवक...

तुम्हारी सादगी और ख़ूबसूरती बेमिसाल है

तुम्हारी सादगी और ख़ूबसूरती बेमिसाल है और तू मेरी दोस्त है इस बात पे हमें नाज़ है गेंदा, देखा, गुलाब, देखा देखे हमने ढेरों फूल जो गुलों से भी जो खूबसूरत है,आप के गाल हैं मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

जब हम गुफाओं से निकले थे

जब हम गुफाओं से निकले थे असभ्य थे पर बर्बर न थे हिंसक थे पर पेट भरने तक तन पे कपडे न थे पर आँखों में हया के वस्त्र होते थे जब हम गुफाओं से निकले धरती - माता चंदा हमारा मामा होता था पत्थर हमारा देवता होते थे पर हम पत्थर के नहीं थे जब हम गुआओं में रहते थे तब तो ऐसे न थे ?? असभ्य तो थे पर बर्बर तो न थे मज़हब के लिए पैसे के लिए यूँ मरते कटते तो न थे जब हम गुफाओं से निकले थे तब ऐसे तो न थे ?? मुकेश इलाहाबादी ------------

तेरी तस्वीर देखता हूँ कुछ सपने बुनता हूँ

तेरी तस्वीर देखता हूँ कुछ सपने बुनता हूँ तनहा रातों में तेरी यादों के मोती चुनता हूँ लोग पूछते हैं इतना खामोश क्यूँ रहता हूँ उन्हें क्या पता दिल के अंदर तुझको सुनता हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

बदन का हर हिस्सा सुलगता हुआ लगता है

बदन का हर हिस्सा सुलगता हुआ लगता है  कौन सा सूरज है,? जिस्म के अंदर जलता है दूर तक कोई नहीं है फिर ये पदचाप किसकी  मेरे ज़ेहन की वीरान छत पे ये कौन चलता है जब तलक कोई अपना न था कोई बात न थी कोई अपना हो के बिछड़ जाये तो खलता है जानता हूँ उसके दिल में मेरे लिए कुछ नहीं फिर क्यूँ आँखों में उसी का सपना पलता है  ये और बात मुझे छोड़ कर चला गया मुकेश अक्सर मुझे याद करता होगा ऐसा लगता है मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

सच है ग़मो की इन्तहां हो तो बेचैनियाँ बतियाती हैं

सच है ग़मो की इन्तहां हो तो बेचैनियाँ बतियाती हैं लफ्ज़ खामोश हो जाएँ तो खामोशियाँ बतियाती हैं जब दीवारें उठ कर दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं तो सिसकते हैं रोशनदान और  खिड़कियाँ  बतियाती हैं मुकेश, आओ कुछ देर को भौंरा बन गुलशन में चलें हम भी देखें क्या गुलों से ये तितलियाँ बतियाती हैं मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

जानती हो ! ये जो समंदर है न,

सुमी, जानती हो ! ये जो समंदर है न, आज से हज़ारों हज़ार साल पहले आज की तरह न तो खारा था और न ही यह एक जगह ठहरा हुआ था, इस  समंदर का भी पानी नदियों के जल की तरह मीठा होता था और बहा करता था।  यंहा से वंहा तक, वंहा से वंहा तक, जंहा तक ज़मीन हुआ करती थी दूर - दूर तक। ये समझ लो सुमी, ये समंदर एक महाद्वीप से दुसरे महाद्वीप तक दुसरे से तीसरे महाद्वीप तक बहा करता था।  कभी अपनी मौज़ में आ कर ठांठे मारा करता  था, तो कभी बिलकुल शांत हो जाया करता था, तो कभी हौले हौले बहा करता था अपनी मौज़ में। पर था अपनी तनहाई में खुश और प्रसन्न।  लेकिन एक दिन एक आसमानी परी जो ज़मी पे तफरीहन आयी थी जो बिलकुल तुम्हारी तरह थी, कजरारी आँखे, मरमरी बाहें और प्यारी मुस्कान वाली,वो अपना आसमानी आँचल फैला के समंदर किनारे चहलकदमी करने लगी। जैसे उस दिन तुमने किया था, आसमानी परी के गुलाबी कोमल पाँव समंदर के किनारे की रेत् पे अपनी कोमल छाप छोड़ रहे थे , जैसे तुम्हारे कदमो के निशान थे उस दिन जैसे। समंदर उस आसमानी परी की अठखेलियाँ देख चंचल हो उठा और वो अपनी उत्तल तरंगो से उसके पाँव पखारने लगा, आसमान...

तुम आना,

तुम , उदास होना तो आना, मै तुम्हे लतीफ़ा सुनाऊँगा तुम हँसना, तुम जब, अनमनी होगा  तब आना, मै तुम्हे गुदगुदी लगाऊँगा तुम खिलखिलाना तुम जब खुश होना - तब आना हम तुम कट्टम - कुट्टा खेलेंगे कागज़ पे और हंस हंस कर करेंगे धौल - धप्पा तुम बारिस हो तब आना हम तुम भुट्टा खाएंगे, और टहलेंगे कनॉट प्लेस के बरामदे में लेकिन तुम आना, जब मन हो - तब आना मुकेश इलाहाबादी ----------------------

चाँद उगते ही चलने लगता हूँ मै भी

दर रोज़ चाँद उगते ही चलने लगता हूँ मै भी, उसके साथ - साथ क़दम ताल करते हुए चाँद के साथ साथ कभी धीरे तो कभी तेज़ पर चाँद - कभी इठला कर तो कभी मुस्कुरा कर बादलों के पीछे छुप जाता है किसी पहाड़ या ईमारत के पीछे और मै तनहा रह जाता हूँ जी रोने रोने को करता है पर थोड़े ही देर में चाँद फिर मेरे साथ साथ चलने लगता है पर चाँद कभी भी बगलगीर हो के नहीं चला मेरे साथ बहुत बार ऐसा भी हुआ है चाँदनी रातों में लेटा रहा छत पे तनहा सोचता हुआ चाँद के बारे में बतियाता रहा चाँद से , चाँद के ही बारे में इस उम्मीद पे शायद किसी दिन सितारों की तरह किसी दिन चाँद भी टूट कर फलक से गिरे और मै उसे लोक लूँ अपनी बाँहों में पर ! ऐसा भी नहीं हुआ कभी बस यही इक अफ़सोस है सुन रह हो न मेरे चाँद ?? मुकेश इलाहाबादी --------------

तू, मेरी कोई रिश्तेदार नहीं

तू,  मेरी कोई रिश्तेदार नहीं बिज़नेस पार्टनर या ऑफिस कलीग नहीं यंहा तक कि पड़ोसी भी नहीं कि ज़रूरत पड़ जाये गाहे - बगाहे फिर क्यूँ ऐसा लगता है तू नहीं तो - कुछ भी नहीं है ज़िंदगी में मुकेश इलाहाबादी -----------

जब कभी लिखना चाहा कविता

जब कभी लिखना चाहा कविता धरती की धारणा शक्ति और सहनशीलता पे तब तुम बहुत याद आये गर कभी लिखना चाहा कविता किसी फूल पे तब तब तुम बहुत याद आये जब जब लिखना चाहा कविता तुम बहुत याद आये मुकेश इलाहाबादी ----

हया है नाज़ुकी है खुशबू है ख़ूबसूरती है

हया है नाज़ुकी है खुशबू है ख़ूबसूरती है तू ऐसा फूल है जिसमे क्या कुछ नहीं है जिस्म साँस लेता है,तो कह लो ज़िंदा हूँ तुझ बिन ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी है जिसका पानी पी कर  कोई भी न बचा  मुकेशजी मुहब्बत ऐसी ज़हरीले नदी है मुकेश इलाहाबादी --------------------

जी तो चाहता है

जी तो चाहता है मक्खन के गोले से भी ज़्यादा मुलायम और सफ़ेद गालों पे खिलने वाली इस क्यूट मासूम और नटखट मुस्कान को अपनी कानी उंगली से छू कर होंठो से लगा लूँ और चख लूँ इस ताज़े ताज़े मक्खन का स्वाद या फिर तुम्हारे इस गुलू - गुलू गालों को अपने दोनों हाथों की चुटकी बना कर जोर से खींचूं और भाग जाऊँ तुम्हारी पहुंच से बहुत दूर या कि ऐसा करूँ तुम्हारे इस प्यारे से गालों को अपनी हथेली की अंजुरी में ले कर कर दूँ किस्सी की बरसात मुकेश इलाहाबादी --------------------

जब से,

जब से,  पौधा रोपा है तुम्हारे नाम का महकता है मेरा तन-मन अहर्निश रात, लगा लेता हूँ तकिया तुम्हारे नाम की और डूब जाता हूँ एक गहरी नींद में मन उदास होता है तो तुम्हे याद कर लेता हूँ और मुस्कुराता हूँ अकेले में बहुत देर तक मुकेश इलाहाबादी --------------