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Showing posts from August, 2020

फूलों की नाव है

  एक फूलों की नाव है और एक ही पतवार है जिसके सहारे घूम रही है गोल - गोल वहीं की वहीँ दरियाए ज़िंदगानी में यही गोल - गोल घेरे अब धीरे धीरे - छोटे और छोटे होते जा रहे इतने छोटे की एक वृत में तब्दील हो चुके हैं ये छोटा वृत्त भंवर में तब्दील हो चुका है जिसमे मेरी नाव डूब रही है तेज़ तेज़ घुमते हुए आह ! मेरे पास उम्मीद के नाम पे दूर बहुत दूर क्षितिज पे एक चमकता सितारा है अगर वो अपनी चांदी सी किरण मेरी तरफ भेज दे तो शायद उसे पकड़ अपनी फूलों की नाव को उसे चमकीले तारे की रस्सी से बाँध किसी ठाँव लग जाऊं पर जानता हूँ ऐसा कुछ होगा नहीं और एक दिन मै तनहाई की नदी के भंवर में - फूलों की नाव और एक पतवार के साथ और -- तब रह जायेगा नदी के ऊपर एक स्याह आकाश और एक छोटा सा चमकता सितारा मुकेश इलाहाबादी -------------------

गाँठे

  एक --- कुछ गाँठे किसी भी जतन से न तो खुलती हैं न ही गलती हैं बस टीसती रहती हैं उम्र भर दो --- आज फिर खोली स्मृतियों की पोटली में लगी तुम्हारे नाम की गाँठ और बिखर गए तुम्हारी यादों के हीरे मोती उन्हें ही दिन भर सहेजता रहा समेटता रहा मुकेश इलाहाबादी ----

ईश्क़ ही जन्नत है मुझे मर जाने दे

ईश्क़ ही जन्नत है मुझे मर जाने दे तेरी आँखे इक नदी मुझे डूब जाने दे सुना है ईश्क़ एक आग का दरिया है अगर ये आग ही है तो जल जाने दे लोग कहते हैं तेरी बातों में नशा है इक बार मुझको भी बहक जाने दे मुसाफिर हूँ शुबो होते ही चल दूँगा शब् भर को सही मुझे ठहर जाने दे रात भर बहुत रोई हैं ये आँखे मुकेश इन्हे पल दो पल ही सही मुस्कुराने दे मुकेश इलाहाबादी ------------

जिस्म से रूह तक महकती है

  जिस्म से रूह तक महकती है इत्र की नदी फूलों की कश्ती है हैं सोने के बाल चाँदी का बदन परी है रात खाबों में उतरती है अदा की चूनर हया का दुशाला मोम से भी मुलायम लगती है फ़रिश्ते भी देखने उतर आते हैं बेनकाब घर से जब निकलती है कुछ भी पूछो खामोश रहती है कभी मुस्काती है कभी हंसती है मुकेश इलाहाबादी ------------

अपने चेहरे पे हम शिकन नहीं रखते

 अपने चेहरे पे हम शिकन नहीं रखते  दर्द कितना है कभी ज़िक्र नहीं करते  मौका ढूंढ के लौटा दिया करते है हम   जेब में किसी का एहसान नहीं रखते  मिट जाए भले हस्ती हमारी मंज़ूर है धौंस किसी की किसी हाल नहीं सहते  घाटा तो बहोत है मगर कोइ ग़म नहीं  ईश्क़ के सिवा कोइ व्यापार नहीं करते  हमको भी मालूम है दौरे दस्तूर मगर  फायदे के लिए सच को झूठ नहीं कहते  मुकेश इलाहाबादी -------------------

मित्रता,

  हो सकता है कुछ लोगों के लिए मित्रता, तफरीहन एक माऊस क्लिक से शुरू हो के मैसेंजर से होते हुए कुछ फ़ोन कॉल्स / वीडियो कॉल्स या बहुत से बहुत एक दो मुलाकात के बाद फकत एक माउस क्लिक पे ख़त्म हो जाने का सफर भर हो पर - मेरे लिए मित्रता करना एक खूबसूरत कविता का सृजन करना है जिसमे एक एक शब्दों का चुनाव सजींदगी से करना होता है बेहद खूबसूरत और खुशबू से लबरेज भावों को पिरोना होता है और ,,,, हो भी क्यूँ न क्यूँ की कविता दो चार दिन की नहीं सदियों - सदियों का दस्तावेज होती हैं मेरे लिए मित्रता एक वचन एक विश्वास होता और पूजा होती है लिहाजा, मित्रता - एक माउस क्लिक पे शुरू और एक माउस क्लीक पे खत्म होने वाली चीज़ तो कतई नहीं है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

हँसी

 वो  उधर से  हँसी उछाल देती है  मै, इधर से एक बित्ता  मुस्कान, लुढ़का देता हूँ  फिर मै उसकी हँसी के  छोटे - छोटे गोले बना उछाल देता हूँ  जो सांझ की नीले - नीले आकाश में  रात होते ही सितारे सा चमकने हैं  मेरे आँगन में  और वो मेरी मुस्कराहट को  खोंस लेती है अपने बालों में  हेयर बैंड की तरह  और रात  उसी मुस्कराहट के कुछ हिस्सों की  तकिया बना खो जाती है  मीठे सपनो में  और मै देखता हूँ  उसकी उजली - उजली हँसी के  सितारों से भरे आकाश को  मुकेश इलाहाबादी -------------

उसकी मुहब्बत

 उसकी  तरह उसकी मुहब्बत भी  अल्हड़ और मासूम है  पर इतना तय है  उसकी खुशियों और नाराजगी की  वज़हें अक्सर बहुत छोटी- छोटी होती है  जैसे,,, हो सकता है, वो आप के एक छोटे से  कॉम्पलिमेंट से खुश हो के आप के गले लग जाए  या हो सकता है  एक ठोंगा भेलपूरी  और दो पत्ते गोलगप्पे से खुश हो जाए  या फिर हो सकता है  आप किसी जरूरी काम में मशगूल हों  और उसे अपनी कोइ गैर ज़रूरी बात बतानी हो  (जो अक्सर गैर ज़रूरी ही होती है ) और वो आप की नाक या कान पकड़ के  अपनी और मुँह कर सूना ही देती हो  और आप को बहुत अच्छा कह के   बात के अनुसार खुश या दुखी होना होता है  वरना वो नाराज़ हो के  आप के सीने पे मुक्की मारती हुई  रोने भी लग सकती है  (फिर आप को बहुत देर तक  समझाना और मनाना पड़ सकता है ) या हो सकता है  आप उससे मिलने जाओ और वो  सिर्फ इस बात पे मुँह फुला ले  कि आप उसके दिए हुए गिफ्ट वाला  डीओ लगा के नहीं आये हो  या  पसंद की शर्ट नहीं पहन रखी हो  या फिर आप ने उसकी नई ड्र...

तेरे साथ से बेहतर कोई साथ नहीं

 तेरे साथ से बेहतर कोई साथ नहीं  तुझसे खूबसूरत कोई ख्वाब नहीं  चुपके - चुपके तेरी आँखे पढता हूँ  तुझसे बढ़ -कर कोई किताब नहीं  कितनी रातें जागे जागे बीती मेरी  इसका मेरे पास कोई हिसाब नहीं  इक बार जी भर आ बातें कर ले तू  फिर  उम्र भर न मिल एतराज नहीं  मुक्कू सच कहूँ तू मेरे लिए क्या है इसका तुझे जरा भी एहसास नहीं  मुकेश इलाहाबादी -------------------  

इक तुम ही हो जिससे कह सुन लेते हैं

 इक तुम ही हो जिससे कह सुन लेते हैं  वैसे तो अक्सरहां  हम  चुप ही रहते हैं  तुम्हारी हरबात अफसाना आँखे नज़्म  जिसे हम चुपके - चुपके पढ़ते रहते हैं  दिन में यादों के पंछी सोये से रहते हैं  साँझ होते ही फलक पे उड़ने लगते हैं  ये मासूम हँसी दूध सा चेहरा तभी तो  तुझको लोग परियों की रानी कहते हैं  या तो मुझको सफर में तेरा साथ मिले  या फिर सफर में तन्हा ही खुश रहते हैं  मुकेश इलाहाबादी ---------------------

रिक्त स्थान

  मेरे  आस - पास ये जो "रिक्त स्थान" है  ये रिक्त नहीं  इस रिक्त स्थान में  व्याप्त है  तुम्हारे नाम की वायु  जो महकती हुई  मेरे नथुनो से आ के मुझमे  भरती रहती है "प्राण वायु" इसी रिक्त स्थान से  आती है तुम्हारी यादों की  सुनहरी किरणे जो  जगमग जगमग करती हैं  मेरे अंदर के अँधेरे को भगा के  इसी  रिक्त स्थान में खिलता है  तुम्हारे ईश्क का गुलाब  जो मुझे मुस्कुराने के लिए काफ़ी है   लिहाज़ा,,,,,, तुम,  मेरे लिए "रिक्त स्थान" भर नहीं हो  जिसे भर के  "मै" पूर्ण होना चाहूँ  "तुम " मेरे लिए "पूर्ण " ही हो  जिसके बगैर मै  "शून्य " हूँ  मुकेश इलाहाबादी -------------  

जिस तरफ मुँह था उस तरफ पीठ कर ली है

 जिस तरफ मुँह था उस तरफ पीठ कर ली है  अपने चलने के रास्ते की दिशा बदल दी है  जैसे ही मुझे लगा मै तो नक्कार खाने में हूँ  अपने कान बंद कर लिए ज़ुबान सिल ली है  तुमने अल्फ़ा ओमेगा तक पढ़ लिया होगा  हमने ज़िंदगी भर ईश्क़ की किताब पढ़ी है  कभी चाँद मेरे साथ ठिठोली किया करता  आज कल घर में मै और हूँ मेरी तन्हाई है  वो भी गुमशुम गुमशुम रहता है और मै भी  वजह ज़रा सी बात पे हम दोनों की कट्टी है  मुकेश इलाहाबादी --------------------------

किसी दिन उड़ते उड़ते फलक तक जाऊँगा

 किसी दिन उड़ते उड़ते फलक तक जाऊँगा  वहां तुम्हारे नाम का सितारा जड़  आऊँगा  तुम ये जो रोज़ मुझे चिढ़ा के छुप जाती हो  किसीरोज़ मै भी चुटिया खींच भाग जाऊँगा  मेरी आँखों में सिर्फ तेरे नाम का आइना है  किसी रोज़ तुमको तेरी सूरत दिखलाऊँगा  तुम्हारी आंखों में ये जो उदासी का सहरा है  बादल सा बरसूँगा इसे हरा भरा कर जाऊँगा  मुकेश इलाहाबादी --------------------------

किसी की याद में डूबी आँखे

किसी की याद में डूबी आँखे  हैं आँसुओं से डबडबाई आँखे  वादा किया था लौट आएगा ये उसी की राह तकती आँखे  रात भर सोया नहीं है दर्द से  देख तो उसकी उनींदी आँखें  यूँ ही नहीं हो गयी हैं ये सुर्ख  किसी के हिज़्र में हैं रोई आँखे  आ प्यार की लोरी सुना दूँ तो  शायद सो जाएँ ये थकी आँखें  मुकेश इलाहाबादी ---------------

जब से हमारे रस्ते जुदा हो गए

 जब से हमारे रस्ते जुदा हो गए  वो खुश और हम तनहा हो गए अपने ही हाथो से तराशा जिन्हे  वे ही पत्थर मेरे ही ख़ुदा हो गए  जिनके लिए झील थे दरिया थे  मुफलिसी में हम सहारा हो गए  फकत इक झलक देखी खुदा की  उसी पल से तो हम बावरा हो गए  तू हाले दिल मेरा न पूछ मुकेश  हम क्या थे और ये क्या हो गए  मुकेश इलाहाबादी ---------------  

जैसे तितली पँख सिकोड़ के बैठी है

  जैसे तितली पँख सिकोड़ के बैठी है तेरे होंठो पे हँसी ऐसे छुप के बैठी है मेरे काँधे पे जब तो ठुड्डी रखती है जैसे चिड़िया उड़ के मुंडेर पे बैठी है तू धानी चुनर ओढ़ जब गले मिले ज्यूँ ज़मी फलक की गोद में बैठी है मुकेश इलाहाबादी -----------------

आँख अंधी और कान बहरे हो चुके हैं

  आँख अंधी और कान बहरे हो चुके हैं और ज़ुबान तालू से चिपक चुकी है (बोलने - देखने- सुनने वालों के ) अपनी आँखें कान और ज़ुबान गिरवी रख दी है (कुछ चालाक लोगों ने ) अपनी अपनी आँख - कान और जुबान बचाये रखने के लिए खुद को अँधेरे में छुपा रखा है (कुछ डरे हुए लोगों ने ) मुकेश बाबू ! क्या बताओगे, तुम इन तीनो में से किस कैटेगिरी में हो ???? मुकेश इलाहाबादी -----------------------

कुछ अधूरी ख्वाहिशें ले कर

 कुछ अधूरी ख्वाहिशें ले कर  जी रहा हूँ तेरी चाहतें ले कर  थका हूँ फिर भी चल रहा हूँ  फटे जूते  फटी जुराबें ले कर  तुझसे कहने सुनने आया हूँ  ज़िंदगी की शिकायतें ले कर  सोचता हूँ मै भी मंदिर जाऊँ  कुछ चाहतें व मुरादें ले कर  छुप - छुपा के  कहाँ जा रहे हो  ये दर्दों ग़म की कताबें ले कर  मुकेश इलाहाबादी --------------