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Showing posts from June, 2018

हालाकि यंहा के लोग गूँगे नहीं हैं बहरे नहीं हैं

हालाकि यंहा के लोग गूँगे नहीं हैं बहरे नहीं हैं हालात ऐसे हैं कि बोलते नहीं हैं सुनते नहीं हैं नेट पे ही सारे रिश्ते नाते निभाने लगे हैं लोग  होली-दिवाली भी मिलते नहीं हैं जुलते नहीं हैं  रिवायत की तरह हर हाल में निभाए जाता हूँ अपने शिकवे शिकायत किसी से कहते नहीं हैं मैंने बोल के कहा लिख के कहा इशारे से कहा मुकेश तुम्हारे लब किसी तरह खुलते नहीं हैं मुकेश इलाहाबादी -------------------------

तुम रहो मै रहूँ और कोई न हो

तुम  रहो मै रहूँ और कोई न हो दरम्यान  हमारे  हवा भी न हो हंसती  रहो  खिलखिलाती  रहो चेहरे पे तनिक भी मायूसी न हो तुम रहो तो सब कुछ रहे अगर तुम  न  हो तो ये ज़िंदगी न हो चाहत तो है सारा जहाँ वार दूँ पास तेरे कोई भी कमी न हो  फ़क़त नेकियाँ  ही नेकियाँ हो राह में तेरी एक भी बदी न हो मुकेश इलाहाबादी ------

बाग़ की हवाएं चुगली कर रही है

बाग़ की हवाएं चुगली कर रही है कली भौरें से कुछ तो कह रही है आओ चलें दूर तक बहें चलें हम  रात  इश्क़ की नदी सा बह रही है आ तेरी बिखरी लटों को संवार दूँ खुली हुई ज़ुल्फ़ें तंग कर रही है मेरे सीने पे सर रख के सुनो तो क़ी मेरी धधकन क्या कह रही है  खाक होने के पहले आ के मिल मेरे अंदर इक आग जल रही है मुकेश इलाहाबादी -----------------

जाने कौन सी मज़बूरी होती जा रही हो

जाने  कौन सी  मज़बूरी होती जा रही हो आहिस्ता आहिस्ता मेरी होती जा रही हो वैसे तो तुम पहले से ही खूबसूरत हो पर ईश्क़ में आसमानी परी होती जा रही हो तुम्हारे इस तरह महकने का राज़ क्या है तुम रजनीगंधा रातरानी होती जा रही हो मुकेश इलाहाबादी ----------------------

शहर की गली गली छानी है

शहर की गली गली छानी है बहुत  दिनों आवारगी की है मेरे पास और  कुछ तो नहीं फ़क़त तज़ुर्बे मेरी कमाई है मेरी चाल में ये लड़खड़ाहट तुम्हारे ईश्क़ की ख़ुमारी है चले आओ यंहा कोई नहीं है सिर्फ मै हूँ,  मेरी तन्हाई है बीते हुए कल की बात न कर अब से ये ज़िंदगी तुम्हारी है न कोई चाँद न कोई चराग़ ज़िदंगी अँधेरे में बिताई है मुकेश इलाहाबादी ----------

प्रेम को, महसूस करना चाहता हूँ,

मै , प्रेम को, महसूस करना चाहता हूँ, बिना प्रेमी को छुए हुए , बिलकुल वैसे ही जैसे, कोई सौंदर्य प्रेमी गुलाब को महसूसता है उसकी सम्पूर्ण कोमलता और ख़ूबसूरती के साथ बिना उसे डाल से तोड़े हुए मै प्रेम को अपने समस्त रंगो के साथ महसूसना और जीना चाहता हूँ जैसे कोई, बच्चा तितली को उसके सतरंगी पंखो से साथ उड़ते हुए देखा और उसके संग संग दौड़े   बिना तितली को पकडे बिना तितली के पंख मरोड़े हुए मै -  प्रेम को जीना चाहता हूँ  बिना प्रेमी को हार्ट किये हुए मुकेश इलाहाबादी ------------------

कुंडली मिलान

भारतीय समाज  में विवाह के पहले कुंडली मिलान की परम्परा बहुत पुरानी  है , कई परिवारों में तो बिना कुंडली मिलान के विवाह ही सम्पन्न नहीं होता।   लिहाज़ा इस के चलते कई बार अच्छे अच्छे जोड़े बिछड़ने को मज़बूर हो जाते हैं , और गलत जोड़े भी बन जाते हैं फिर ज़िंदगी भर  कलहपूर्ण और दुःखद दाम्पत्य जीवन जीने को  वे मज़बूर हो जाते हैं।  इसी सब को देखते हुए ये वीडियो बनाने का निर्णय लिया है ताकि हमारे दर्शक और मित्र ' कुण्डली मिलान " पद्धति को वैज्ञानिक और आधुनिक परिपेक्ष में समझ देख के उचित निर्णय ले सकें और दो जीवन को बर्बाद होने से बचा सकें और खुद भी शंका कुशंका के भंवर से बाहर निकल सकें। अगर देखा जाए तो वास्तव में भारतीय ज्योतिष पद्धति से कुंडली मिलान एक वैज्ञानिक और सम्पूर्ण पद्धति है , अगर भावी वर वधु की कुंडली सही बनी है , और विचार करने वाला दैवज्ञ वास्तव में ज्ञानी है और सही तरह से मिलान करता है तो भावी दम्पति के लिए सही निर्णय दे कर उन्हें उचित रास्ता दिखा सकते हैं। खैर अब हम अपने विषय पे आते हैं , कुंडली मिलान पद्धति में चंद्र कुण्डली के अनुसार आठ विषयों...

देखना जिस दिन मै चला जाऊंगा

देखना जिस दिन मै चला जाऊंगा लौट  कर फिर कभी नहीं आऊँगा ढूंढ लेना मुझको तुम गुलशन में  कि गुलों में खुश्बू बन के महकूँगा किसी कवि या शायर सा नहीं, हाँ  तेरी मुंडेर पे पंछी बन के चहकूँगा या फिर कोई लतीफ़ा बन कर के तेरे गुलाबी होंठो पे, मुस्कुराऊंगा  तू, कितना भी रूठ जाए मुझसे देखना इक दिन तुझे मना लूँगा मुकेश इलाहाबादी ---------------

सच तुम्हे - मिस करता हूँ

बहुत मिस करता हूँ तुम्हारी देहगंध को जब भी हरसिंगार झरता है मेरे सहन में रातों को उठ - उठ के टहलने लगता हूँ बालकोनी में - आधी रातों को और याद आती है तुम्हारी खिल्ल - खिल्ल करती अनगढ़ मोहक हँसी तब मै तुम्हारे न होने को - बहुत मिस करता हूँ बहुत मिस करता हूँ कैफ़े डे - के कोने वाली सीट पे अकेले बैठ के कॉफी पीते हुए तुम्हे यंहा तक कि - बहुत मिस करता हूँ जब तुम्हारे मेसेज या फ़ोन कॉल्स नहीं आते या फिर ऍफ़ बी पे उपडटेस सच तुम्हे - मिस करता हूँ बहुत बहुत बार मुकेश इलाहाबादी ----------------

आँखों के इस खारे समंदर को क्या कहूँ

आँखों के इस खारे समंदर को क्या कहूँ तू ही बता बिगड़े मुक़ददर को क्या कहूँ इधर सिलता हूँ तो, उधर दरक जाती है मुफलिसी की इस चददर को क्या कहूँ गर दीवारों की नमी को सीलन कहते हो तो कमरे के उधड़े पलस्तर को क्या कहूँ  मुझे तो फूलों ने भी चोट दी है अक्सर तेरी बेरुखी के इस पत्थर को क्या कहूँ अगर तेरी ये शोख़ अदाएँ खंज़र हैं तो तेरी मीठी बातों के नश्तर को क्या कहूँ मुकेश इलाहाबादी -----------------------

अपने सारे ग़मो को छुपा के मिलो

अपने सारे ग़मो को छुपा के मिलो जिससे भी मिलो मुस्कुरा के मिलो जो कोई बुज़ुर्ग मिल जाये राह में सर अपना हमेसा झुका के मिलो क़द तुम्हारा कितना ही बड़ा न हो अपनों से कभी न इतरा के मिलो जो चाहत है लोग याद रखें तुम्हे हर इंसा को अपना बना के मिलो इक हँसी, तुमको बना देगी गुलाब जब भी मिलो खिलखिला के मिलो मुकेश इलाहाबादी ----------------

काश तुमने मुस्कुरा दिया होता

काश तुमने मुस्कुरा दिया होता बदली में चाँद खिल गया होता अगर परिंदो की तरह पँख होते  मै उड़कर तुम तक पंहुचा होता तूने दरीचा खोला ही नहीं, वर्ना मै तेरी गली में रुक गया होता   मेरे पास जज़्बात हैं लफ़ज़ नहीं वर्ना मैंने,तुझे ख़त लिखा होता मुकेश इलाहाबादी -----------------

तुम ! शब् भर चाँद सा चकमती रहीं

तुम ! शब् भर चाँद सा चकमती रहीं मै ! दिन भर सूरज सा दहकता रहा हमारे तुम्हारे बीच कोई शाम नहीं थी मुकेश इलाहाबादी --------------

सुबह से जो छत पे मुस्कुरा रही थी धूप

सुबह से जो छत पे मुस्कुरा रही थी धूप साँझ होते ही उदास हो उतर गयी धूप जब तक पिता थे सर पे घना साया था बाद उसके ज़िंदगी गर्म दोपहर की धूप सर्द मौसम में देती हैं अजब सी गर्मी इसी लिए सेंकता हूँ तेरी यादों की धूप मुकेश इलाहाबादी ----------------------

लोहा

गुफ़ा , से निकले आदमी ने, ज़िंदगी से बहतु लोहा लिया फिर, इसी लोहे से उसने बनाई छेनी ,हौथौडी , हल की मूठ पहिया, पहिये की धूरी और रथ - जिसपे सवार हो के वो निकल पड़ा न ख़त्म होने वाले विकास के राजसूय यज्ञ पे जिसकी समिधा की लड़की के लिए उसे काटने पड़े पेड़ लिहाजा उसने उसी लोहे से बनाई कुल्हाड़ी और बड़ी - बड़ी आरा मशीने, राजसूय यज्ञ की सफलता के लिए उस गुफा के इंसान को अपने ही लोगों से लेना पड़ा लोहा लिहाज़ा उसने एक बार फिर अपने लोहे से बनाई तीर तलवार, तोप और मिसाइलें अपने ही अंदर के लोहे को गला के उसने न केवल राजसूय यज्ञ जारी रखा बल्कि उसने बनाए बड़े बड़े पुल कल - कारखाने लोहे से ढली बड़ी बड़ी इमारतें अब तो उसी की बनाई मशीनों में ढल रही है सभ्यता , संस्कृति और धर्म मुझे तो ऐसा लगता है, कंही ऐसा न हो एक दिन यही लोहा लेता इंसान अपनी ही बनाई मशीनों में ढल कर किसी बन्दूक की गोली का छर्रा या तोप का गोला बन कर न निकले लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी , कहे देता हूँ मुकेश बाबू ! मुकेश इलाहाबादी -------------------------------

तुम नदी सा बहती रहोगी

तुम नदी सा बहती रहोगी नीचे - नीचे मै पुल सा तना रहूंगा तुम्हारे ऊपर न तुम - इतना लबालब हो पाओगी कि , तुम्हारे लब छू लें मुझे न मेरे अंदर का लोहा टूट कर मिलने देगा तुमसे मुकेश इलाहाबादी -----------

सज संवर के इस कदर मुस्कुराना ,

सज संवर के इस कदर मुस्कुराना , मुझे अच्छा लगा तुम्हारा इतराना बहतु क्यूट लगी तुम मुझको, वो बनावटी गुस्से में आँखे दिखाना बिन प्यास के भी माँगा था पानी वो नामक मिला के पानी पिलाना याद आये है बार बार, चाय रख के मुँह चिढ़ा के वो तेरा भाग जाना मुकेश इलाहाबादी -------------

हम कंहा इतनी आसानी से मरने वाले थे सनम

हम कंहा इतनी आसानी से मरने वाले थे सनम वो तो तेरी मासूम अदाएँ थी जो मर गए सनम अपना जिस्म अपने पँख जला डाले हैं धूप में तब कंही तेरे लिए चाँद सितारे ला पाए सनम  अमूमन हम अपना दर्द अपना ग़म बताते नहीं तुम अपने से लगे इसलिए तुमसे रो लिए सनम न जाने कौन सा जादू था जो समंदर छोड़ के तेरी झील सी आँखों में हम तैरने लगे सनम मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

कई बार जी चाहता है तुम्हारे साथ बैठूँ ,

कई बार जी चाहता है तुम्हारे साथ बैठूँ , बात करूँ देर तक अपनी - तुम्हारी, दुनिया जहान की फिर, याद आती हैं, बहुत सारी बातें और फिर, मुल्तवी कर देता हूँ तुम्हारे साथ बैठ के बतियाने का इरादा मुकेश इलाहाबादी -------

था हमसे किसी बात पे ख़फ़ा बहुत

था हमसे किसी बात पे ख़फ़ा बहुत जब मिला तो, लिपट के रोया बहुत अपने किस्से सुनाए, कामियाबी के फिर मेरी हालत पे उदास हुआ बहुत एक एक कर याद आये पुराने मित्र बिछड़े दोस्तों को मिस किया बहुत वही हँसी, वही दिल्लगी वही अंदाज़ मुलकात का लुत्फ़ हमने लिया बहुत ज़माना गुज़र गया मगर भूला नहीं आज भी उसका नाम ले रोया बहुत मुकेश इलाहाबादी ------------------