Posts

Showing posts from December, 2014

देखने की चाहत रख के भी निगाहें नीचे रखता हूँ

देखने की चाहत रख के भी निगाहें नीचे रखता हूँ उनकी मुस्कराहट कहीं मेरी जान ही न ले ले मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

जैसेकी सावन आया लगता है

जैसेकी सावन आया लगता है तुमसे मिल के ऐसा लगता है दिन होली और रात दिवाली हरदिन त्यौहार सा लगता है जाडेकी धूप मे हमतुम बैठे हैं देखो कितना अच्छा लगता है तेरेे बालों मे तिनका अटका है तेरा आशिक आवारा लगता है जब जब तुम साथ में रहती हो लम्हा लम्हा खुशनुमा लगता है मुकेश इलाहाबादी .............. ..

भले ही जुबॉ अपनी खामोश रखती है

भले ही जुबॉ अपनी खामोश रखती है मगर निगाहें उसकी सब कुछ बोलती हैं सच तो ये है उसे भी हमसे मुहब्बत है ये अलग बात आदतन मगरुर रहती है मुकेश इलाहाबादी ---------------------

आसमान से उतर के फरिस्ते देखते हैं

आसमान से उतर के फरिस्ते देखते हैं बादल भी तुझको थम थम के देखते हैं उफ! खु़दा की ऐसी जल्वानिगारी है तू देखने वाले तुझे जी भर भर के देखते हैं तेरे बैगनी बोगन बेलिया से आंचल में हम बिखरे बिखरे चॉद सितारे देखते हैं सजसंवर के जब भी तू निकले है घर से तुझे क्या मालूम हम छुप छुप के देखते हैं मुसाफिर ही नही कारवां तक रुक जाते हैं सडकों पे रहागीर तुझे मुड मुड के देखते हैं हक़ीकत में तो ये मुमकिन नही लिहाजा रोज शबभर ख्वाबों में हम तुझे देखते हैं मुकेश इलाहाबादी -----------------------

शबनमी अश्क ले कर रात रोती रही

शबनमी अश्क ले कर रात रोती रही साथ मेरे घरकी दरो दीवार रोती रही शानो शौकत,ऐषो आराम सब कुछ था जिंदगी किसी की याद लेकर रोती रही हवाओं मे नमी इस बात की गवाह है चांदनी शब भर सिसक कर रोती रही ये दहषत गर्द चैन ओ अमन ले गये खौफजदा बस्ती शामो सहर रोती रही तुम्हारे सामने चुप चुप रहा करती थी बाद मे तुम्हारा नाम लेकर रोती रही मुकेश इलाहाबादी ....................

तुम्हारी मज़बूरियां समझता हूँ

तुम्हारी मज़बूरियां समझता हूँ इसीलिये तो मै भी चुप रहता हूँ तेरे चेहरे पे इक तबस्सुम देखूं सिर्फ इसीलिये गज़लें कहता हूँ मेरे बाहर भीतर इक जंगल है   मै भावों के जंगल में रहता हूँ तनहाई,रुसवाई तेज़ाबी बारिस   देखो आंधी तूफाँ में मै रहता हूँ ज़मी औ खुला आसमाँ मेरा घर देखो मै भी क्या क्या सहता हूँ   मुकेश इलाहाबादी -------------

कहीं जाऊं तो रास्ता कोई रोके तो

Image
कहीं जाऊं तो रास्ता कोई रोके तो घर से निकलूं और कोई टोंके तो चुपचाप बैठै रहने का मन हो मेरा कोई मुझको छेड - छेड के बोले तो जब मै हंसू तो मेरे संग-संग हंसे    मै  रोऊँ तो मेरे साथ कोई रोये तो पाकर फूलों की सेज भी खुश रहे वर्ना साथ मेरे जमीन पर सोये तो गर पल भर  को भी बिछड जाऊं   मेरे बारे मे ही हर लमहा सोंचे तो मुकेश सफरे हयात हो तो ऐसा हो एक रोये तो दूसरा ऑसूं पोंछे तो मुकेश इलाहाबादी ................

मिल के उनसे हाल ऐ दिल कुछ था इस क़दर

मुकेश मिल के उनसे हाल ऐ दिल कुछ था इस क़दर न उनसे कुछ कहते बना न उनसे कुछ सुनाते बना मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------ ---

दोपहर से ढला लगता है

दोपहर से ढला लगता है सूरज भी थका लगता है जाने क्यों आज की रात चाँद ग़मज़दा लगता है इस ख़ौफ़ज़दा आलम में हर कोई सहमा लगता है इक तुम्हारी महफ़िल में हमको अच्छा लगता है दोस्तों में सिर्फ मुकेश सबसे प्यारा लगता है मुकेश इलाहाबादी ---

परछियाँ उदास हैं मैदान में

परछियाँ उदास हैं मैदान में धूप सो रही है सायबान में   दोपहर अपनी मस्ती में है साँझ ऊंघ रही है दालान में   दिल का चैनो शुकूं ढूंढता हूँ तेरी यादों के बियाबान में   शहर की आपाधापी से दूर आ बैठा हूँ इस सूनसान में   मुकेश आज के युग में तुम सच्चाई ढूंढते हो इंसान में मुकेश इलाहाबादी --------

चॉद आवारा धूप बेईमान निकली

Image
चॉद आवारा धूप बेईमान निकली दिन तनहा रात सूनसान निकली हमतो समझे ईश्क मे मौज होगी मुहब्बत कठिन इम्तहान निकली करता रहा हर किसी पे भरोसा, सारी दुनिया ही बेईमान निकली पूरे शहर में बाजार ही बाजार थे मंदिर औ मस्जिद दुकान निकली तुम्हारी हंसी औ ये मासूम अदाएं मेरे लिये मौत का सामान निकली मुकेश इलाहाबादी------------------

आंसुओं के संग निकल गया

Image
आंसुओं के संग निकल गया जमा हुआ दर्द निकल गया तुमको सब कुछ बता दिया दिल का गुबार निकल गया वो तन्हा घर में क्या करता घर से बेवजह निकल गया सूनी सड़क औ लम्बा रस्ता फिर भी पैदल निकल गया वापस लौट के नही आयेगा मुकेश बहुत दूर निकल गया मुकेश इलाहाबादी .........

दोस्त तुम्हारी यादें,

Image
दोस्त तुम्हारी यादें, अंधरी रात में जुगनू की रोशनी जाड़े में सुबह की नर्म धूप तितलियों के नाज़ुक पंख फूलों की महक चिड़ियों की चहक सन्नाटे दिल की सरसराहट, और प्रेम में पगे दिल की धड़कन मुकेश इलाहाबादी -------------------

पलकों को चूम कर गया

पलकों को चूम कर गया ऑखों मे सपने रख गया चॉद सितारे उसकी मंजिल लौट कर आयेगा कह गया डाल से टूटा हुआ पत्ता था हवा के संग-संग उड गया मेरा वजूद छोटा सा तिनका दरिया के बहाव में बह गया मुकेश फितरतन शायर था तमाम ग़ज़लें वह कह गया मुकेश इलाहाबादी ...................... ....

ज़ख्मो की हमसे नुमाइश न की गयी

Image
ज़ख्मो की हमसे नुमाइश न की गयी दर्द ऐ दवा की फरमाइश न की गयी चाहता तो बाजी जीत भी सकता था मुहब्बत मे जोर आजमाइश न की गयी लोग बेवफाई करके चले जाते हैं मगर हमसे कभी किसी की बुराई न कीगयी अदालत ने फैसला इक तरफा दे दिया हमारी बेगुनाही की सुनवाई न की गयी गुलशन में रहा आया हूं अबतक मुकेश वीराने में हमसे तो रहाइश न की गयी मुकेश इलाहाबादी ...............

तेरी आखों में काजल है

Image
तेरी आखों में काजल है मै समझूँ की बादल है तेरा लाल दुपट्टा ले उड़ी हवा कितनी पागल है इन गोरे - गोरे पांवो में रुनझुन करती पायल है तेरी मस्त अदाओं का पूरा शहर ही क़ायल है नज़रें तुझसे क्या मिली दिल मेरा भी घायल है मुकेश इलाहाबादी ---

यादों के जंगल में फिरती है

Image
यादों के जंगल में फिरती है तन्हाइयों मे सिर पटकती है उसकी यादों में मेरे घर की दीवारें आज भी सिसकती हैं बिछडे हुए अरसा हुआ,मगर निगाहें उसी को खोजती हैं उसे चाह के भी कैसे भूलूं ? धडकने उसका नाम लेती हैं एक बार वह गलेे लगी थी रुह मेरी अब भी महकती है मुकेश इलाहाबादी.............

ये कैसी खामोशी है

ये कैसी खामोशी है अजब से बेचैनी है सुबह के मुखड़े पे ओस की नमी है देखो सूरज में भी खूं ज़दा रोशनी है इन पीले चेहरों पे छाई मुर्दनगी है  बाज़ार जाना है पै जेब में अठन्नी है मुकेश इलाहाबादी --

आइना भी अपनी किस्मत पे इतराया होगा

आइना भी अपनी किस्मत पे इतराया होगा जब - जब भी तू सज संवर के निकली होगी तुझे देख के हरइक ने माशाअल्ला कहा होगा आस्मा से उतरी उजली उजली परी लगती हो तुझको तो फरिश्तों ने भी सज़दा किया होगा महताब अपनी खूबसूरती पे मगरूर हुआ होगा तब ख़ुदा ने उसके मुक़ाबिल तुझे बनाया होगा मुकेश, कुछ अलग ही तबियत का इंसान था ज़रूर तुझसे मिल के ही वह शायर बना होगा मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

दिल को शुकूं मिलता है हक़ीक़त

Image
दिल को शुकूं मिलता है हक़ीक़त से ख़्वाबों से कंहा तबियत बहलती है मुकेश इलाहाबादी --------------------

जब भी अपना माजी देखता हूं

Image
जब भी अपना माजी देखता हूं अपने ही सूखे ज़ख्म कुरेदता हूं तुम सर्द मौसम की नर्म धूप हो तुम्हारी यादों की धूप सेंकता हूं इन सूखे हुये दरख्तों मे अक्सर अपना मुरझाया अक्श देखता हूं चांद सितारे मेरा दर्द समझते हैं मै इन्हे हर रोज ख़त भेजता हूं इन तन्हा रातों मे जब सोता हूं  खाबों के हीरे मोती समेटता हूं मुकेश इलाहाबादी ...................

तुमने कभी समंदर देखा है ?

सुमी, तुमने कभी समंदर देखा है ? नही देखा है तो देखना, और ग़ौर से देखना। ये जो कभी हरा तो कभी नीला गहरा नीला सा समंदर है न, दरअसल से जमीं का आंचल है, लहराता सा हरहराता सा, लुभाता सा। जिसे ज़मी अपने दोनो हांथो से फैलाकर अपनी धूरी पे नाच रही है, लहराती, बलखाती, तब से जब, मै न था तुम न थी ये गांव न था, ये शहर न था, कोई सभ्यता न थी । था तो सिर्फ ये अपनी धुरी पे नाचती ये ज़मी थी, चॉद तारे थे ये मीलो फैला आसमॉ था। और .... उसी आसमॉ में था, लाल सुर्ख जवां और अपनी मस्ती में झूमता सूरज। और इधर सतरगी यूवा शोख चंचल धरती। यानी जमीं। उधर सूरज आसमॉ पे नाचता गाता गुनगुनाता, इधर धरती अपनी धुन मे। और ... एक दिन जब जमी की निगाह इस जवां सूरज पे पडी तो वह इसकी मुहब्बत मे हो गयी। और, तब से वह रोज रोज अपना आंचल फैला के सूरज का इंतजार करने लगी। मगर सूरज है कि न जाने किसकी मुहब्ब्त मे पागल हो के रोज अक्खा दिन सुबह होते ही निकल पडता है, चल पडता है। जलता हुआ, सुलगता हुआ, धधकता हुआ। और फिर ....... सारा दिन जलने के बाद भी धधकने के बाद भी चलने के बाद भी जब उसे अपनी मुहब्ब्त नही मिलती तो सांझ होते ही जमी मे समंदर रुपी ...

स्कूल या कॉलेज में पढाया नही जाता

Image
स्कूल या कॉलेज में पढाया नही जाता ईश्क हो जाता है सिखाया नही जाता पहला प्यार पत्थर की लकीर समझो लिख जाती है तो मिटाया नही जाता जो तुम्हारे दुख को समझे उसे बताओ हरकिसी को तो ग़म बताया नही जाता धूपमे कहते हो तुम्हारा बदन जलता है और सर्दियों का मौसम सहा नही जाता मुकेश जिससे होती है उसी से होती है हर किसी से मुहब्बत किया नही जाता मुकेश इलाहाबादी ----------------

खून भी अब पानी हो गया

खून भी अब पानी हो गया हर रिश्ता बेमानी हो गया ये प्यार मुहब्बत झूठी बाते ईश्क भी जिस्मानी हो गया दो दिन बादल क्या बरसे, ज़मी का रंग धानी हो गया तूने अपनी चुनरी लहरायी फ़लक आसमानी हो गया महफिल मे तेरे आने से ही माहौल शादमानी हो गया कल तक था जो अजनबी आज जिन्दगानी हो गया मुकेश इलाहाबादी ---------------

हुए हैं खाक हम भी इश्क़ में परवाना बन कर

Image
हुए हैं खाक हम भी इश्क़ में परवाना बन कर ग़र जली हो तुम रात भर शमा बन कर !!!!! मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

मै जब भी तेरे घर आउंगा

Image
मै जब भी तेरे घर  आउंगा तमाम तोहफे लेकर आउंगा अभी हाले मुफलिसी  है  पर देखना खूब कमाकर आउंगा कंगन पायल झुमकी के संग सतरंगी चूनर लेकर आउंगा ग़र तुम जमाने से डरती हो रात चाँदनी बनकर आउंगा तुम अपनी पलकें बंद रखना हंसी ख़्वाब बन उतर आउंगा मुकेश इलाहाबादी .............