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Showing posts from September, 2017

कविता कागज़ पे लिखोगे तो काली ही लिखोगे

कविता कागज़ पे लिखोगे तो काली ही लिखोगे न खुशबू होगी न रंग होगा न स्वाद होगा एक बार माटी के कागज़ बीज की स्याही और हल की कलम से लिख के देखो तुम्हारी कविता धानी,हरी, गुलाबी कई कई रंगो में खिलेगी महकेगी भी जो तुम्हारे ही नहीं बहुतों के रगों में साँसों में रच बस जाएगी और फिर तुम एक अनिवर्चनीय आनंद में डूब जाओगे कवि! एक बार लिख कर देखो तो माटी के कागज़ पे बीज की स्याही और हल नोक से एक कविता - दिल से मुकेश इलाहाबादी ------------------------

तुम्हारी यादें,

तुम्हारी यादें, मेरी पसंदीदा कमीज है जिसे हर रोज़ पहन चल देता हूँ दिन भर की यात्रा पे तुम्हारे ख्वाब ठन्डे पानी की बोतल हैं जो प्यास बुझाती रहती हैं कड़ी धूप में, जब, पसीने से तरबतर होता हूँ जेब में रखी तुम्हारी तस्वीर तसल्ली देती है कभी तो ख़त्म होगी ये तनहा सफर और - तुम होगी मेरे साथ भले ही वो ही ज़िंदगी की शाम हो मुकेश इलाहाबादी ------------------

चाँद थोड़ा शरारती

चाँद थोड़ा शरारती थोड़ा संजीदा है गुस्से में होता है तो उसका चेहरा लाल होता है मुस्कराहट में गुलाबी नज़र होता है शरमाता  है तो बादलों का घूंघट ओढ़ लेता है और फिर थोड़ी देर बाद शरारत से घूंघट हटा मुस्कुराता है चाँद थोड़ा नखरीला भी है, फिलहाल जा रहा हूँ उसे मनाने।  चाँद ! अपनी खिड़की का परदा हटाओ न,  मुझे चांदनी में नहाना है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

मुल्तवी कर दें ईश्क़

नदी की धार में साथ साथ बहते हुए हम - तुम न जाने कब दो किनारे हो गए सुबह की पहली लोकल पकड़ कर महानगर के इस कोने से उस कोने का सफर रात देर से वापसी बढ़ी हुई नदी तैर के पार करने से कंही ज़्यदा थकाऊ उबाऊ होता है तुम तो जानती ही हो ये रविवार का दिन भी कंहा फुरसत देता है कमरे की सफाई, हफ्ते भर के मैले कपडे सफाई के लिए मुँह ताकते रहते हैं, छोटी मोटी वस्तुओं की खरीददारी कुछ जान पहचान के लोगों का आना छह दिन की थकी देह भी तो मांगती है थोड़ा आराम वैसे मन तो बहुत करता है तुमसे मिलने को फिर प्रेम पे गणित हावी हो जाती है तुमसे मिलने का मतलब, बस, मेट्रो और रिक्शे का भाड़ा सौ रूपये फिर मुरमुरे चाय आय कॉफी तो पिएंगे ही और मुलकात भी किसी पार्क या सस्ते रेस्टोरेंट के कोने की मेज़ में जंहा सिर्फ हल्की फुल्की बातों के बाद लौट आना थके हुए अपने दबड़े में यह सोचते हुए कि अभी माकन मालिक का किराया देना है घर भी तो कुछ भेजना ही है , ये और बात घर से कोई डिमांड नहीं आयी और फिर न जाने क्या क्या उमड़ घुमड़ करता रहता है और इसी उमड़ घुमड़ के बीच बहने लगती है अवसाद, आलस बेचैनी की नदी जिसमे हांफत...

पंच तत्व और उनका दर्द

पंच तत्व और उनका दर्द ------------------------- पांचो, तत्व अंतरिक्ष में मिल बैठे एक दिन कुशल क्षेम के बाद व्योम ने कहा , पृथ्वी ! अनंत काल से तुम्हे अपनी धुरी पे घुमते हुए और सूर्य की परिक्रमा करते देखता आ रहा हूँ तुम, सदैव नाचती आयी हो अपनी सतरंगी आभा से देते हुए फल फूल, अनाज, सोने बैठने के लिए धरती और घर बनाने को मिट्टी लोहा और सारे अयस्क अपने पुत्रों पुत्रियों और सभी नभचर, जलचर व पृथ्वी पे चलने वाले सभी प्राणियों को बिना भेद भाव, पर अब क्यूँ इतना उदास हो ??? पृथ्वी, यह सुन और उदास हो गयी, सारे तत्व अग्नि, वायु और आकाश भी गंभीर हो गए पृथ्वी ने कहा , हे ! पितृवत व्योम , आप से क्या कुछ छुपा है ? मेरा दुःख मेरा सुख पर वर्तमान में मुझे दुःख सिर्फ मनुष्य से है जिसे मैंने सभी जीवों से ज़्यादा मान दिया, स्नेह दिया परन्तु अफ़सोस ये देख  होता है कि आज तक सभी जीव अपनी अपनी मर्यादा में है सिवाय मनुष्य के, हिंसक से हिंसक जानवर भी पेट भर खाते हैं,  और पेट भरने के बाद अहिंसक हो जाते हैं, पंक्षी भी उतना बड़ा नीड बनाते है जितनी उसकी ज़रुरत होती है यंहा तक की कुछ अ...

नहीं खौलता है खून किसी भी बात पे

चूल्हे पे चढ़ी हांडी भी आँच पा के खौलने लगती है और छलक पड़ती है अगर जल्दी ही न उतारी गयी आग से हिमालय की बर्फ भी पिघल जाती है सूरज के ताप से और फिर नदी से भाप बन उड़ जाती है और बादल बन बरसती है उमस और गर्मी के खिलाफ शायद हम हिमालय के ग्लेशियर से भी ज़्यादा ठन्डे हो चुके हैं , नहीं खौलता है खून किसी भी बात पे मुकेश इलाहाबादी --------------------------

'कुर्सी

गुफा से निकले हुए लोगों ने 'कुर्सी' बनाई, अपने राजा के लिए ज़मीन पे बैठे - बैठे राजा आज भी कुर्सी पे बैठा है शान से कुर्शी बनाने वाले ज़मीन पे सबसे पहली कुर्शी 'पत्थर' की थी फिर इंसान ने लकड़ी की कुर्शी बनाई बाद में सोने चाँदी हीरे जवाहरात की भी कुर्सियां बनाई जाने लगीं इतिहास में तो कई बार नरमुंडों की भी कुर्सियां बनाई गयी और फिर उसपे बैठ के 'राजा' बहुत खुश हुआ कुर्शी बनाई गयी थी ताकि इस्पे बैठा हुआ राजा - राज्य में सुख शांति समृद्धि लाएगा कई बार ऐसा भी हुआ कुर्शी की वजह  से ही सुख शांति और समृद्धि राज्य से विदा हो गईं सबसे पहली कुर्शी पत्थर की थी पर अब तो राजा भी कई बार पत्थर का हो जाता है भले ही कुर्शी किसी भी धातु की हो मुकेश इलाहाबादी -------------------------

खरीदोगे एक दिन

जैसे तुम खरीदते हो बोतलों में बंद पानी अपनी प्यास के लिए ऑक्सीजन युक्त मॉस्क अपने लिये थोड़ी सी स्वच्छ हवा के लिए बस ऐसे ही खरीदोगे एक दिन अपनी आँखों के लिए दृष्टि धनकुबेरों से थोडा सा आस्मान अपनी थकी और जुड़े हुए हाथों को फ़ैलाने के लिए थोड़ी सी आवाज़ अपना मुँह खोलने के लिए खरीदोगे एक दिन तुम खरीदोगे अपने लिए सब कुछ मुट्ठी भर लोगों से अगर न तानी अपनी मुट्ठियां इन मुट्ठीभर लोगों के ख़िलाफ़ मुकेश इलाहाबादी -----------------------

मुट्ठी

अक्सर जब दुनिया की सारी ताकत मुट्ठी भर लोगों की मुठ्ठी में क़ैद हो चुकी होती है तब, तमाम फ़ैली हुई हथेलियाँ तनी ही मुट्ठियों में तब्दील हो कर खड़ी हो जाती हैं मुट्ठी भर लोगों के ख़िलाफ़ मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

उलझा हुआ हूँ मै

उलझा हुआ हूँ मै बिखरा हुआ हूँ मै आँखों में अब्र सा ठहरा  हुआ हूँ मै जाम ऐ ईश्क़ पी बहका हुआ हूँ मै तेरे  इंतज़ार  में ठहरा हुआ हूँ मै मुकेश इलाहाबादी --

सच है मैं 'सच ' के साथ नहीं हूँ

यह सच है मैं 'सच ' के साथ नहीं हूँ पर इसका ये अर्थ कतई नहीं कि मै झूठ के साथ खड़ा हूँ हाँ ! ये ज़रूर है 'मै ' सही वक़्त के इंतज़ार में हूँ 'सच' के साथ खड़ा होने के लिए लिहाज़ा ! मेरी उदासीनता को कायरता कतई न समझा जाये मुकेश इलाहाबादी -------------

झूला

रस्सी का एक छोर तुम्हारे शहर से होते हुए तुम्हारी छत के कुंडे से लगा हो और दूसरा छोर मेरे घर की कुंडी से बीच में मुहब्बत की पाटी लगी हो और झूल रहे हों हम दोनों झूला ईश्क़ का मुकेश इलाहाबादी --------------------

सारी इन्द्रियों ने बग़ावत कर दिया है

मेरी सारी इन्द्रियों ने बग़ावत कर दिया है तुमसे मिलने के बाद आँखें सिर्फ तुम्हे देखना चाहती हैं कान सिर्फ तुम्हे सुन्ना चाहते हैं आँख और कान ही क्यूँ नासापुट भी तुम्हारी ही खुशबू से, तरबतर हो जाना चाहते हैं जिस्म तुम्हे छूना चाहता है मन बुद्धि सिर्फ और सिर्फ तुम्हे सोचना व जानना चाहते हैं तुम मेरे लिए किसी बग़ावत से कम नहीं हो। मुकेश इलाहाबादी ---------

जब तुम कुछ नहीं बोल रही होती हो

सुनता हूँ तुम्हे प्रण -प्राण से जब तुम कुछ नहीं बोल रही होती हो जैसे कोई सुनता है बहुत ऊपर से बहते हुए जल प्रपात की लहरों को बस ऐसे ही सुनता हूँ तुम्हारी चूड़ियों की खनक जैसे कोई सुनता है गर्मी की एकांत,चुप दोपहरिया में चिडया की चुक - चुक , बस ऐसे ही सुनता हूँ तुम्हरी खटर -पटर घर के काम निपटाते हुए सुनता हूँ तुम्हारे आँचल की सरसराहट जैसे कोइ  भक्त सुनता है - कबीर का शब्द या कोई भजन बस ऐसे ही सुनता हूँ तुम्हे अपनी धड़कनो में तुम्हे बजते हुए जैसे कंही दूर सीलोन रेडियो से आ रही कोई गीत की आवाज़ बस ऐसे ही सुनता हूँ तुम्हारे की पैड की आवाज़ (दूर से ही ) उस मेसेज की जो तुम मुझे लिख रही होती हो चुप रह कर मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

मौन के कोटर में

वह, रह -रह कर चली जाती है मौन के कोटर में बुदबुदाती रहती है देर तक कागज़ पे फिर अचानक आक्रामक हो कर कागज़ को अपने ही हथेलियों के बीच तुड़ी-मुड़ी कर के फेंक देती है वहीं कोने में फिर देर तक उन टुडे मुड़े कागज़ के अल्फ़ाज़ों से रिस्ता रहता है लहू और वह सुबकती रहती है देर तक अपने ही बनाये मौन के कोटर में मुकेश इलाहाबादी ---------------------

साँझ की दहलीज़ पे

नेट खोलते ही तुम्हारा मैसेज मिला, दिल थोड़ा खुश हुआ पर न जाने क्यूँ, आज फिर ज़िंदगी साँझ की दहलीज़ पे इंतज़ार के तेल में डूबा उदासी का दिया जला गयी, ऐसे में तुम बहुत याद आईं हालांकि तुम्हे भूला ही कब हूँ ? अभी भोजन करूंगा। कुछ देर नेट पे बैठूंगा, फिर सो जाऊँगा, एक और उदास सुबह के लिए एक और उदास साँझ के लिए , एक और अंतहीन मृगतृष्णा में भटकते रहने के लिए,

बोल ! उछालूं सिक्का ??

मै हथेली पे सूरज उगाऊँगा तुम धरती बन के घूमना उसके चारों ओर मेरे पास इक इश्क़ का सिक्का है चित गिरा तो 'तू मेरी' पट गिरा तो ' मै तेरा' बोल ! उछालूं सिक्का ?? (राज़ की बात तो ये है, सिक्के के दोनों तरफ सिर्फ तेरा नाम खुदवा के लाया हूँ, हा - हा - हा ) मुकेश इलाहाबादी ----------------------- 

मान लो घुप्प अँधेरा कमरा है,

मान लो, घुप्प अँधेरा कमरा है, दोनों की आँखों में पट्टी बंधी है। और, एक दूजे को ढूंढना भी है, कल्पना करो कैसे ढूंढेंगे एक दूजे को ? हूँ ! सही कहा तुमने, आवाज़ ही सहारा बनेगी, आवाज़ ही रास्ता देगी इक दूजे तक पहुंचने का। मान लिया तुम्हारी बात, हम दोनों इक दूजे को ढूंढ लेते हैं , आवाज़ के सहारे, पर अब हम लोग इक दूजे के कित्ते पास हैं  ये कैसे जानेंगे ? एक दूजे को कैसे मह्सूसेंगे,? जानां ! बोलो, बोलो,,,,, नहीं पता ?? हूँ, जानता हूँ , तुम्हे नहीं पता होगा। तो सुनो ! हम दोनों इक दूजे को छू के जानेंगे इक दूजे को , इक दूजे को पहचानेंगे इक दूजे के स्पर्श से। इक दूजे के गालों को अपनी हथेलियों पे ले सहलाएँगे, रोयेंगे खुशी के आंसू हथेलियां पूरे चहेरे को टटोलेगी, सिर माथा, बाल  चेहरा, कंधे और बाजुओं को पकड़ के लिपट जायेंगे और फिर घुप्प अँधेरे में आँखों की बंद पट्टियों के अंदर से रोशनी निकलेगी और हम एक ऐसी रोशनी में नहा जाएंगे जिसमे अजब रूहानी खुशबू होगी , जो हमारी साँसों में घुल मिल के हमें भी महकउआ बना देगी और फिर हम लिपटे रहेंगे बहुत बहुत देर तक महसूसते रहेंगे, 'ईश्क़ की रोश...

सुबह की धूप

देखना ! किसी दिन जब सुबह, तुम सो के उठोगी और जैसे ही परदे खोलोगी मै तुम्हारे उजले - उजले रूई के फाहे से नर्म गालों पे जाड़े की नर्म धूप सा पसर जाऊंगा और तुम अपनी आँखों को मिचमिचाते हुए अपनी हथेली से गालों को सहला के रात की खुमारी पोछोगी और मै तुम्हारे गालों से खिलखिलाए हुए बेतरतीब बिस्तर की सलवटों में पसर जाऊँगा सुबह की ताज़ी धूप हूँ न मै ??? मुकेश इलाहाबादी ------------------

अगर मौसम भी पेड़ों में ऊगा करते तो,

अगर मौसम भी पेड़ों में ऊगा करते तो, दिल्ली की झाड़ से  थोड़ा सा गुलाबी जाड़ा तोड़ के उसके गुलाबी गाल पे मल आता, क्यूँ कि सुना है उसके राजस्थान में बहुत गर्मी पड़ती है, उसे गर्मी से थोड़ा राहत मिल जाती। साला ! दिल भी अजब पागल है न जाने कब और कहा और किसपे आ जाए।  अब देखो आज कल एक राजस्थानी बाला के ऊपर आ गया है , उसकी लाल दहकती आँखों में दूर तक रेगिस्तान ही रेगिस्तान नज़र आता है, जिसकी खनखनाती हंसी के ऊँट पे चढ़ कर देखो तो ये डरावना अंतहीन रेगिस्तान भी सुहाना नज़र आने लगता है - पर आग से दिन और बर्फ से ठंडी रातों वाली रेगिस्तानी बाला की आँखों की वीरानी अजब सी दीवानगी पैदा करती है , जब वो खामोश हो जाती है तो ऐसा लगता है, रेगिस्तानी सफ़ेद समंदर -के अंदर ही अंदर दर्द की ढेरों लहरें चल रही हैं - हरड़ हरड़ - जो अगर सतह पे आ गयी तो क़यामत ला देंगी। इसी लिए जब वो खामोश होती है तो मै पगला जाता हूँ।  और मै किसी भी तरह उसे हँसाना चाहता हूँ , बुलवाना चाहता हूँ , हाला कि मान जाती है।  पर थोड़ा मुश्किल से , एक बात और बताऊँ उस - राजस्थानी बाला के बारे में , वो बहुत बहुत कुछ जानती है ...

लहू में लोहा होता है

सुना है ! लहू में लोहा होता है।  मेरी रगों में दौड़ते लहू में भी कुछ तो लोहा होगा ही। शायद यही लोहा तो है जो तुम्हारी आँखों के चुंबक से खिंचा आता है, और तुमसे लिपट जाना चाहता है,एक हो जाना चाहता ही,, शायद हम दोनों एक दुसरे के विपरीत ध्रुव हैं, और, शायद यही वज़ह तो नहीं मै और तुम इत्ता इत्ता सारा आकर्षण महसूस करते हैं , क्य ( मै गलत भी हो सकता हूँ ") अगर हूँ तो बता दो, 

तुम मेरी वो रिश्तेदार हो जिस रिश्ते के लिए कोइ नाम नहीं है

तुम मेरी वो रिश्तेदार हो जिस रिश्ते के लिए  कोइ नाम नहीं है मुकेश इलाहाबादी ------------------------------------

कई बार तुम प्रेम में बच्चा बन जाती हो - एक ज़िद्दी बच्चा

 कई बार तुम प्रेम में बच्चा बन जाती हो - एक ज़िद्दी बच्चा  तब तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो मुकेश इलाहाबादी ----------------------------

स्नैप शॉट -२

तुम अपनी सबसे खूबसूरत ड्रेस पहन के आई हो, मै किसी काम में कुछ तो उलझा हूँ कुछ तो नाटक कर रहा हूँ बिजी होने का। जानबूझ के तुम्हे इग्नोर कर रहा हूँ , तुम कुछ देर रुकती हो इस उम्मीद पे , कि मै तुम्हारी ड्रेस की और तुम्हारी तारीफ करूंगा पर मै एक उचटती सी नज़र तुम पे डाल के फिर काम में मशगूल हो जाता हूँ। तुम छनछनाती हुई वहां से चली जाती हो। ( मै मुस्कुरा के ये दृश्य क़ैद कर लेता हूँ। दिल की डायरी में हमेशा हमेशा के लिए ) (हाला कि बाद में बहुत मिन्नतें कर के तुम्हे मनाया था ) मुकेश इलाहाबादी ---------------

स्नैप शॉट

स्नैप शॉट -------- मै तुम्हारे लिए तुम्हारी फेवरेट चॉकलेट लाया हूँ , तुम खुश, मेरे देने के पहले ही मेरे हाथ से छीन लेती हो, तुम्हारा खुश- खुश चेहरा देखता हूँ, तुम्हारे नेल पॉलिश लगे हाथों से चॉकलेट के रैपर को खोलना और नेचुरल कलर की लिपस्टिक वाले मूँगिया होठों के बीच कॉफी कलर की चॉकलेट बहुत सेक्सी लग रही है, इस दृश्य को कैच कर लेता हूँ मोबाइल में, (उम्र भर के लिए एक छोटी सी खुशी कैद कर ली हमने - इस तरह ) पार्क - बोगन बेलिया की झाड़ियों के पास कोने की बेंच पे बैठे हैं, हम - तुम, मै तुम्हे बहाने से छूना चाहता हूँ पर तुम हंसती हुई हमारे हाथों को बहाने से हटा देती हो , तभी पार्क के बहार चुरमुरा वाला दीखता है, तुम खाने के लिए कहती हो, मेरे दोनों हाथों में चुरुमरे के ठोंगे हैं, जिसे मै संभाले संभाले खुश खुश लिए जा रहा हूँ तुम्हारे लिए  पार्क के कोने वाली बेंच पे जो वैगन बेलिया की झाड़ियों से छुप सी जाती है। थोड़ा सा चुरमुरा तुम्हारे होठों पे चिपक गया है , जिसे मै अपनी उँगलियों से छुड़ाने के बहाने से छू लेता हूँ तुम्हे और तुम्हारे घिसी हुई बर्फ से ठन्डे और मुलायम गोले जै...

सारी ख्वाहिशें इंतज़ार की दहलीज़ पे रख आया हूँ,

अपनी सारी ख्वाहिशें इंतज़ार की दहलीज़ पे रख आया हूँ, इन उम्मीद पे न जाने के कब इधर से गुज़रो और तुम्हारे पाँव मेरी ख्वाहिशों पे पाँव रखते हुए आगे बढ़ जाएँ किसी और मंज़िल की ओर, जो मेरे घर की ओर तो क़तई नहीं जाती होगी।  मुझे इत्ता तो पता है। मै तुम्हारे लिए तुम्हारी फेवरेट चॉकलेट लाया हूँ , तुम खुश मेरे देने के पहले ही मेरे हाथ से छीन लेती हो, तुम्हारा खुश खुश चेहरा देखता हूँ, तुम्हारे नेल पॉलिश लगे हाथों से चॉकलेट के रैपर को खोलना और नेचुरल कलर की लिपस्टिक वाले मूँगिया होठों के बीच कॉफी कलर की चॉकलेट बहुत सेक्सी लग रही है, इस दृश्य को कैच कर लेता हूँ मोबाइल में, (उम्र भर के लिए एक छोटी सी खुशी कैद कर ली हमने - इस तरह ) पार्क - बोगन बेलिया की झाड़ियों के पास कोने की बेंच पे बैठे हैं, हम - तुम, मै तुम्हे बहाने से छूना चाहता हूँ पर तुम हंसती हुई हमारे हाथों को बहाने से हटा देती हो , तभी पार्क के बहार चुरमुरा वाला दीखता है, तुम खाने के लिए कहती हो, मेरे दोनों हाथों में चुरुमरे के ठोंगे हैं, जिसे मै संभाले संभाले खुश खुश लिए जा रहा हूँ तुम्हारे लिए  पार्क के कोने वाल...

कभी तुम्हारे बारे में सोचता हूँ

जब कभी तुम्हारे बारे में सोचता हूँ तो लगता है तुम सिर्फ और सिर्फ मुहब्बत करने के लिए बनी हो मासूम सुआ पंखी सी आँखे मूँगिया होंठ अजीब कशिश भरा नमकीन चहेरा जिससे सिर्फ और सिर्फ मुह्हबत किया जा सकता है बिना थके बिना रुके बिना ऊबे अनंत काल तक तब तक जब तक कि दो जिस्म एक जान नहीं हो जाते व्यष्टि समष्टि में समाहित नहीं हो जाते सच ! सुमी तुम ऐसी ही हो बिलकुल ऐसी ही सच्ची - मुच्ची - तेरी कसम मुकेश इलाहाबादी -----------

तुम मुझे कैसे अपने पास आने सो रोक पाती हो ?

देखता हूँ तुम मुझे कैसे अपने पास आने सो रोक पाती हो ? क्यूँ कि किसी दिन भी 'मै ' चाँद का उजियारा बन जाऊँगा और फिर हरे रंग की खिड़की से रात तुम्हारे कमरे में आ पसर जाऊंगा तुम्हारे बिस्तरे में या किसी दिन खुद को विरल कर लूँगा इतना इतना इतना जितना की एक 'खूबसूरत ख्वाब' और फिर चुपके से तुम्हारी बंद पलकों पे समा जाऊँगा और कुछ नहीं तो, इक प्यारा सा मैसेज बन के तुम्हारे चैट बॉक्स में आ कर तुमसे मिल जाऊँगा और अगर ये सब कुछ भी न हो पाया तो ख़ुदा से इबादत करूंगा कि तुम्हारे गालों पे मुझे डिम्पल बना के ऊगा दे मुकेश इलाहाबादी --------------------

ज़िंदगी अगर हिना की पत्तियां होती

ज़िंदगी अगर हिना की पत्तियां होती तो कसम से उन्हें तोड़ के, पीस के तेरे हाथों पे ढेर सारे बेल बूटे बना देता फिर रच जाने के बाद तुम्हारी खूबसूरत महकती हथेलियों पे अपने होठं रख के भूल जाता क़यामत आने तक और महसूस करता रहता तुम्हारे चेहरे पे एक प्यारी मुस्कान देर तक शायद क़यामत आने तक मुकेश इलाहाबादी --------------

ख्वाबों के शिकारे में बैठ

ख्वाबों के शिकारे में बैठ तुम्हारी आँखों की झील में तुम्हारी खिलखिलाहट के चप्पू  चलाते हुए बहुत दूर निकल जाना चाहता हूँ चाँदनी रातों में क्यूँ ! सुन रही हो न, मेरी डल झील सी आँखों वाली दोस्त ? मुकेश इलाहाबादी -----------------

सुबह तुम जब सो के उठोगी

सुबह तुम जब सो के उठोगी तो मै मिलूंगा एक मीठे मेसेज के साथ तुम्हारे मोबाइल में एक छोटी सी प्यारी से कविता और एक शुभ सन्देश क्यूट से ई मो जी के साथ (और फिर तुम्हे मुस्कुराता हुआ महसूस करूंगा अपने मोबाइल में ) ठीक सुबह जब तुम सो कर उठोगी मुकेश इलाहाबादी ------------- 

फूल मै इक खिला देखूं

फूल मै इक खिला देखूं तुझे मै मुस्कुराता देखूं तनहा - तनहा रातों में छत पे चाँद खिला देखूं मै पर्वत तू बादल, बन   तुझको मै बरसता देखूं तू कुछ माँगे ! मै न दूँ, बच्चों सा मचलता देखूं मुकेश इलाहाबादी ---

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे हम सूरज हैं सुबह ताज़ादम होके फिर उग आएंगे हवा पानी खाद सब कुछ किसी भी जगह  ले लेंगे हमारी जात इश्क़ है,किसी भी ज़मी पे उग जायेंगे  दुनिया का कोई भी ग़म हमारे आगे न टिकेगा,,  कभी चैती कभी फगुआ कभी मेघ मल्हार गायेंगे तुम अपने यंहा जेहादी आतंकवादी पैदा करते रहो हम अपनी ज़मीन पे आम महुआ तिलहन उगाएंगे सिखाते रहिये आप वतन वालों को मज़हबी पाठ हम भारत वासी सिर्फ योग और प्रेम ही सिखाएंगे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------- --

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे हम सूरज हैं सुबह ताज़ादम होके फिर उग आएंगे हवा पानी खाद सब कुछ किसी भी जगह  ले लेंगे हमारी जात इश्क़ है,किसी भी ज़मी पे उग जायेंगे  दुनिया का कोई भी ग़म हमारे आगे न टिकेगा,,  कभी चैती कभी फगुआ कभी मेघ मल्हार गायेंगे तुम अपने यंहा जेहादी आतंकवादी पैदा करते रहो हम अपनी ज़मीन पे आम महुआ तिलहन उगाएंगे सिखाते रहिये आप वतन वालों को मज़हबी पाठ हम भारत वासी सिर्फ योग और प्रेम ही सिखाएंगे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------- --

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे

जलेंगे तपेंगे चलेंगे और सांझ होते ही डूब जायेंगे हम सूरज हैं सुबह ताज़ादम होके फिर उग आएंगे हवा पानी खाद सब कुछ किसी भी जगह  ले लेंगे हमारी जात इश्क़ है,किसी भी ज़मी पे उग जायेंगे  दुनिया का कोई भी ग़म हमारे आगे न टिकेगा,,  कभी चैती कभी फगुआ कभी मेघ मल्हार गायेंगे तुम अपने यंहा जेहादी आतंकवादी पैदा करते रहो हम अपनी ज़मीन पे आम महुआ तिलहन उगाएंगे सिखाते रहिये आप वतन वालों को मज़हबी पाठ हम भारत वासी सिर्फ योग और प्रेम ही सिखाएंगे मुकेश इलाहाबादी ---------------------------- --

शबोरोज़ मेरे वज़ूद में बहती है

शबोरोज़ मेरे वज़ूद में बहती है तेरी यादें एक खूबसूरत नदी है तेरे हिज़्र में वक़्त नहीं कटता,, तुझ बिन हर लम्हा एक सदी है मेरे सीने पे अपना सिर रख दे, फिर सुन,धड़कने क्या कहती हैं मुकेश तू मेरा हाथ छू कर देख मेरे बदन में हरारत सी रहती है मुकेश इलाहाबादी -------------

तमाम बहाने हैं मुस्कुराने को

तमाम बहाने हैं मुस्कुराने को वर्ना तो ढेरों ग़म हैं बताने को तुझसे नही तेरे ख्वाब से कहूँगा आज की रात नींद में आने को तुझ बिन नींद तो आने से रही दर्द से बोलूंगा लोरी सुनाने को सावन की रिमझिम बारिस से कहूँगा तुमको झूला झूलाने को मेरा दम निकले इसके पहले, तुझसे कहूँगा इक बार आने को मुकेश इलाहाबादी --------

मन फूल जिस्म चिरइया

औरत का मन फूल जिस्म चिरइया और दुःख पहाड़ से होते हैं मुकेश इलाहाबादी ------

अँधेरा बहुत है, सन्नाटा बहुत है

अँधेरा बहुत है, सन्नाटा बहुत है शह्र  की आँख में वीराना बहुत है छाँव भी यही है इतिहास भी यही गाँव का ये बरगद पुराना बहुत है हैं जगमग मॉल,जगमग इमारतें   फिर भी बस्ती में, अँधेरा बहुत है बहू -बेटा है पोता है फिर क्या ग़म क्यूँ बूढा रात भर कराहता बहुत है मुकेश इक बात समझ नहीं आती क्यूँ उदास ग़ज़लें लिखता बहुत है मुकेश इलाहाबादी ----------------

चाक पर चढ़ोगे

चाक पर चढ़ोगे अपने को गढोगे है दिल में मैल ? नज़र से उतरोगे झूठ के पांव ले, कब तक चलोगे मोम न बनो तुम रोज़ - रोज़ गलोगे मेरे दोस्त बनोगे, हरदम खुश रहोगे मुकेश इलाहाबादी -

तुम हंसती हो तो महुआ झरता है

तुम हंसती हो तो महुआ झरता है तुम्हारी बातों में नशा सा रहता है तुम कोइ काला जादू जानती हो ? हर कोई सिर्फ तेरी बातें करता है काली या लाल साड़ी पहना करो, वैसे तो तुम पर हर रंग फबता है मुकेश इलाहाबादी ----------------

दिल मेरा अलग तबियत का है

दिल मेरा अलग तबियत का है तेरे सिवा किसी पे फ़िदा न हुआ मुकेश इलाहाबादी ---------------

इक सांस भी ऐसी नहीं जाती,

इक सांस भी ऐसी नहीं जाती, जब  याद तुम्हारी नहीं आती बसंत गया,सावन चला गया मुंडेर पे कोयल भी नहीं आती मुकेश इलाहाबादी -----------

लट्टू की तरह घूमता रहता है मन

लट्टू की तरह घूमता रहता है मन तुम आस- पास रहो चाहता है मन बस तुझे देखूं तुझे चाहूँ तुझे सराहूं मुआ जाने क्या - २ चाहता है मन हैं तुम्हारी आँखे शराब के दो प्याले बिन पिए ही झूमता रहता है मन तेरा मेरा जन्मो जन्मो का नाता है तू मेरी है मै तेरा यही कहता है मन कई बार चाहा तुझे भूल जाऊं मगर मुकेश मेरा कहा कँहा मानता है मन मुकेश इलाहाबादी --------------------

जिस दिन से तुझसे मिला हूँ

जिस दिन से तुझसे मिला हूँ पत्थर से नगीना हो गया हूँ तुम्हारी बातों में कोई जादू है पागल दीवाना सा हो गया हूँ मुकेश इलाहाबादी -------------

गर तुम मुहब्बत भर होती तो तेरा हिज़्र सह लेता,

गर तुम मुहब्बत भर होती तो तेरा हिज़्र सह लेता, मुकेश तुम्ही बताओ बगैर साँसों के कौन जिया है ? मुकेश इलाहबादी ------------------------------------