सुमी, सुना है, किसी सयाने ने कहा है। ' प्रेम गली अति सांकरी, जा में दुई न समाय' जब कभी सोचता हूँ इन पंक्तियों के बारे में तो लगता है, ऐसा कहने वाला, सयाना रहा हो या न रहा हो, पर प्रेमी ज़रूर रहा होगा,जिसने प्रेम की पराकष्ठा को जाना होगा महसूस होगा रोम - रोम से , रग - रेशे से, उसके लिए प्रेम कोई शब्दों का छलावा न रहा होगा, किसी कविता का या ग़ज़ल का छंद और बंद न रहा होगा, किसी हसीन शाम की यादें भर न रही होगा - उसके लिए तो प्रेम अपने और अपने प्रेमी के अस्तित्व का अनुभव भर नहीं पूरी समष्टि और सृष्टि का अनुभव रहा होगा - प्रेम। तभी तो उसने ये बात कही होगी - प्रेम गली अति सांकरी। हाँ !! वो बात दीगर उसकी महबूबा कोई हाड- मॉस की रही हो या फिर ईश्वर रहा हो या की 'सत्य' रहा हो. पर इतना सच है, उसने प्रेम की पराकाष्टा को छुआ होगा। शायद तभी ये कह भी पाया होगा। एक बात जान लो सुमी, ये तो सच है 'प्रेम' कोई राजपथ नहीं है जिसपे शान से चला जा सके। प्रेम की गली में तो राजा रानी को भी सट सट के चलना होता है, खाई खंदक से बच - बच के निकलना होता है , वरना तो , ज़रा...