तुम ! शब् भर चाँद सा चकमती रहीं

तुम ! शब् भर चाँद सा चकमती रहीं
मै ! दिन भर सूरज सा दहकता रहा

हमारे तुम्हारे बीच कोई शाम नहीं थी

मुकेश इलाहाबादी --------------

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एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है