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Showing posts from August, 2017

तुम बिन

इस बरसात में भी भीगा बहुत तुम बिन सांझ मंदिर में घंटियाँ बज रही थी जैसे तुम हंस रही हो मुझे कुछ ऐसा लगा तुम्हारा कोई मेसैज नहीं आया दिन बहुत उदास गुज़रा की पैड से उंगलिया बहुत देर तक खेलती रहीं फिर जाने क्या सोच के कॉल नहीं किया मैसेज किया जानता हूँ तुम मेरे मैसेज का जवाब तो न दोगी पर पढ़ोगी ज़रूर (बिना चेहरे पे कोइ भाव लाये दिल में खुश होते हुए ) और रख दोगी मोबाइल चुपचाप खैर ,,, तुम अपना काम करो मै तो ऐसी बक बक करता ही रहूंगा बाय ,,,,,, मुकेश इलाहाबादी ----------------- Posted by Mukesh Srivast

सिवाय दर्द के मिलता क्या है ?

सिवाय दर्द के मिलता क्या है ? ईश्क़ करने से फायदा क्या है ? तुझे न सोचूँ  मेरे बस में नहीं, तू बता तू मेरा लगता क्या है? तुझसे मिलने की है बेकरारी, ईश्क़ नहीं तो माज़रा क्या है ? मेरी सांसे तेरी, धड़कन तेरी पास मेरे अब, बचा क्या है ? बैठा रहूँ,  तेरा इंतज़ार करूँ, सिवाय इसके,रास्ता क्या है? मुझसे नहीं धड़कनो से पूछ, तेरा ये दिल कहता क्या है ? मुकेश इलाहाबादी -------------

चाँद मेरा दोस्त

मेरे पास विरासत के नाम पे ढेर सारी वर्जनाओं, सिद्धांतों की क़ैद के बीच थोड़ा सा आकाश था जिसे अक्सर एक छोटी सी खिड़की से झाँक लेता था उसआकाश में अक्सर मुझे काले, भूरे डरावने बादल ही मंडराते दीखते लेकिन कभी कभी एक सलोना सा चाँद भी दिख जाता चाँद कभी बादलों में छुप जाता तो कभी दिख जाता यूँ तो चाँद मुस्कुराता ही लगता लेकिन एक दिन गौर से देखने पे मुझे चाँद की आँखों में भी एक उदासी नज़र आयी मै चाँद को देख रहा था चाँद भी मुझे देखने लगा मै कुछ अन्यमनस्क हो रहा था कि चाँद खिलखिला के कहने लगा ' क्या देख रहे हो?" मैंने कहा 'कुछ नहीं' चाँद 'कुछ तो है ,,,, बोलो बोलो बेहिचक बोलो, तुम मुझे अपना दोस्त समझो' मेरी हिम्मत बढ़ी -- और मैंने कहा ' कुछ नहीं देख रहा हूँ , तुम कितने सुंदर हो चाँद ' चाँद पहले तो हंसा फिर कहने लगा ' हूँ, सबको लगता तो ऐसा ही है, सबको मेरी सुंदरता तो दिखती है पर मेरे चहेरे के दाग़ नहीं दीखते मेरे जिस्म के गड्ढे और दुखों के पहाड़ नहीं दीखते ? बिन थके बिन रुके धरती का धरती का चक्कर लगाना नहीं दीखता? राहू द्वारा डसा जाना नहीं दीख...

कभी फूल सा हथेली में ले के चूम लेना

कभी फूल सा हथेली में ले के चूम लेना मोती हूँ मै, बिखर जाऊं तो समेट लेना यूँ तो मै तुझे छोड़ के कंही जाऊँगा नहीं गर कभी रूठ के जाऊँ भी तो रोक लेना वैसे तो मै शीरी ज़बान में बात करता हूँ फिर भी कुछ बुरा लगे तो कह सुन लेना दिल अपना निकाल के रख दिया है मैंने कभी वक़्त मिले तो, मेरा ख़त पढ़ लेना औरो की तो रोज़ ही सुना करती हो मुक्कु तुम किसी रोज़ मेरी भी ग़ज़ल सुन लेना मुकेश इलाहाबादी ------------------------

रात चाँद अच्छा नहीं लगता

तेरे जाने के बाद, रात चाँद अच्छा नहीं लगता दिन सूरज अच्छा नहीं लता नींद नहीं अच्छी लगती,मुझे कोई ख़ाब अच्छा नहीं लगता महंगाई व मुफिलसी में, घर   मेहमान अच्छा नहीं लगता जाड़ा अच्छा नहीं लगता न सावन अच्छा नहीं लगता तुम  साथ रहते हो मेरे, तब,, कोई और अच्छा नहीं लगता मुकेश इलाहाबादी ---------

इक बार मेरी आँखों के आईने से

इक बार मेरी आँखों के आईने से ख़ुद को देखना तुम ख़ुद ब ख़ुद अपनी मुहब्बत में गिरफ्तार न हो जाओ तो कहना मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम्हारी बातें जैसे

तुम्हारी बातें जैसे कोई बुलबुल चहचहा जाए मुंडेर पे तुम्हारी हंसी, जैसे किसी कोई बिखेर दे ढेर सरे सफ़ेद मोती ज़मीन पे तुम्हारी आँखे, जैसे मंदिर में टिमटिमाते दो दिए तुम्हारी साँसे, जैसे इत्र की सीसी खुल के ढ्नंग  जाये और महमहा जाये सारा आलम सच ! ऐसी ही हो तुम बस ! मेरी नहीं हो तुम मुकेश इलाहाबादी --------------

तुम पहले जैसे नहीं रह गए हो दोस्त

तुम पहले जैसे नहीं रह गए हो दोस्त शायद अपनी राह बदल दिए हो दोस्त दोस्त मेरी बोली बाणी तो है उसी तरह शायद तुम ही राह बदल लिए हो दोस्त जाते वक़्त कहा था जल्दी लौटोगे पर मियाद खत्म हुई, नहीं आए हो दोस्त मुकेश इलाहाबादी --------------------

न तो काली होती है, न तो गोरी होती है

न तो  काली होती है, न तो गोरी होती है जैसी भी हो अम्मा तो अम्मा ही होती है जाड़े में गरम रजाई, अम्मा का  आँचल सोते में तकिया अम्मा की कुहनी होती है अम्मा तो बस बच्चों की अम्मा होती है अम्मा हलवा, पूड़ी, दूध, मलाई होती है गर बच्चे देर से आये खबर न पाए तो अम्मा के दिल में सिर्फ बेचैनी होती है चीन की हो भारत के हो या हो लंका की कंही की हो अम्मा तो सिर्फ देवी होती है मुकेश इलाहाबादी ------------------------

नाव और पाल सजा लेते हैं

नाव और पाल सजा लेते हैं दरिया  में राह बना लेते  हैं रख हौसलों की उड़ान,लोग आसमाँ को घर बसा लेते हैं जाने कैसे होते हैं, लोग जो तनहा ज़िंदगी बिता लेते हैं मुकेश मेहनत परस्त लोग पत्थर पे गुल खिला लेते हैं मुकेश इलाहाबादी ---------

तू रात सा लिपट जाती है मै चाँद सा चमकने लगता हूँ

तू रात सा लिपट जाती है मै चाँद सा चमकने लगता हूँ फिर जाने क्या होता है सुबह सूरज सा दहकने लगता हूँ मुझे मालूम है मेरी सिफत पत्थर जैसी है, पर जाने क्यूँ तेरी सोहबत में आते ही रंजनीगंधा सा महकने लगता हूँ तेरी मुस्कुराहट सुहानी सुबह सी फ़ैल जाती है मुझमे और अपने उदास घोंसले से उड़ मै परिंदे सा चहकने लगता हूँ मुकेश इलाहाबादी ----------------------------------------

पुराने एल्बम की धूसर होती तस्वीरों में

अक्सर पुराने एल्बम की धूसर होती तस्वीरों में एक ग्रुप तस्वीर में से एक चेहरा झांकता है जो कुछ कहना चाहता है और मै सुन्ना चाहता हूँ पर चाह कर भी उसकी आवाज़ नहीं सुन पाता घबरा कर लोगों की नज़रें बचा कर एल्बम के उस पन्ने को पलट देता हूँ या फिर अल्बम ही बंद कर मौन हो जाता हूँ बहुत देर तक के लिए मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

दरो दीवार नहीं बोलती?

कौन कहता है ? दरो दीवार नहीं बोलती? किसी दिन ये घर छोड़ के तो देखो, रिश्तेदार भले ही चुप रह जाएं मगर ये दीवारें चीख चीख़ कर बुलाएंगी तुम्हे मुकेश इलाहाबादी --------------------------------

होश उड़ाने के लिए तेरा मुस्कुराना ही काफ़ी था

होश उड़ाने के लिए तेरा मुस्कुराना ही काफ़ी था यूँ मुँह चिढ़ा के भाग जाने की ज़रूरत क्या थी ? मुकेश इलाहाबादी ---------------------------------

रंग बिरंगा हो गया हूँ,

जैसे कच्ची दोमट मिट्टी का धेला धीरे धीरे घुलता है बारिस के पानी में और पानी मटमैला मटमैला हो जाता है मिट्टी की सोंधी सोंधी महक के साथ बस ऐसी ही तुम घुलती हो मुझमे और घुलता जाता है तुम्हारी आँखों की पुतली का ये कत्थई रंग सिर्फ आँखों का रंग ही क्यूँ तुम्हारे काजल का गहरा काला आँचल का आसमानी गालों का गुलाबी होंठो का मूँगिया और तुम्हारी हंसी का दूधिया रंग मेरे वज़ूद में घुल मिल जाते हैं तुम्हारे स्नेह और प्रेम की बारिस में तुम देखो न 'मै कितना रंग बिरंगा हो गया हूँ, और रंग बिरंगी हो गयी है मेरी कविता, बिलकुल तुम्हारी तरह ' क्यूँ है न सुमी ?? देखो ! देखो, तुम हंसना नहीं और ये मत कहना तुम ' तुम पागल हो ' मुकेश इलाहाबादी ----------------------

जो तेरे साथ आता है, कहीं और नहीं आता है

जो तेरे साथ आता है, कहीं और नहीं आता है दिल का क्या दिल तो कँही भी बहल जाता है है मजा मुहब्बत में मुकेश कुछ रोज़ ही आता दिल बाद उसके उम्रभर,ग़म का बोझ उठाता है मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

विडंबना ही तो है,

विडंबना ही तो है, --------------------- अनाज से एक - एक कंकर, पत्थर बीन कर अलग करने वाली औरत ज़िदंगी भर नहीं पहचान पाती या अलग कर पाती है अपनी ज़िंदगी में आये कंकर पत्थर मुकेश इलाहाबादी ---------

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे तुम हवा देते रहो, सुलग उठेंगे यादों के अलाव जलाये रखो ये, हिज़्र की सर्द रातों में मज़ा देंगे बारिश की बूंदो से कंहा बुझेंगे अंगार चाहत के, और दहकेंगे मुहब्बत में खुशबू भी होती है जित्ता दहकेंगे उतना महकेंगे मुकेश इलाहाबादी -------------

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे

ये पहले तो, कुछ देर धुँवा देंगे तुम हवा देते रहो, सुलग उठेंगे यादों के अलाव जलाये रखो ये, हिज़्र की सर्द रातों में मज़ा देंगे बारिश की बूंदो से कंहा बुझेंगे अंगार चाहत के, और दहकेंगे मुकेश इलाहाबादी -------------

रोशनी दे भी सकता था किसी ने जलाया ही नहीं

रोशनी दे भी सकता था किसी ने जलाया ही नहीं मै हीरा हो भी सकता था किसी ने तरासा ही नहीं यूँ बेवजह उदास रहने का मुझको कोई शौक नहीं वज़ह ये रही मुझको, किसी ने गुदगुदाया ही नहीं मरूंगा तो फ़क़त मेरे करम साथ जाएंगे, लिहाज़ा सच्चाई और ईश्क़ के सिवाए कुछ कमाया ही नहीं महफ़िल में सभी की चाहत थी मै कुछ तो सुनाऊँ बज़्म  में तू नहीं थी इसलिए कुछ सुनाया ही नहीं सच पूछो तो  जिस दिन से तुझसे मिला हूँ, मुकेश किसी और को मैंने, अपना दोस्त बनाया ही नहीं मुकेश इलाहाबादी -----------------------------------

तू अपना बना ले या हमको गैर बता दे

तू अपना बना ले या हमको गैर बता दे तुम्हारा रहूंगा चाहे हंसा दे चाहे रुला दे न आज है न रहेगा तुमसे, कोई शिकवा ये जां तेरी है ज़िंदा रख,कि ज़ह्र पीला दे किताबे ज़ीस्त पे लिख दिया, तेरा नाम मै तेरी ग़ज़ल मुझे पढ़ या इसे मिटा दे ये ज़िंदगी की सर्द रात है,यूँ ही न कटेगी   मेरी दास्ताँ सुन, या फिर अपनी सुना दे मुकेश इलाहाबादी -----------------------

ज़मी से ऊपर आसमा से नीचा रहने दे

ज़मी से ऊपर आसमा से नीचा रहने दे अपना क़द अपने साये से बड़ा रहने दे सूरज का क्या? सांझ होते डूब जाएगा साथ, अँधेरे के लिए, इक दिया रहने दे कभी तो कोई तो पढ़ेगा तेरी ये दास्ताँ लिख दिया है तो इसको लिखा रहने दे वफ़ा नहीं करनी है तो मत कर मुकेश कम से कम अपना दोस्त बना रहने दे मुकेश इलाहाबादी ----------------------

जैसे अँधेरे बंद कमरे में

जैसे अँधेरे बंद कमरे में किसी झिर्री से आती है थोड़ी सी रोशनी थोड़ी सी धूप थोड़ी सी हवा बस ऐसे ही तुम आती हो मुझ तक यादों की पतली सुनहरी रोशनी की तरह और दे जाती हैं थोड़ी सी धूप थोड़ी सी हवा थोड़ी सी ज़िदंगी कुछ समझी, लाडो  ?? मेरी सुमी, मुकेश इलाहाबादी ---------

दिन भर भागता हूँ

दिन भर भागता हूँ शब भर जागता हूँ कई घाव हैं सीने में, तभी तो कराहता हूँ तू चाँद है और दूर है ये बात मै जानता हूँ तेरी, झील सी आँखे थोड़ा आब चाहता हूँ मुकेश इलाहाबादी ---

लाल हरी नारंगी देखा

लाल  हरी  नारंगी  देखा दुनिया रंग बिरंगी देखा सत्ता औ पैसा वालों को अक्सर बडा घमंडी देखा फूल सी कोमल नारी को भी हमने बनते चंडी देखा देखा हमने बडे बडों को सबकी चाल दुरंगी देखा सात सुरों से सजा धजा जिस्म बना सारंगी देखा   मुकेश इलाहाबादी ----

तुम्हारी तरह खूबसूरत कविता लिखना चाहा

एक दिन मैंने तुम्हारी तरह खूबसूरत कविता लिखना चाहा शब्द कोष से ढूंढ ढूंढ ढेर सारे अच्छे अच्छे शब्दों को भावों में पिरोया कई नामवर कवियों  भावों को भी अपनी कविता में पिरोया फिर प्रेम से अपनी कविता को निहारा तुम्हारी तस्वीर को निहारा देर तक देखता रहा लगा मेरी कविता तुम्हारी तस्वीर से फीकी है मैंने उस कविता को फाड़ा और फिर से पूरी तन्मयता से एक और प्यारी सी कविता लिखी और फिर तुम्हारी पिक से तुलना की पर इस बार  कविता तुम्हारी पिक से कमतर रही बाद इसके कई कोशिशों के मै हारता ही रहा नहीं लिख पाया एक बेहे पंक्ति तुम्हारी पिक सा शायद तुम इतनी प्यारी हो जिसे दुनिया के कोइ भी शब्द अपने अंदर नहीं समाहित कर पाएंगे लिहाज़ा अब मै जान गया हूँ तुमसे खूबसूरत कोइ कविता नहीं है - दुनिया में जीती जगती - हँसती'- गुनगुनाती - थोड़ी नखरीली और चटकीली क्यूँ सच कह रहा हूँ न ??? बोलो न ???? मुकेश इलाहाबादी --------------

बस यही इक अच्छी बात है

बस यही इक अच्छी बात है तुम मुस्कुराती बहुत प्यारा हो तुम्हारी आँखे तुम्हारे गाल तुम्हारे मूंगिया होंठ सभी कुछ हँसते हुए नज़र आते हैं और जब तुम हँसती हो तो सारी क़ायनात खुश हो जाती है ओ मेरी थोड़ी थोड़ी मगरूर थोड़ी थोड़ी नखरीली पर प्यारी सी डॉल चाहे कुछ भी कहो तुम हो बहुत प्यारी मुकेश इलाहाबादी -----------------

उनको मुहब्बत नहीं आती

उनको मुहब्बत नहीं आती हमको नफरत  नहीं आती झगड़ा कर लूँ उंनसे, मगर हमको अदावत नहीं आती मुकेश इलाहाबादी --------

चाँद को देखता हूँ

जब भी चाँद को देखता हूँ चाँद बहुत खूबसूरत नज़र आता है मगर, चाँद को मै कैसा नज़र आता हूँ ? मुझे नहीं पता मुकेश इलाहाबादी ----------

मै एक पेड़ होता और तुम होती गिलहरी

काश, मै एक पेड़ होता और तुम होती गिलहरी जो अपनी बटन सी चमकती आँखों से इधर - उधर देखती ऊपर चढ़ती और कभी उतरती तुम्हे देखता चुक -चुक करते हुए हरी पत्तियों को अपने मुहे में दबाये हुए फुदकते हुए और फिर ज़रा सी आवाज़ या आहट से भाग के मेरे तने की खोह में छुप जाना जैसे, तुम दुपुक जाती थी मेरी बाँहों में, उन दिनों जब हम तुम दोनों थे एक दूजे के गहन प्रेम में (हलाकि मै तो आज भी हूँ तुम्हारे प्रेम में, तुम्हारा पता नहीं ) ओ ! मेरी सुमी क्या ऐसा हो सकता है किसी दिन ? कि तुम बन जाओ गिलहरी और मै बन जाऊँ पेड़ मुकेश इलाहाबादी ----------------

तुमने 'सुमी ' को देखा है ?

क्या, तुमने 'सुमी '  को देखा है ? नहीं देखा तो देखना। तब तुम जानोगे फूलों सी ताज़गी क्या होती है झरने सी खनखनाती हँसी क्या होती है, रूई के फाहों से कोमल गाल और गुलाब के पंखड़ियों से होठ क्या होते हैं एक मासूम और प्यारे बच्चों से दिल वाली दोस्ती क्या होती है मुहब्बत क्या होती है, इंसानी जज़्बातों को कागज़ पे उतारने की कला क्या होती है? चाहे कविता में हो या कहानी में और अगर तुम सुमी से मिल लोगे तो मुकेश बाबू तुम पूरी दुनिया से मिल लोगे कुछ समझे मुकेश बाबू ??? मुकेश इलाहाबादी ------------------------

निगोड़ा सावन बहुत बरसता है

निगोड़ा सावन बहुत बरसता है मन तुम बिन बहुत तरसता है तूने मुझको इक दिन छुआ था मेरा बदन आज भी महकता है गर तेरे दिल में प्यार नहीं तो ? तेरे आँखों में क्या छलकता है मुद्दतों हुई मिला नहीं फिर भी तेरे नाम से ये दिल धड़कता है मुकेश इलाहाबादी -------

जितनी बार कसौटी पे कसा गया

जितनी बार कसौटी पे कसा गया हर  बार  हमको  खरा पाया  गया हमने सच की तरफदारी क्या की, हमी को गुनहगार ठहराया गया   हमने तो  ईश्क़  बातें की  थी पर   हमको ही सूली पर चढ़ाया गया जो  कहा  वो किया की सजा थी कांटो  की  सेज़ पे  लिटाया गया जितना, हंसना मुस्कुराना चाहा हमको उतना ज़्यादा रुलाया गया मुकेश इलाहाबादी -----------------

अल्हड़ नदी आस रख गयी

अल्हड़ नदी आस रख गयी मेरे होंठो पे प्यास रख गयी बंद दरीचों की झिर्री से आ खुश्बू का एहसास रख गयी इक प्यारी से मुस्कान दे के वो तोहफा इक खास दे गयी मुकेश इलाहाबादी --------

बादल सा आते हो बारिश लाते हो

बादल सा आते हो बारिश लाते हो हम सूखी धरती हरा  कर जाते हो उदास दिल थोड़ा खुश हो जाता है तुम खिलखिलाते हुए जब आते हो जब कभी मायूस हो जाता हूँ,मित्र तुम ही तो हो जो हौसला बढ़ाते हो राह गलत जो पकड़ूँ मै, तब - तब दीपक बन तुम ही राह दिखाते हो (मित्रों की माला का नायब मोती हो तुम ) मुकेश इलाहाबादी -----------------

मै ही पर्वत बनू

मै ही पर्वत बनू मै ही सागर बनू (बीच में तुम बहो दरिया सा ) मै ही सूरज बनू मैँ ही चाँद बनू (बीच में तुम डोलो धरती सा ) मुकेश इलाहाबादी -----------

यूँ तो ज़माने ने कोशिशे हज़ार की

यूँ तो ज़माने ने कोशिशे हज़ार की मै पत्थर हो जाऊं ये  और बात जिस्म पत्थर हो गया दिल तो कांच का ही रह गया मुकेश इलाहाबादी ----------------

आईना छन्न से टूट जाता है

तुम तैयार हो के बालों में कंघी कर रही हो मै पीछे से आकर तुम्हारे बालों में फूल टांक देता हूँ तुम मुस्कुरा कर आईना देखती हो आईने में हम दोनों साथ साथ नज़र आ रहे हैं तुम्हारे कंधे पे मेरी ठुड्डी टिकी है तुम मुस्कुरा रही हो मै तुम्हे खुश हो कर चूमना चाहता हूँ तुम खिलखिला कर मुझे गले लगा लेना चाहती हो हड़बड़ी और जल्दी में तुम्हारे हाथ से आईना छूट जाता है आईना छन्न से टूट जाता है हम तुम कई कई हिस्सों में बट जाते हैं (काश आईना न टूटा होता ?) मुकेश इलाहाबादी -----------------------------

मुहब्बत को समझने के लिए दोनों को जानना जरूरी है

देह का अपना क  क  ह  रा  है दिल  की अपनी ऐ बी सी डी है (मुहब्बत को समझने के लिए दोनों को जानना जरूरी है ) मुकेश इलाहाबादी --------------------------------------

उलझने तो बहुत हैं लेकिन

उलझने तो बहुत हैं लेकिन तुम्ही से उम्मीद है लेकिन बाहर तो हँसता ही मिलेगा अंदर से ग़मगीन है लेकिन उड़ता तो हूँ,  मै खलाओं में पाँव तले, ज़मीन है लेकिन दौलते,जहाँ हो न हो, मगर मेरा दोस्त हसीन है लेकिन भले मुकेश तुम्हे अच्छा लगे वो कुछ तो अजीब है लेकिन मुकेश इलाहाबादी --------

सूखा पत्ता

काश मै इक सूखा पत्ता होता जिसे छोड़ देता उड़ने के लिए मौसम की बेदर्द हवाओं संग संग जो कभी न कभी तो थपेड़े खा खा कर तुम तक पहुंच ही जाता मुकेश इलाहाबादी --------------------------- 

न खत्म होने वाली रात

मै न खत्म होने वाली रात बन जाना चाहता हूँ जिसमे तुम्हारे नाम के चाँद हो सितारे हों तुम्हारे आँचल सा फैला आकाश हो तपो खूब तपो जीवन की दोपहरिया में, सूरज सा तपो और मै सूरजमुखी सा उगूं जिधर -जिधर तुम चलो उधर - उधर घूमू तुम नदिया सा उफनती रहो बहती रहो मै साहिल सा निश्चल - निष्कम्प तुम्हे समेटे रहूँ अपनी बाँहों में मुकेश इलाहाबादी -----------------

तुम्हारे रूठ के जाने के बाद

तुम्हारे रूठ के जाने के बाद इक लम्बे इंतज़ार के बाद तुम्हारे लौटने की सारी उम्मीदों के खत्म होने के बाद मन  स्लेट से सारे बिम्ब मिटा देने की गरज़ से शब्दों के हवन कुंड में तुम्हारे तुम्हारी पवित्र यादों की आहुतियां दी जो समाप्त होने की जगह यज्ञ की लपटों सा और और धधकने लगी हैं और मेरे चारों और अब पवित्र खुशबू सा भी व्याप्त हो गयी हो ओ ! मेरी समिधा ओ ! मेरी यज्ञ ओ ! मेरी देवी तुम सुन रही हो न ?? मेरी सुमी सुन रही हो न ?? मुकेश इलाहाबादी --------------

तेरे इश्क़ के उपवन में हूँ

तेरे इश्क़ के उपवन में हूँ जाने किस उलझन में हूँ तू मेरे अंदर है और मै भी तेरी आँखों के दर्पन में हूँ बिंदिया में हूँ चूड़ी  में  हूँ पायल में हूँ कंगन में हूँ प्यार  करे तू  तो बाहों में वरना झूठी अनबन में हूँ   तेरे गालों के डिम्पल में, तू खुश है तो चुंबन में हूँ तू साथ रहे तो लगता है जैसे की मै मधुबन में हूँ वैसे तो मै हूँ उड़ता पंछी पर अब, तेरे बंधन में हूँ मुकेश इलाहाबादी ---------

रात भर बहुत तड़पा, मन

रात  भर बहुत  तड़पा, मन तुम बिन बहुत अकेला,मन इक दिन, तुम लौट आओगे क्यूँ  ये बार-बार कहता मन जेठ -  बैसाख से तपते दिन सावन भादों सा बरसा मन तुम मगन थे अपनी धुन में तुमने मेरा कब समझा मन गैरों में ही उलझे थे तुम पर तुम सिर्फ मेरे हो कहता मन मुकेश इलाहाबादी ------------

तुम्हारे नाम की चिड़िया

मेरे अंदर नीला - नीला आकाश है अनंत तक फैला हुआ सपनो की सतरंगी धरती है मुह्हबत की शाखों से लदा फंदा इक पेड़ भी है इक्षाओं की टहनी पे सपनो के फूल खिलते हैं यह समझो कि मेरे अंदर इक पूरी दुनिया है इस दुनिया में तुम्हारे नाम की एक चिड़िया भी है जो अल्ल सुबह से चहकने लगती है नीले नीले आसमान में फुर्र -फुर्र उड़ती है साँझ मेरे सपनो की डाली पे अपने पंखो पे अपनी चोँच रख के सो जाती है तुम्हारे नाम की इस चिड़िया को अपने अंदर उड़ते देख बहुत खुश होता हूँ मै इस चिड़िया को बहुत प्यार करता हूँ (सुमी ! ये कोई कविता और कहानी नहीं सच्ची मुच्ची की बात है ) मुकेश इलाहाबादी ----------------------