सुमी, तुमने कभी समंदर देखा है ? नही देखा है तो देखना, और ग़ौर से देखना। ये जो कभी हरा तो कभी नीला गहरा नीला सा समंदर है न, दरअसल से जमीं का आंचल है, लहराता सा हरहराता सा, लुभाता सा। जिसे ज़मी अपने दोनो हांथो से फैलाकर अपनी धूरी पे नाच रही है, लहराती, बलखाती, तब से जब, मै न था तुम न थी ये गांव न था, ये शहर न था, कोई सभ्यता न थी । था तो सिर्फ ये अपनी धुरी पे नाचती ये ज़मी थी, चॉद तारे थे ये मीलो फैला आसमॉ था। और .... उसी आसमॉ में था, लाल सुर्ख जवां और अपनी मस्ती में झूमता सूरज। और इधर सतरगी यूवा शोख चंचल धरती। यानी जमीं। उधर सूरज आसमॉ पे नाचता गाता गुनगुनाता, इधर धरती अपनी धुन मे। और ... एक दिन जब जमी की निगाह इस जवां सूरज पे पडी तो वह इसकी मुहब्बत मे हो गयी। और, तब से वह रोज रोज अपना आंचल फैला के सूरज का इंतजार करने लगी। मगर सूरज है कि न जाने किसकी मुहब्ब्त मे पागल हो के रोज अक्खा दिन सुबह होते ही निकल पडता है, चल पडता है। जलता हुआ, सुलगता हुआ, धधकता हुआ। और फिर ....... सारा दिन जलने के बाद भी धधकने के बाद भी चलने के बाद भी जब उसे अपनी मुहब्ब्त नही मिलती तो सांझ होते ही जमी मे समंदर रुपी ...