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Showing posts from February, 2016

पत्थरों को काट कर निकला हूँ मै

पत्थरों को काट कर निकला हूँ मै तिश्ना  लबों  के  लिए दरिया हूँ  मै मेरा सीना पुल है गुज़र जाओ तुम नदी के पार जाने का जरिया हूँ मै  कोई  मुसाफिर भटकने न पायेगा राहमें मील के पत्थर सा गड़ा हूँ मै    मुकेश इलाहाबादी ------------------ (तिश्ना लब - प्यासे होठ )

परती धरती और पहली बारिस

परती धरती और पहली बारिस बारिस की हल्की हल्की बूंदो के गिरते ही लगा बरसों की परती पडी धरती थरथरा उठी हो। माटी की पोर पोर से भीनी भीनी सुगंध चारों ओर अद्रष्य रुप से व्याप्त हो गयी थी। लॉन से आ रही हरसिंगार, मोगरा, गुड़हल और चमेली की खुषबू को संध्या अपने नथूनों में ही नही महसूस कर रही थी बल्कि अपनी संदीली काया के रोम रोम में सिहरन सा महसूस कर रही थी। बेहद तपन के बाद बारिष के मौसम की तरह वह अपने अंदर आये इस बदलाव से वह अंजान नही थी। पर उम्र के इस उत्तरायण में इस क़दर भावुक मन होना वह स्वीकार नही कर पा रही थी और अस्विकार भी। फिलहाल, संध्या अपने मन के सारे विक्षोभों को परे धकेल, अपने आप को पूरी तरह मन के हवाले कर देना चाह रही थी। और फूलों की तरह किसी डाली से लगी रह कर डोलना व तितली की तरह उडना चाह रही थी। इस हल्की हल्की बारिस की बूंदों की सिहरन, मन के अंतरतम तल तक महसूस कर लेना चाहती थी। दिल तक। इस अंजानी खुषी व षीतल छुअन ने पेड़ पौधों लताओं व गुल्मों को हौले हौले तो कभी जोर से हिलते पत्तों के संगीत में डूब जाना ही चाहती थी। बाहर गुलमोहर की पत्तियों से छन छन करती बूदें स्वर लहरियों में खो जा...

चाँद जैसे ही झील में उतारना चाहता है

चाँद जैसे ही झील में उतरना चाहता है लहरें कभी कुनमुना कर कभी मुस्कुराकर करवट बदल लेती हैं चाँद कभी शरमा कर कभी घबरा कर फिर फिर जा टांगता है आकाश में फिर वही से देखता है ठहरी हुई नीली झील को मुकेश इलाहाबादी -----

सूरज के आकर्षण में बिंधी पृथ्वी,

सूरज के आकर्षण में बिंधी पृथ्वी, अपनी धुरी पे नाचती हुई अपने सूरज का चक्कर लगा रही है अहर्निश अपने दोनों के दरम्याँ की दूरी कम कर रही है यह जानते हुए भी कि जिस दिन वह सूरज के आगोश में आएगी वह भष्म हो जाएगी उसका वज़ूद ख़ाक हो जाएगा उधर सूरज भी धरती के प्रेम से बेखबर अपनी धुरी पे घूमता हुआ अन्नत आकाश की तमाम निहारकाओं के चक्कर लगा रहा है अहर्निश सुमी , शायद हम तुम भी अपनी अपनी धुरी पे घुमते हुए चक्कर लगा रहे हैं अपने अपने सूरज के लिए मुकेश इलाहाबादी ----------------

. यही खाब ही तो हैं जो मुझे भी जिदा रखे है

सुमी, जानती हो, समन्दर की बेताब लहरों को तो एक बार रोका जा सकता है। तूफानो को कैद किया जा सकता है।  बेलगाम हवाओं को तो बांधा जा सकता है। मगर, दिल के आवारा अरमानों को नही रोका जा सकता है। अगर एक बार ये अरमानों के फलक मे कुलांचे भरने लगते हैं तो फिर ये रुकते ही नही न जाने कहां - कहां उडने लगते हैं। अपने वीराने को छोड के या फिर अपने कफ़स को तोड के कल्पनाओं के पंख फडफडाते हुये चल देते हैं, अपने आशिक से मिलने और पलक झपकते ही अपनी मुहब्बत के साथ होते हैं, किसी बाग मे, किसी नदी के किनारे, किसी पर्वत पे या फिर अपनी मनचाही जगह पे जहां कोई नही होता सिवाय उसके और उसकी मुहब्ब्त के। वहां सिर्फ होता है खाब देखने वाला और उसकी मुहब्बत। और तब इस ख्वाबों खयालों की दुनिया मे वह अपने सारे अरमा पूरे करता रहता है, खुश होता रहता है। यह अलग बात कि ऑख खुलते ही वह फिर हकीकत की कठोर और तन्हा जमी पे फिर से खुद को रोता बिलखता पाता है। मगर ये ख्वाब ही तो हैं जो इन्सान को अपनी मुहब्बत से जोडे रखते हैं। वस्ल की उम्मीद बने रहते हैं। सच, खाब ही तो हैं जो मुहब्बत को इतना हंसी और जवां बनाये रखते हैं ये खाब ही तो हैं ...

वो तो खारा बहुत समंदर निकला

वो तो खारा बहुत समंदर निकला जिस्म मोम दिल पत्थर निकला जिसको समझा, अपना  सबकुछ दुश्मन  से  भी वो  बदतर निकला सोना खरा मान रहे थे जिसको हम खोटे सिक्के से भी कमतर निकला मुकेश इलाहबदी ---------------------

उनींदी आँखों का सच

नींद ने दगा दे दिया या, मैंने ही, नींद से पल्ला छुड़ा लिया ये तो पता नहीं पर, ये सच है वर्षों पहले तुम्हारे जाने के बाद से आज तक नींद भर, सोया नहीं  (सुमी ! मेरी उनींदी आँखों का सच तो यही है ) मुकेश इलाहबदी ---------

प्रेम गली अति सांकरी

सुमी,   सुना है, किसी सयाने ने कहा है।  ' प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई न समाय' जब कभी सोचता हूँ इन पंक्तियों के बारे में तो लगता है, ऐसा कहने वाला, सयाना  रहा हो या न रहा हो, पर प्रेमी ज़रूर रहा होगा,जिसने प्रेम की पराकष्ठा को जाना होगा महसूस होगा रोम - रोम से , रग - रेशे से, उसके लिए प्रेम कोई शब्दों का छलावा न रहा होगा, किसी कविता का या ग़ज़ल का छंद और बंद न रहा होगा, किसी हसीन शाम की यादें भर न रही होगा - उसके लिए तो प्रेम अपने और अपने प्रेमी के अस्तित्व का अनुभव भर नहीं पूरी समष्टि और सृष्टि का अनुभव रहा होगा - प्रेम। तभी तो उसने ये बात कही होगी - प्रेम गली अति सांकरी। हाँ !!  वो बात दीगर उसकी महबूबा कोई हाड- मॉस की रही हो या फिर ईश्वर रहा हो या की 'सत्य' रहा हो. पर इतना सच है, उसने प्रेम की पराकाष्टा को छुआ होगा। शायद तभी ये कह भी पाया होगा।   एक बात जान लो सुमी, ये तो सच है 'प्रेम'  कोई राजपथ नहीं है जिसपे शान से चला जा सके।  प्रेम की गली में तो राजा रानी को भी सट सट के चलना होता है, खाई खंदक से बच - बच के निकलना होता है , वरना तो , ज़रा...

नाज़ुकी से किसी ने मुझको तराशा ही नहीं

नाज़ुकी से किसी ने मुझको तराशा ही नहीं  वर्ना हम भी कोहिनूर से कुछ कम तो नहीं  मुकेश इलाहबदी -------------------------

जमे हुए ज़ख्म पिघले होंगे

जमे हुए ज़ख्म पिघले होंगे आँख से आँसू तब बहे होंगे किसी ने तो दुलराया होगा दर्द के किस्से तब कहे होंगे कुछ तो हमदर्दी रही होगी तभी तेरे  किस्से  सुने होंगे  तमाम सर्द रातें काटी होंगी तभी तो ये ज़ख्म जमे होंगे तमाम रात बातें की उनने  वे, मुद्द्तों बाद मिले होंगे  मुकेश इलाहाबादी ---------

कोई मसले और फूल सा बिखर जाऊँ

कोई मसले और फूल सा बिखर जाऊँ मै लोहा भी नही,कि साँचे में ढल जाऊँ ये और बात गुलशन की शिफत अपनी प्यार मिलते ही मै ,फूल सा खिल जाऊँ मै सूरज हूँ धूप सा बिखरा हूँ हर सिम्त ज़रा खिड़खी तो खोल,तो मै नज़र आऊँ मुकेश इलाहाबादी -----------------------

मेरी कविता में

मेरी कविता में खिलता है सिर्फ एक फूल थोड़ी सी खुशबू एक इन्द्रधनुष और . होती हो 'तुम" और -- तुम्हारी कविता में ???? मुकेश इलाहबदी -------------------

तथागत (बुद्ध) से कम नहीं

शहर बन चुके कस्बे के बेहद  पुराने मोहल्ले के पुराने मकान की टूटती मुंडेर वाली छत पे जिसपे जाड़े की धूप चटाई सा बिछी है उस चटाई के ऊपर एक फटी दरी पे असमय झुराती काया महंगाई आतंकवाद बेरोजगारी जैसी तमाम समस्याओं से खुद को अलग कर के धूप सेंक रहा है वो धूप सेंकती काया मुझे किसी तथागत (बुद्ध) से कम नहीं लग रही है  मुकेश इलाहबदी ------------  

वक़्त उड़ रहा है

वक़्त उड़ रहा है फर फर फर  बिन परों के हम वही गड़े हैं मील के पत्थर सा उड़ने की चाह में मुकेश इलाहबदी -----

प्रतिफलन

कानों मे सारंगी बजती है आँखों में इन्द्रधनुष लहराता है ये सब मेरा मतिभ्रम है या, तुमसे मिलने का प्रतिफलन ? मुकेश इलाहबदी --------------

अनखिले रह जाते हैं

कुछ फूल अनखिले रह जाते हैं एक खूबसूरत कविता लिखे जाने से चूक जाती है  (जिस दिन तुमसे मुलाक़ात नहीं होती बात नहीं होती) मुकेश इलाहबदी --------

तुम्हारे पास वक्त ही कहां है ?

तुम्हारे पास वक्त ही कहां है ? सुबह की आपा धापी के बाद जब बच्चे स्कूल और पति आफिस जा चुके होते हैं काम वाली झाडू पोछा लगा के बर्तन और कपडे साफ कर के     जा चुकी होती है तब भी तो बहुत से काम होते हैं मॉ को फोन करके हाल चाल लेना है पिताजी को वक्त से दवाई लेते रहने की हिदायत देनी होती है भाई के बारे मे जानना होता है जाडा जाने वाला है सारे कपडों को धूप दिखा के बक्से मे रखना है बच्चों ने उस दिन अलमारी खोली थी सब कुछ उलट पुलट कर दिया था पडोसन की सास आयी है मिलने जाना जरुरी है फिर कुछ देर आराम और मनोरंजन भी तो इन्सान के लिये जरुरी है सच तुम्हारे पास एक अकेली जान के पास कितने तो काम रहते हैं भला इतने कामो के बीच हमे कैसे याद कर सकती हो तुम सही कहती हो मेरे पास तो सिवाय तुम्हे याद करने के कोई काम ही नही है। मुकेश इलाहबदी ----------

राख कुरेदता हूँ

आग बुझ चुकी है राख बाकी है रह रह के राख कुरेदता हूँ भीतर राख से लिपटे कुछ अंगारे शेष हैं मुह अलाव के पास ले जाकर फूंकता हूँ अंगारे चमकने लगते हैं सुर्ख सेव सा तुम्हारे गाल याद आये कुछ राख उड़ के आँखों में आ गयी गमछे से राख और आँसू पोंछूँगा और अलाव की सोंधी सोंधी गमक में ऊँघता रहूंगा और खाब में देखूँगा तुम्हे बहुत देर तक मुकेश इलाहबदी --------

तुम्हे याद रखता हूँ

काम के वक़्त भी तुम्हे याद रखता हूँ फिर फुर्सत मिलते ही तुम्हे, पूरी तफ्सील से याद करता हूँ मुकेश इलाहाबादी --------- 

चुप्पी

चुप्पी में कई चीखते हुए सवाल हैं शायद जिनके उत्तर किसी भी पोथी किसी भी दिग्ग्दर्शिका किसी भी धर्मग्रन्थ में नहीं हैं अगर रहे भी हों तो उन्हें मिटा दिया गया है हमेसा हमेसा के लिए ताकि इन चुप्पियों से कोई आवाज़ न उठे चुप करने वालों के ख़िलाफ़ मुकेश इलाहबदी -------------

मसखरे भाई!

मसखरा, रोता तो हम हँसते मसखरा बेवकूफियां करता तो हम हँसते मसखरा ज़ोर ज़ोर से ताली बजा के पागलों सा हँसता तो हम कहकहे लगाते पर, उस दिन मसखरा बहुत उदास दिखा हमने पूछा 'क्यूँ मसखरे भाई! आज तक हमने तुम्हे हँसते देखा है या फिर रोते देखा है उदास तो  कभी नहीं देखा तुम्हारे चेहरे पे ये उदासी क्यूँ ?' मसखरा, कुछ और उदास हो गया कहने लगा दरअसल बात ये है, आज कल हमारा धंधा ख़त्म हो गया है, क्यूँ कि मसखरी बेवकूफियां और बेहूदगीयां अब नेता, मौलवी और धर्म गुरू करने लगे हैं, लिहाज़ा मेरे पास अब काम ही नहीं बचा इसी लिए मै उदास हूँ, यह सुन कर मै भी उदास हो गया अब मै और मसखरा दोनों ही उदास हो चुके थे मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

अलसाया सूरज भी जब रात

सुमी, मुझे मालूम है अलसाया सूरज भी जब रात के पहलू से निकलने के लिए सोच रहा होता है उसके पहले ही तुम छोड़ चुकी होती होगी लिहाफ झाड़ू पोछा नहाना धोना पूजा पाठ निपटा कर नास्ते की तैयारी कर के बच्चों को जगा रही होती हो स्कूल जाने के लिए बच्चों के बाद पति के ऑफिस जाने की तैयारी उसके बाद भी तो तमाम काम होते होंगे जिन्हे निपटना होता होगा चकरघिन्नी सा नाचते रहना होता होगा चकले - बेलन के बीच गोल - गोल घूमती रोटी सा इन सब के बीच भी कुछ कुछ देर में अपने ऍफ़ बी एकॉउंट स्टेटस देख लेती होगी और मेरे नोटिफिकेशन को पढ़ती होगी लाईक भी करती होगी पर बिना कुछ कमेंट किये आगे बढ़ जाती होगी दुसरे नोटिफिकेशन्स पढ़ने के लिए मेरे बारे में मुस्कुरा कर सोचते हुए मुकेश इलाहबदी ---------

ये मत कहना मै झुट्ठा हूँ

तुम्हारे, सपने में आते हैं कंगना, पायल बिछिया, झुमका लहंगा चाँद, तारे,फूल खुशबू सावन झूला और मेरे सपने में सिर्फ 'तुम' (अब, ये मत कहना मै झुट्ठा हूँ ) मुकेश इलाहाबादी --